Jump to content
Sign in to follow this  
  • entries
    338
  • comments
    9
  • views
    9,062

About this blog

जाने प्रथमाचार्य शान्तिसागरजी महराज को

Entries in this blog

 

☀उपवास तथा महराज के विचार - ३३६

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३६  ?
       *उपवास तथा महराज के विचार*
          सन १९५८ के व्रतों में १०८ नेमिसागर महराज के लगभग दस हजार उपवास पूर्ण हुए थे और चौदह सौ बावन गणधर संबंधी उपवास करने की प्रतिज्ञा उन्होंने ली।        महराज ! लगभग दस हजार उपवास करने रूप अनुपम तपः साधना करने से आपके विशुद्ध ह्रदय में भारत देश का भविष्य कैसा नजर आता है?        देश अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुष्काल, अंनाभाव आदि के कष्टों का अनुभव कर रहा है।          महराज नेमिसागर जी ने कहा- "जब भारत पराधीन था, उस समय की अपेक्षा स्वतंत्र भारत में जीववध, मांसाहार आदि तामसिक कार्य बड़े वेग से बढ़ रहे हैं। इनका ही दुष्परिणाम अनेक कष्टों का आविर्भाव तथा उनकी वृद्धि है।"
? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का*?
    ?आजकी तिथी - वैशाख कृष्ण १?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀देहली चातुर्मास की घटना - ३३५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,       
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती शान्तिसागर जी महराज का श्रमण संस्कृति में इतना उपकार है जिसका उल्लेख नहीं किया जा सकता। उनके उपकार का निर्ग्रन्थ ही कुछ अंशों में वर्णन कर सकते हैं।       पूज्य शान्तिसागर जी महराज ने श्रमण संस्कृति का मूल स्वरूप मुनि परम्परा को देशकाल में हुए उपसर्गों के उपरांत पुनः जीवंत किया था। यह बात लंबे समय से उनके जीवन चरित्र को पढ़कर हम जान रहे हैं। आज का भी प्रसंग उसी बात की पुष्टि करता है। *? अमृत माँ जिनवाणी से- ३३५  ?*
         *"देहली चातुर्मास की घटना*"
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के सुयोग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज ने देहली चातुर्मास की एक बात पर इस प्रकार प्रकाश डाला था-      "देहली में संघ का चातुर्मास हो रहा था। उस समय नगर के प्रमुख जैन वकील ने संघ के नगर में घूमने की सरकारी आज्ञा प्राप्त की थी। उसमें नई दिल्ली, लालकिला, जामा मस्जिद, वायसराय भवन आदि कुछ स्थानों पर जाने की रोक थी।         जब आचार्य महराज को यह हाल विदित हुआ, तब उनकी आज्ञानुसार मैं, चंद्रसागर, वीरसागर उन स्थानों पर गए थे, जहाँ गमन के लिए रोक लगा दी गई थी।         आचार्य महराज ने कह दिया था कि जहाँ भी विहार में रोक आवे, तुम वहीं बैठ जाना।        हम सर्व स्थानों पर गए। कोई रोक-टोक नहीं हुई। उन स्थानों पर पहुँचने के उपरांत फोटो उतारी गई थी, जिससे यह प्रमाणित होता था कि उन स्थानों पर दिगम्बर मुनि का विहार हो चुका हैं।"        नेमीसागर महराज ने बम्बई में उन स्थानों पर भी विहार किया है, जहाँ मुनियों के विहार को लोग असंभव मानते थे। हाईकोर्ट, समुद्र के किनारे जहाँ जहाजों से माल आता जाता है। ऐसे प्रमुख केन्दों पर भी नेमीसागर महराज गए, इसके चित्र भी खिचें हैं।         इनके द्वारा दिगम्बर जैन मुनिराज के सर्वत्र विहार का अधिकार स्पष्ट सूचित होता है। साधुओं की निर्भीकता पर भी प्रकाश पड़ता है। ? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का*?
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀घुटने के बल पर आसन - ३३४

