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जाने प्रथमाचार्य शान्तिसागरजी महराज को

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राजाखेड़ा में उपसर्ग - अमृत माँ जिनवाणी से - ३११

जय जिनेन्द्र बंधुओं,                आज जिस प्रसंग का उल्लेख करने जा रहा हूँ वह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रसंग है। दो दिनों में इसका उल्लेख किया जायेगा। पूज्य शान्तिसागरजी महराज की अपार क्षमा का यह  बहुत बड़ा उदाहरण है। लगभग पिछले छह महीने से इस प्रसंग का उल्लेख करना चाह रहा था आज इस प्रसंग को प्रस्तुत कर पा रहा हूँ।          यह वृत्तांत हम सभी को जानना चाहिए और अपार क्षमायुक्त दिगम्बर मुनिराज के विशाल जीवन से जन-२ को अवगत कराना चाहिए। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३११   ?        

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अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१०

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,         आज का प्रसंग अवश्य पढ़ें। इस प्रसंग को पढ़कर आपको ज्ञात होगा कि किस तरह दिगम्बर मुनिराज अपने ऊपर आये समस्त उपसर्गों को अद्भुत समता के साथ सहन करते हैं और कष्टों के प्रति ग्लानि के भाव नहीं लाते भले ही उनको अपना शरीर ही क्यों न त्यागना  पढे। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१०   ?     "अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि १"                       किसी को पता न था, कि मुनिराज को पुराना मृगी का रोग था, अग्नि का संपर्क पाकर अपस्मार का वेग हो गया। उससे मूर्छित

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अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०९

जय जिनेन्द्र बंधुओं,       आज का प्रसंग प्रस्तुत करने का मुख्य उद्देश्य लोगों को मुनि महराज की वैयावृत्ति के बारे में सचेत करना है। हमेशा हम सभी को साधुओं की वैयावृत्ति अत्यंत सचेत रहकर करना चाहिए क्योंकि अच्छे भाव होते हुए भी हमारे क्रियाकलापों से कभी-२ उनपर उपसर्ग भी आ जाते हैं। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०९   ?        "अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि"               पूज्य शान्तिसागरजी महराज ससंघ जैन धर्म के मूर्धन्य विद्वान पंडित गोपालदास जी बरैयाजी की जन्मभूमि मुरैना पहु

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?मुरैना - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०८

☀ बंधुओं,         आपके मन में विचार आ सकता है कि हम पूज्य शान्तिसागरजी महराज के पवित्र जीवन चारित्र को जान रहे हैं तो इसके बीच भिन्न-२ ऐतिहासिक धर्म-स्थलों अथवा तीर्थों अथवा व्यक्तियों का उल्लेख क्यों? इसके लिए मेरा उत्तर सिर्फ यही है कि यह हमारा सौभाग्य है कि पूज्यश्री के जीवन चरित्र के साथ हम सभी को उस सब बातों की भी जानकारी मिल रही है जिसकी जानकारी हर एक जैन श्रावक को विरासत और धरोहर के रूप में अवश्य ही होनी चाहिए।             आज के प्रसंग से तो कई गौरवशाली बातें ज्ञात होंगी। म

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?ग्वालियर - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०७

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०७   ?                     "ग्वालियर"                   पूज्य शान्तिसागरजी महराज का संघ सोनागिरि में धर्मामृत की वर्षा करता हुआ संघ ग्वालियर पहुँचा। ग्वालियर प्राचीन काल से जैन संस्कृति का महान केंद्र रहा है।            ग्वालियर के किले में चालीस, पचास-पचास फीट ऊँची खडगासन दस-पंद्रह मनोज्ञ दिगम्बर प्रतिमाओं का पाया जाना तथा और भी जैन वैभव की सामग्री का समुपलब्ध होना इस बात का प्रमाण है कि पहले ग्वालियर का राजवंश जैन संस्कृति का परम भक्त तथा महान आर

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?चार व्रतियों की निर्वाण दीक्षा - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०६