? *अमृत माँ जिनवाणी से - ३३४* ?      *"घुटनों के बल पर आसान"*          नेमीसागर महराज घुटनों के बल पर खड़े होकर आसान लगाने में प्रसिद्ध रहे हैं। मैंने पूंछा- "इससे क्या लाभ होता है?" उन्होंने बताया - "इस आसान के लिए विशेष एकाग्रता लगती है। इससे मन का निरोध होता है। बिना एकाग्रता के यह आसन नहीं बनता है। इसे "गोड़ासन" कहते हैं।        इससे मन इधर उधर नहीं जाता है और कायक्लेश तप भी पलता है। दस बारह वर्ष पर्यन्त मैं वह आसन सदा करता था, अब वृद्ध शरीर हो जाने से उसे करने में कठिनता का अनुभव होता है।"        मैंने पूंछा- "महराज ! गोड़ासन करते समय घुटने के नीचे कोई कोमल चीज आवश्यक है या नहीं?"        वे बोले- "मैं कठोर चट्टान पर भी आसन लगाकर जाप करता था। भयंकर से भयंकर गर्मी में भी गोड़ासन पाषाण पर लगाकर सामयिक करता था। मेरे साथी अनेक लोगों ने इस आसन का उद्योग किया, किन्तु वे सफल नहीं हुए।"          ध्यान के लिए सामान्यतः पद्मासन, पल्यंकासन और कायोत्सर्ग आसन योग्य हैं। अन्य प्रकार का आसन कायक्लेश रूप है। गोड़ासन करने की प्रारम्भ की अवस्था में घटनों में फफोले उठ आए थे। मैं उनको दबाकर बराबर अपना आसन का कार्य जारी रखता था।" ? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का* ?
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀सर्वप्रथम ऐलक शिष्य - ३३३

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३३३  ?        *"सर्वप्रथम ऐलक शिष्य"*         पूज्य शान्तिसागर जी महराज के सुशिष्य नेमीसागर जी महराज ने बताया कि- "आचार्य महराज जब गोकाक पहुँचे तब वहाँ मैंने और पायसागर ने एक साथ ऐलक दीक्षा महराज से ली। उस समय आचार्य महराज ने मेरे मस्तक पर पहले बीजाक्षर लिखे थे। मेरे पश्चात पायसागर के दीक्षा के संस्कार हुए थे।     *"समडोली में निर्ग्रन्थ दीक्षा*"           "दीक्षा के दस माह बाद मैंने समडोली में निर्ग्रन्थ दीक्षा ली थी। वहाँ आचार्य महराज ने पहले वीरसागर के मस्तक पर बीजाक्षर लिखे थे, पश्चात मेरे मस्तक पर लिखे थे। इस प्रकार मेरी और वीरसागर की समडोली में एक साथ मुनि दीक्षा हुई थी। वहाँ चंद्रसागर ऐलक बने थे।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल द्वादशी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀पिताजी से चर्चा - ३३२

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३३२  ?
                *पिताजी से चर्चा*
      पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के सुयोग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज द्वारा उनके मोक्षमार्ग में प्रवृत्ति का वृतांत ज्ञात हुआ। गृहस्थ जीवन के बारे में उन्होंने बताया कि-    "एक दिन मैंने अपने पिताजी से कुड़ची में कहा- "मैं चातुर्मास में महराज के पास जाना चाहता हूँ।"        वे बोले -"तू चातुर्मास में उनके समीप जाता है, अब क्या वापिस आएगा? "पिताजी मेरे जीवन को देख चुके थे, इससे उनका चित्त कहता था कि आचार्य महराज का महान व्यक्तित्व मुझे सन्यासी बनाए बिना नहीं रहेगा। यथार्थ में हुआ भी ऐसा।"
            *जीवनधारा में परिवर्तन*         "चार माह के सत्संग ने मेरी जीवन धारा बदल दी। मैंने महराज से कहा- "महराज ! मेरे दीक्षा लेने के भाव हैं। अपने कुटुम्ब से परवानगी लेने का विचार नहीं है। घर वाले कैसे मंजूरी देंगे? मुफ्त में नौकर मिलता है, जो कुटुम्ब की सेवा करता रहता है, तब फिर परवानगी कौन देगा?"        महराज ने कहा- "ऐसा शास्त्र में कहा है कि आत्मकल्याण के हेतु आज्ञा प्राप्त करना परम आवश्यक नहीं है।"      "नेमीसागर जी ने बताया कि मेरे दीक्षा लेने के भाव अठारह वर्ष की अवस्था में ही उत्पन्न हो चुके थे। उसके पूर्व की मेरी कथा विचित्र थी।"   यह कथा प्रसंग क्रमांक ३३० में भेजी गई थी। पुनः प्रेषित करता हूँ?? *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
    ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल ११?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀परिचय -३३१

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३१ ?                    *परिचय*
        पंडित श्री दिवाकर जी ने लिखा कि पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य मुनिश्री १०८ नेमीसागर जी महराज महान तपस्वी हैं।       नेमीसागर जी महराज ने बताया कि "हमारा और आचार्य महराज का ५० वर्ष पर्यन्त साथ रहा। चालीस वर्ष के मुनिजीवन के पूर्व मैंने गृहस्थ अवस्था में भी उनके सत्संग का लाभ लिया था।        आचार्य महराज कोन्नूर में विराजमान थे। वे मुझसे कहते थे- "तुम शास्त्र पढ़ा करो। मैं उनका भाव लोगों को समझाऊँगा।"         वे मुझे और बंडू को शास्त्र पढ़ने को कहते थे। मैं पाँच कक्षा तक पढ़ा था। मुझे भाषण देना नहीं आता था। शास्त्र बराबर पढ़ लेता था, इससे महराज मुझे शास्त्र बाचने को कहते थे। मेरे तथा बंडू के शास्त्र बाँचने पर जो महराज का उपदेश होता था, उससे मन को बहुत शांति मिलती थी।           अज्ञान भाव दूर होता था। ह्रदय के कपाट खुल जाते थे। उनका सत्संग मेरे मन में मुनि बनने का उत्साह प्रदान करता था। मेरा पूरा झुकाव गृह त्यागकर साधु बनने का हो गया था।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
 ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल दशमी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀पूर्व जीवन में मुस्लिम प्रभाव - ३३०


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         कल से हमने पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य महान तपस्वी नेमीसागर जी महराज के जीवन चरित्र को जानना प्रारम्भ किया था।         आज के प्रसंग को जानकर हम सभी को ज्ञात होगा कि जीव कैसे-कैसे वातावरण से निकल कर मोक्ष मार्ग में लग सकता है। ? *अमृत माँ जिनवाणी से - ३३०*  ?       *"पूर्व जीवन में मुस्लिम प्रभाव"*
       पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज का पूर्व जीवन सचमुच में आश्चर्यप्रद था। उन्होंने यह बात बताई थी -      "मैं अपने निवास स्थान कुड़ची ग्राम में मुसलमानों का स्नेह पात्र था। मैं मुस्लिम दरगाह में जाकर पैर पड़ा करता था। सोलह वर्ष की अवस्था तक मैं वहाँ जाकर उदबत्ती जलाता था। शक्कर चढ़ाता था।"       "जब मुझे अपने धर्म की महिमा का ज्ञान हुआ, तब मैंने दरगाह आदि की तरफ जाना बंद कर दिया। मेरा परिवर्तन मुसलमानों को सहन नहीं हुआ। वे लोग मेरे विरुद्ध हो गए और मुझे मारने का विचार करने लगे।"         *"ऐनापुर में स्थान परिवर्तन*"          "ऐसी स्थिति में अपनी धर्म-भावना के रक्षण के निमित्त मैं कुचडी से चार मील की दूरी पर स्थित ऐनापुर ग्राम में चला गया। वहाँ के पाटील की धर्म में रुचि थी। वह हम पर बहुत प्यार करता था। इससे मैंने ऐनापुर में ही रहना ठीक समझा।"
*? स्वाध्याय चा.चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल नवमी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀जीवन में उपवास साधना - 329


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        चारित्र चक्रवर्ती पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के जीवन चरित्र की प्रस्तुती की इस श्रृंखला में प्रस्तुत किए शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य मुनिश्री पायसागर जी महराज के जीवन चरित्र को सभी ने बहुत ही पसंद किया तथा सभी के जीवन को प्रेरणादायी जाना।         आज से पूज्य पायसागर जी महराज की भांति आश्चर्य जनक जीवन चरित्र के धारक पूज्य नेमीसागर जी महराज के जीवन चरित्र की कुछ प्रसंगों में प्रस्तुती की जायेगी। *? अमृत माँ जिनवाणी से - ३२९  ?*         
          *"जीवन में उपवास साधना"*
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य पूज्य नेमीसागर जी महराज के दीक्षा के ४४ वर्ष ही हो गए एक उपवास, एक आहार का क्रम प्रारम्भ से चलता आ रहा है। इस प्रकार उनका नर जन्म का समय उपवासों में व्यतीत हुआ। उन्होंने तीस चौबीसी व्रत के ७२० उपवास किए।  कर्मदहन के १५६ तथा चारित्रशुद्धि व्रत के १२३४ उपवास किए।  दशलक्षण के ५ बार १०-१० उपवास किये। अष्टान्हिका में तीन बार ८-८ उपवास किए। लोणंद में महराज नेमीसागर ने सोलहकारण के १६ उपवास किए थे।       इस प्रकार उनकी तपस्या अद्भुत रही है। २, ३, ४ उपवास तो वह जब चाहे तब करते थे।
*? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल अष्टमी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀नवधाभक्ति - 328