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०६   ?          "चार व्रतियों की निर्वाण दीक्षा"              चारित्र चक्रवर्ती परम पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज के १९२९ के उत्तरभारत की भूमि पर द्वितीय चातुर्मास के उपरांत उनका विहार बूंदेलखंड के भव्य तीर्थस्थलों की वंदना करते हुए निर्वाण स्थल सोनागिरि को हुआ। सोनागिरि में एक नया इतिहास लिखा गया, पूज्य शान्तिसागरजी महराज की भांति, कर्मनिर्जरा के निमित्त घोर तपश्चरण करने वाले चार शिष्यों को निर्ग्रन्थ दीक्षा का सौभाग्य भी सोनागिरि की भूमि को ही प

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?टीकमगढ़ नरेश पर प्रभाव - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०५

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०५   ?             "टीकमगढ़ नरेश पर प्रभाव"                      पपौराजी जाते हुए महराज टीकमगढ़ में ठहरे थे। टीकमगढ़ स्टेट में जैनधर्म और जैनगुरु का बड़ा प्रभाव प्रभाव पढ़ा। टीकमगढ़ नरेश आचार्यश्री का वार्तालाप हुआ था। उससे टीकमगढ़ नरेश बहुत प्रभावित हुए थे।              आचार्य महराज में बड़ी समय सूचकता रही है। किस अवसर पर, किस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार उचित और धर्मानुकूल होगा, इस विषय में महराज सिद्ध-हस्त रहे हैं।                   बुंदेलखंड अपने ग

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?प्रस्थान - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०४

?   अमृत माँ जिनवाणी से -- ३०४   ?                      "प्रस्थान"                मगसिर वदी पंचमी को पूज्य शान्तिसागरजी महराज ससंघ ने ललितपुर से बिहार किया। जब पूज्यश्री ने ललितपुर छोड़ा, तब लगभग चार-पाँच हजार जनता ने दो-तीन मील तक महराज के चरणों को न छोड़ा। अंत मे सबने गुरुचरणों को प्रणाम किया, और अपने ह्रदय में सदा के लिए उनकी पवित्र मूर्ति अंकित कर वे वापिस आ गए। लगभग पाँच सौ व्यक्ति सिरगन ग्राम पर्यन्त गुरुदेव के पीछे-पीछे गए।                पूज्यश्री के ललितपुर से प्रस्था

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?भयंकर उपवासों के बीच अद्भुत स्थिरता - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०३

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०३   ? "भयंकर उपवासों के बीच अद्भुत स्थिरता"               पूज्य शान्तिसागरजी महराज के लंबे उपवासों के बीच में ही प्रायः ललितपुर का चातुर्मास पूर्ण हो गया। बहुत कम लोग उनको आहार देने का सौभाग्य लाभ कर सके।                  जैनों के सिवाय जैनेत्तरों में जैन मुनिराज की तपश्चर्या की बड़ी प्रसिद्धि हो रही थी। आचार्य महराज की अपने व्रतों में तत्परता देखकर कोई नहीं सोच सकता, कि इन योगिराज ने इतना भयंकर तप किया है। दूर-दूर के लोंगो ने आकर घोर तपस्वी मुनिरा

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?पारणा का दिन - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०२

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०२   ?                 "पारणा का दिन"              पारणा का प्रभात आया। आचार्यश्री ने भक्ति पाठ वंदना आदि मुनि जीवन के आवश्यक कार्यों को बराबर कर लिया। अब चर्या को रवाना  होना है। सब लोग अत्यंत चिंता  समाकुल हैं।            प्रत्येक नर-नारी प्रभु से यही प्रार्थना कर रहे हैं कि आज आहार निर्विघ्न हो जाए। क्षीण शरीर में खड़े होने की भी शक्ति नहीं दिखता, चलने की बात दूसरी है, और फिर खड़े होकर आहार का हो जाना और भी कठिन दिखता था। ऐसे विशिष्ट क्षणों में घो

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?सिंह निष्क्रिडित व्रत - अमृत माँ जिनवाणी से - ३०१