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३२८  ?
          *"नवधा भक्ति का कारण"*
       आचार शास्त्र पर पूज्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी महराज का असाधारण अधिकार था, यही कारण है कि सभी उच्च श्रेणी के विद्वान आचार शास्त्र की शंकाओं का समाधान आचार्य महराज से प्राप्त करते थे। आचार्यश्री की सेवा में रहने से अनेक महत्व की बातें ज्ञात हुआ करती थी।      शास्त्र में कथित नवधा-भक्ति के संबंध में आचार्यश्री ने कहा था- "नवधा भक्ति अभिमान-पोषण के हेतु नहीं है। वह धर्म रक्षण के लिए है। उससे जैनी की परीक्षा होती है। अन्य लोग धोखा नहीं दे सकते हैं।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
    ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल ७?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

☀शरीरविस्मृति - 327

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३२७  ?                     *शरीरविस्मृति*
        सन् १९५२ के आरम्भ में पूज्य आचार्य महराज शान्तिसागर जी महराज दहीगाँव नाम के तीर्थक्षेत्र में विराजमान थे। एक दिन वहाँ के मंदिर से दूसरी जगह जाते हुए उनका पैर ठीक सीढ़ी पर न पड़ा, इसलिए वे जमीन पर गिर पड़े।        यह तो बड़े पुण्य की बात थी कि वह प्राण लेने वाली दुर्घटना एक पैर में गहरा घाव ही दे पाई। महराज के पैर में डेढ़ इंच गहरा घाव हो गया, जिसमें एक बादाम सहज ही समा सकती थी। उस स्थिति में महराज ने पैर में किसी प्रकार की पट्टी वगैरह नहीं बंधवाई, एक साधारण सी निर्दोष औषधि पैर में लगती थी।           उनके पास सिवनी से दो व्यक्ति दर्शनार्थ पहुँचे थे। उन्होंने आकर हमें सुनाया कि महराज के पास हमें तीन चार घंटे रहने का सौभाग्य मिला था। उस समय हम लोगों ने यह विलक्षण बात देखी कि पैर में भयंकर चोट होते हुए भी उन्होंने हमारे सामने एक बार भी अपने पैर के घाव की ओर दृष्टि नहीं दी।         उनकी शरीर के प्रति कितनी निर्ममता थी इसका ज्ञान उनके पैर के घाव के प्रति उपेक्षा भाव से स्पष्ट होता था। *?स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?अमृत माँ जिनवाणी से - पथ प्रदर्शक - ३२६

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२६   ?
                  "पथ प्रदर्शक"
       कल के प्रसंग के माध्यम से हमने जाना कि पूज्य चारित्र चक्रवर्ती शान्तिसागरजी महराज के प्रारंभिक जीवन में किन ग्रंथो का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा था।        दिवाकर जी जिज्ञासा पर पूज्य शान्तिसागर जी महराज ने कहा, "शास्त्रों में स्वयं कल्याण नहीं है। वे तो कल्याण के पथ प्रदर्शक हैं। देखो ! सड़क पर कहीं खम्भा गड़ा रहता है, वह मार्गदर्शन कराता है। इष्ट स्थान पर जाने को तुम्हें पैर बढ़ाना होगा। वासनाओं की दासता का त्याग ही कल्याणजनक है।"
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
 ?आज की तिथी - आषाढ़ शुक्ल ५?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?अमृत माँ जिनवाणी से - किन ग्रंथों का प्रभाव पढ़ा - ३२५

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२५   ?
          "किन ग्रंथों का प्रभाव पढ़ा"
           एक बार पूज्य शान्तिसागरजी महराज के जीवन चरित्र के लेखक दिवाकरजी ने पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज से पूछा, "महराज ! प्रारम्भ में कौन से शास्त्र आपको विशेष प्रिय लगते थे और किन ग्रंथो  ने आपके जीवन को विशेष प्रभावित किया?          महराज ने कहा, "जब हम पंद्रह-सोलह वर्ष के थे तब हिन्दी में समयसार तथा आत्मानुशासन बांचा करते थे। हिन्दी रत्नकरंडश्रावकाचार की टीका भी पढ़ते थे। इससे मन को बड़ी शांति मिलती थी।          आत्मानुशासन पढ़ने से मन में वैराग्य भाव बढ़ता था। इसमें वैराग्य तथा स्त्रीसुख से विरक्ति का अच्छा वर्णन है। इससे हमारा मन त्याग की ओर बढ़ता था। इरादा १७-१८ वर्ष की अवस्था से ही मुनि बनने का था।"       महराज ने यह भी बताया कि आत्मानुशासन की चर्चा अपने श्रेष्ट सत्यव्रती मित्र रुद्रप्पा नामक लिंगायत बंधु से किया करते थे। इन दोनो महापुरुषों का परस्पर में तत्व विचार चला करता था। महराज ने कहा था कि "आत्मानुशासन की कथा रुद्रप्पा को बड़ी प्रिय लगती थी।"
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
  ?आजकी तिथी - आषाढ़ शुक्ल ४?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?अमृत माँ जिनवाणी से - बालकों पर प्रेम - ३२४

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२४   ?
                 "बालकों पर प्रेम"
        वीतराग की सजीव मूर्ति होते हुए आचार्यश्री में अपार वात्सल्य पाया जाता था। लगभग १९३८ के भाद्रपद की बात है। उस समय महराज ने बारामती में सेठ रामचंद्र के उद्यान में चातुर्मास किया था।         एक दिन अपरान्ह में महराज का केशलोंच हो रहा था। उनके समीप एक छोटा तीन वर्ष की अवस्था वाला स्वस्थ सुरूप तथा नग्न मुद्रा वाला बालक महराज को केशलोंच करते देखकर नकल करने वाले बंदर के समान अपने बालों को पकड़कर धीरे-२ खीचता था।       उस बालक को देखकर महराज का मुख सस्मित हो गया और उन्होंने सहज आशीर्वाद दे उसके सिर पर अपनी पिच्छी से स्पर्श कर दिया।        लौंच के उपरांत जब महराज का मौन खुला, तब मैंने महराज से पूंछा- "महराज इस बालक के मस्तक पर आपने पिच्छी का स्पर्श क्यों करा दिया?"         जब वे कुछ न बोले, तब मैंने कहा - "महराज ! मुनिपद को बालकवत निर्विकार कहा गया है। अपने पक्षवालों को देखकर किसे प्रेम उत्पन्न नहीं होता है। प्रतीत होता है, इसी कारण उस बालक पर आपका वात्सल्य जागृत हो गया?"     महराज के सस्मित मुख से प्रतीत होता है कि मौन द्वारा मेरा समर्थन किया। ? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
  ?आज की तिथी- आषाढ़ शुक्ल ३?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?विवेकशून्य भक्ति - 323

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२३   ?                 "विवेकशून्य भक्ति"    
       बारामती में एक धुरंधर शास्त्री आए। उन्होंने महराज के चरणों में पुष्प रख दिया। महराज ने पूंछा, "यह क्या किया?"        वे बोले- "महराज देव, गुरु, शास्त्र समान रूप से पूज्यनीय हैं। देव की पुष्प से पूजा के समान आपकी चरणपूजा की है।       महराज ने कहा ऐसा करोगे तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा, भगवान के अभिषेक के समान शास्त्र का अभिषेक नहीं किया जाता है। हर एक बात की मर्यादा होती है।"        अपने वचन के पोषनार्थ में पुनः शास्त्री जी ने पूंछा, "महराज चरणों में पुष्प रखने से क्या बाधा हो गई?"        महराज ने कहा -"शरीर की उष्णता से जीवों का प्राणघात हो जायेगा, अतः ऐंसा नहीं करना चाहिए।"
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?निवासकाल - अमृत माँ जिनवाणी से - ३२२