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३०१   ?               "सिंहनिःक्रिडित तप"                   पूज्य शान्तिसागर महराज के उत्तर भारत में कटनी में प्रथम चातुर्मास के उपरांत उनके द्वितीय चातुर्मास का परम सौभाग्य ललितपुर को प्राप्त हुआ।                ललितपुर आने पर आचार्य महराज ने सिंहनिः क्रिडित तप किया था। यह बड़ा कठिन व्रत होता है। इस उग्र तप से आचार्य महराज का शरीर अत्यंत क्षीण हो गया था। लोगों की आत्मा उनको देख चिंतित हो जाती थी कि किस प्रकार आचार्य देव की तपश्या पूर्ण होती है।

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?देवद्रव्य - अमृत माँ जिनवाणी से - ३००

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज इस श्रृंखला के ३०० प्रसंग पूर्ण हुए। ग्रंथ के यशस्वी लेखक स्वर्गीय पंडित श्री सुमरेचंदजी दिवाकर का  हम सभी पर महान उपकार रहा जो उनकी द्वारा लिखित ग्रंथ "चारित्र चक्रवर्ती" के माध्यम से पूज्य शान्तिसागरजी महराज के दिव्य जीवन को अनुभव कर पा रहे हैं।         अभी तक आचार्यश्री के अनेक जीवन प्रसंगों को प्रस्तुत किया गया, लेकिन ग्रंथ के आधार पर अभी भी पूज्य शान्तिसागरजी महराज के जीवन चरित्र के अनेकों प्रसंग प्रस्तुत करना शेष है। प्रस्तुती का यह क्रम चलता रह

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?सिवनी के जिनालयों की चर्चा - अमृत माँ जिनवाणी से - २९९

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९९   ?          "सिवनी के जिनालय की चर्चा"                      एक दिन मैंने आचार्य महराज को सिवनी के विशाल जैनमंदिरों का चित्र दिखाया। उस समय आचार्यश्री ने कहा, "जबलपुर से वह कितनी दूर है?"       मैंने कहा, "महराज, ९५ मील पर है।"            महराज बोले, "हम जब जबलपुर आये थे, तब तुमसे परिचय नहीं था, नहीं तो सिवनी अवश्य जाते।"             मैंने कहा, "महराज ! उस समय तो मैं काशी में विद्याभ्यास करता था, इसी से आपसे वहाँ पधारने की प्रार्थना करन

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?जबलपुर में भव्य आगवानी - अमृत माँ जिनवाणी से - २९८

?   अमृत माँ जिनवाणी से- २९८   ?             जबलपुर में भव्य आगवानी"              पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज कटनी चातुर्मास के उपरांत जबलपुर की ओर विहार हुआ। आचार्यश्री के सानिध्य में पनागर में हुए समारम्भ में जबलपुर की बहुत सी समाज भी आ गयी थी। इससे वहाँ की शोभा और बढ़ गई थी। संघ का पनागर आना ही जबलपुर के भाग्य उदित होने के उषा काल सदृश था। धार्मिक लोग सोच रहे थे, यहाँ कब संघ आता है? शनिवार के प्रभात में संघ जबलपुर की ओर रवाना हुआ।                जबलपुर के अधारताल क

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?भविष्य की बातों का पूर्वदर्शन - अमृत माँ जिनवाणी से - २९७

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९७   ?      "भविष्य की बातों का पूर्वदर्शन"                सन १९४७ में पूज्य शान्तिसागर महराज ने वर्षायोग सोलापुर में व्यतीत किया था। मैं भी गुरुदेव की सेवा में व्रतों में पहुंचा था। एक दिन व्रतों के समय पूज्यश्री के मुख से निकला "ये रजाकार लोग हैदराबाद रियासत में बड़ा पाप व अनर्थ कर रहे हैं। इनका अत्याचार सीमा को लांघ रहा है। इनको अब खत्म होने में तीन दिन से अधिक समय नहीं लगेगा।"           महराज के मुख से ये शब्द सुने थे। उसके दो चार रोज बाद ही सरद