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२२   ?                   "निवासकाल"     
            नीरा में जैनमित्र के संपादक श्री मूलचंद कापड़िया ने "दिगम्बर जैन" का 'त्याग' विशेषांक पूज्यश्री को समर्पित किया। उस समय आचार्य महराज पूना के समीपस्थ नीरा स्टेशन के पास दूर एक कुटी में विराजमान थे।             कुछ समय के बाद पूज्यश्री का आहार हुआ। पश्चात आचार्य महराज सामायिक को जा रहे थे। संपादकजी तथा संवाददाता महाशय महराज की सेवा में आये। कापढ़िया ने पूंछा- "महराज आप अभी यहाँ कब तक हैं?"         महराज ने कहा- "हमें नहीं मालूम। सामायिक तक तो यहाँ ही हैं। आगे का क्या निश्चित ?"        जैनमित्र संपादक ने कहा- "महराज ! हमे अभी रेल से जाना है।"       महराज ने कहा- "तुमको इतनी जल्दी क्या है?"       उन्होंने कहा- "महराज अभी फुरसत नहीं है।"       महराज ने पूंछा- "फुरसत कब मिलेगी कापडिया ! तुम इतने वृध्द हो गए। अब कब फुरसत मिलेगी?      इस प्रश्न का उत्तर वे या हम सभी क्या देंगे? परिग्रह की आराधना में निमग्न सारे संसार के समक्ष आचार्य देव का यह महान प्रश्न है- "अब कब फुरसत मिलेगी?"     महराज ने बताया था- "एक व्यक्ति ने हमें आहार दिया। हम सामायिक को बैठ गए। सामायिक पूर्ण होने पर हमें यह खबर दी गई कि आपको आहार देने वाले उन व्यक्ति का प्राणांत हो गया।"
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आज की तिथी - वैशाख शुक्ल ११?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?महत्वपूर्ण शंका का समाधान - अमृत माँ जिनवाणी से - ३२१


जय जिनेन्द्र बंधुओं,      आज के प्रसंग में आप पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज द्वारा गाय के दूध के संबंध में एक महत्वपूर्व जिज्ञासा के दिए गए रोचक समाधान को जानेगे। आप अवश्य पढ़ें। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२१   ?
          "महत्वपूर्ण शंका समाधान"
        अलवर में एक ब्राम्हण प्रोफेसर महाशय आचार्यश्री के पास भक्तिपूर्वक आए और पूछने लगे कि- "महराज ! दूध क्यों सेवन किया जाता है? दुग्धपान करना मुत्रपान के समान है?"         महराज ने कहा,"गाय जो घास खाती है, वह सात धातु-उपधातु रूप बनता है। पेट में दूध का कोठा तथा मल-मूत्र का कोठा जुदा-२ है। दूध में रक्त, मांस का भी संबंध नहीं है। इससे दुग्धपान करने में मल मूत्र का संबंध नहीं है।"          इसके पश्चात महराज ने पूंछा,"यह बताओ की तालाब, नदी आदि में मगर, मछली आदि जलचर जीव रहते हैं या नहीं?"        प्रोफेसर,"हाँ ! महराज वे रहते हैं, वह तो उनका घर ही है।"      महराज, "अब विचारो जिस जल में मछली आदि, आदि मल मूत्र मिश्रित रहता है, उसे आप पवित्र मानते हुए पीते हो, और जिसका कोठा अलग रहता है, उस दूध को अपवित्र कहते हो, यह न्यायोचित बात नहीं है।        इसके पश्चात महराज ने कहा, "हम लोग तो पानी छानते हैं, किन्तु जो बिना छना पानी पीते हैं, उनके पीने में मलादि का उपयोग हो जाता है।"         यह सुनते ही वे विद्वान चुप हो गए। संदेह का शल्य निकल जाने से मन को बड़ा संतोष होता है।          पुनः महराज ने यह भी कहा, "जो यह सोचते हैं कि गाय का दूध उसके बछड़े के लिए ही होता है, वह भी दोषपूर्ण कथन है। गाय के अंदर बच्चे की आवश्यकता से अधिक दूध होता है।" आचार्यश्री की इस अनुभव उक्ति से उन पठित पुरुषों की भ्रांति दूर हो जाती है, जिन्होंने दूध ग्रहण को सर्वथा क्रूरता पूर्ण समझ रखा है।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
 ?आज की तिथी - वैशाख शुक्ल ३?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?दिल्ली चातुर्मास - अमृत माँ जिनवाणी से - ३२०