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?देवज्ञ का कथन - अमृत माँ जिनवाणी से - २९६

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९६   ?                   "देवज्ञ का कथन"              एक बार एक उच्चकोटि के ज्योतिषशास्त्र के विद्वान को आचार्य महराज की जन्मकुंडली दिखाई थी। उसे देखकर उन्होंने कहा था, जिस व्यक्ति की यह कुंडली है, उनके पास तिलतुष मात्र भी संपत्ति नहीं होना चाहिए, किन्तु उनकी सेवा करने वाले लखपति, करोड़पति होने चाहिए।             उन्होंने यह भी कहा था कि इनकी शारीरिक शक्ति गजब की होनी चाहिए। बुद्धि बहुत तीव्र बताई थी और उन्हें महान तत्वज्ञानी भी बताया था। ?

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?विहार - अमृत माँ जिनवाणी से - २९५

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९५   ?                         "विहार"                अगहन कृष्णा एकम् का दिन आया। आहार के उपरांत महराज ने सामयिक की और जबलपुर की ओर विहार किया। उस समय आचार्य महराज में कटनी के प्रति रंचमात्र भी मोह का दर्शन नहीं होता था। उनकी मुद्रा पर वैराग्य का ही तेज अंकित था।                 हजारों व्यक्ति, जिनमें बहुसंख्यक अजैन भी थे, बहुत दूर तक महराज को पहुंचाने गए। महराज अब पुनः कटनी लौटने वाले तो थे नहीं, क्या ऐसा सौभाग्य पुनः मिल सकता है?          

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?पश्चाताप - अमृत माँ जिनवाणी से - २९४

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९४   ?                       "पश्चाताप"                    लेखक दिवाकरजी पूर्व समय में उनके द्वारा गलत संगति में पूज्य शान्तिसागरजी महराज की चर्या की परीक्षा का जो भाव था उसके संबंध में लिखते हैं कि ह्रदय में यह भाव बराबर उठते थे कि मैंने कुसंगतिवश क्यों ऐसे उत्कृष्ट साधु के प्रति अपने ह्रदय में अश्रद्धा के भावों को रखने का महान पातक किया? संघ में अन्य सभी साधुओं का भी जीवन देखा, तो वे भी परम पवित्र प्रतीत हुए।               मेरा सौभाग्य रहा जो मैं

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?गुरुदेव का व्यक्तित्व - अमृत माँ जिनवाणी से - २९३

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९३   ?               "गुरुदेव का व्यक्तित्व"              दिवाकर जी लिखते हैं कि पूज्य आचार्यश्री महराज को देखकर आँखे नहीं थकती थी। उनके दो बोल आँखों में अमृत घोल घोल देते थे। उनकी तात्विक-चर्चा अनुभूतिपूर्ण चर्चा अनुभवपूर्ण एवं मार्मिक होती थी।             वहाँ से काशी आने की इच्छा नहीं होती थी। ह्रदय में यही बात आती थी कि जब सच्चे गुरु यहाँ विराजमान हैं, तो इनके अनुभव से सच्चे तत्वों को समझ जाए। यही तो सच्चे शास्त्रों का अध्ययन है।          

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?आचार्य चरणों का प्रथम परिचय - अमृत माँ जिनवाणी से - २९२

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९२   ?         "आचार्य चरणों का प्रथम परिचय"                   इस चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ के यशस्वी लेखक दिवाकरजी कटनी के चातुर्मास के समय का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि मैंने भी पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज के जीवन का निकट निरीक्षण नहीं किया था। अतः साधु विरोधी कुछ साथियों के प्रभाववश मैं पूर्णतः श्रद्धा शून्य था।               कार्तिक की अष्टान्हिका के समय काशी अध्यन निमित्त जाते हुए एक दिन के लिए यह सोचकर कटनी ठहरा कि देखें इन साधुओं का

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?श्रावकों की भक्ति - अमृत माँ जिनवाणी से - २९१

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९१   ?                   "श्रावकों की भक्ति"                 पूज्य शान्तिसागरजी महराज के कटनी चातुर्मास निश्चित होने के बाद श्रावकों को अपने भाग्य पर आश्चर्य हो रहा था कि किस प्रकार अद्भुत पुण्योदय से पूज्यश्री ससंघ का चातुर्मास अनायास ही नहीं, अनिच्छापूर्वक, ऐसी अपूर्व निधि प्राप्त हो गई। बस अब उनकी भक्ति का प्रवाह बड़ चला।            जो जितने प्रबल विरोधी होता है, वह दृष्टि बदलने से उतना ही अधिक अनुकूल भी बन जाता है। इंद्रभूति ब्राह्मण महावीर भगवा

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?आगम भक्त - अमृत माँ जिनवाणी से - २९०

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २९०   ?                    "आगम भक्त"                   कुछ शास्त्रज्ञों ने सूक्ष्मता से आचार्यश्री के जीवन को आगम की कसौटी पर कसते हुए समझने का प्रयत्न किया। उन्हें विश्वास था कि इस कलीकाल के प्रसाद से महराज का आचरण भी अवश्य प्रभावित होगा, किन्तु अंत में उनको ज्ञात हुआ कि आचार्य महराज में सबसे बड़ी बात यही कही जा सकती है कि वे आगम के बंधन में बद्ध प्रवृत्ति करते हैं और अपने मन के अनुसार स्वछन्द प्रवृत्ति नहीं करते हैं।               स्थानीय कुछ लोगो

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?कटनी चातुर्मास - अमृत माँ जिनवाणी से - २८९

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २८९   ?                       "कटनी चातुर्मास"               पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज ससंघ ने कुम्भोज बाहुबली तीर्थ से तीर्थराज शिखरजी वंदना हेतु सन १९२७ में प्रस्थान किया। तीर्थराज की वंदना के उपरांत उन्होंने उत्तर भारत के श्रावकों को अपने प्रवास से धन्य किया।        चारित्र चक्रवर्ती पूज्य शान्तिसागरजी महराज के उत्तर भारत में प्रथम चातुर्मास का सौभाग्य मिला कटनी (म.प्र) को। आषाढ़ सुदी तीज को संघ कटनी से चार मील दूरी पर स्थित चाका ग्राम प

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?छने जल के विषय में - अमृत माँ जिनवाणी से - २८८

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २८८   ?                "छने जल के विषय में "             कल हम देख रहे थे कि पूज्य शान्तिसागरजी महराज ने पलासवाढ़ा में अजैन गृहस्थ को भी अनछने जल त्याग का मार्गदर्शन दिया।              मनुस्मृति जो हिन्दू समाज का मान्य ग्रंथ है लिखा है- "दृष्टि पूतं न्यसेतपादम, वस्त्रपूतं पिबेज्जलम" अर्थात देखकर पाव रखे और छानकर पानी पिए)।               सन १९५० में हम राणा प्रताप के तेजस्वी जीवन से संबंधित चितौड़गढ़ के मुख्य द्वार पर पहुँचे तो वहाँ एक घट की वस्त्र

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?गाँजा पीने की प्रार्थना - अमृत माँ जिनवाणी से - २८७

?   अमृत माँ जिनवाणी से - २८७   ?             "गांजा पीने की प्रार्थना"           पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज ने चैत्र वदी एकम् को ससंघ शिखरजी से प्रस्थान किया। वहाँ से उन्होंने चम्पापुरी, पावापुरी, बनारस, इलाहाबाद आदि स्थानों को होते हुए १९ जून १९२८ को मैहर राज्य में प्रवेश किया।               पलासवाड़ा ग्राम के समीप एक गृहस्थ महराज के समीप आया। उसने भक्तिपूर्वक इन्हें प्रणाम किया। वह समझता था, ये साधु महराज हमारे धर्म के नागा बाबा सदृश होंगे, जो गाँजा, चिल्लम, तम्बा

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