जय जिनेन्द्र बंधुओं,           पूज्य शान्तिसागरजी महराज का सर्वत्र विहार आप सभी सामान्य दृष्टि से देख रहे होंगे। उस समय पूज्यश्री का विहार एक सामान्य बात नहीं थी क्योंकि उस समय भी देश परतंत्र ही था, ऐसी स्थिति में भी सन १९३१ में देश की राजधानी दिल्ली में चातुर्मास एक विशेष ही बात थी। उस समय परतंत्रता के समय में देश के केंद्र राजधानी दिल्ली में चातुर्मास पूज्य आचार्यश्री के दिगम्बरत्व को पुनः सर्वत्र प्रचारित होने की भावना का परिचायक है। और देश में सर्वत्र उनका अत्यंत प्रभावना के साथ निर्विध्न विहार उनके संयम और तपश्चरण का ही प्रभाव था। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१९   ?
                "दिल्ली चातुर्मास"
             दिल्ली आगमन के उपरांत पूज्य शान्तिसागरजी महराज का हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान हुआ। वहाँ अनेक स्थानों के भव्य जीवों का कल्याण करते हुए दिल्ली समाज के सौभाग्य से पुनः संघ का वहाँ आगमन हुआ।             पूज्यश्री ने ससंघ राजधानी में ही चातुर्मास करने का निश्चय किया। संघ का निवास दरियागंज में हुआ था। पहले गुरुदेव के वियोग से जिन लोगों को संताप पहुँचा था, उनके आनंद का पारावार न रहा जब उनको ज्ञात हुआ कि अब दिल्ली का भाग्य पुनः जग गया, जहाँ ऐसे मुनिराज का चार माह तक धर्मोपदेश होगा।           लोगों के मन में आशंका होती थी कि अंग्रेजों का राज्य है, कही राजधानी में मुनि विहार पर प्रतिबंध न आ जावे, किन्तु आचार्यश्री के सामने भय का नाम नहीं था। वे तो पूर्णतः निर्भय हैं। जो मृत्यु से भी सदा झूजने को तैयार रहते रहे हैं। उनको किस बात का डर होगा।
?समस्त देहली में दिगम्बर मुनियों का            
                   स्वतंत्र विहार?                   मुनि संघ दरियागंज में स्थित था, किन्तु संघ के साधु आहार के लिए दिल्ली शहर के मुख्य-मुख्य राजपत्रों से आया जाया करते थे। कहीं कोई भी रोक टोक नहीं हुई। यह उनके तप का महान तेज था, जो उस समय दिगम्बर मुनियों का संघ निर्विघ्न रीति से भारत की राजधानी में भ्रमण करता रहा।         बड़े-बड़े राज्याधिकारी, न्यायाधीश आदि महराज के दर्शन करके अपने को धन्य मानते थे। दिगम्बर मुनियों का विहार न होने से कई लोगों को दिगम्बरत्व यथार्थ में 'अंधे की टेढ़ी खीर' जैसी समस्या बन जाया करता है, किन्तु किन्तु प्रत्यक्ष परिचय में आने वाले लोगों को वे परमाराध्य, सर्वदा, वंदनीय और मुक्ति का अनन्य उपाय प्रतीत होते हैं।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
  ?आजकी तिथी - वैशाख शुक्ल २? ☀
    कल दान तीर्थ प्रवर्तन पर्व "अक्षय तृतीया पर्व" है। अक्षय तृतीया ही वह विशेष तिथी थी जिसमें हम सभी श्रावकों को मुनियों को आहार दान द्वारा अतिशय पुण्योपर्जन की विधी का ज्ञान हुआ था।            इस विशेष पर्व को मुनियों को नवधा भक्ति पूर्वक आहार दान तथा वैयावृत्ति करके मनाना चाहिए।

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?दिल्ली प्रवास में प्रभावना - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१९


जय जिनेन्द्र बंधुओ,     
          आज के प्रसंग में हम सभी देखेंगे कि किस तरह पूज्य शान्तिसागरजी महराज के ससंघ त्याग तथा तपश्चरण के फलस्वरूप पूज्यश्री के दिल्ली में १९३० के दिल्ली प्रवास के समय अपूर्व प्रभावना हुई। हर सम्प्रदाय के लोगों ने इनके सम्मुख व्रत नियम आदि स्वीकार कर अपने आपको धन्य किया।           राजधानी दिल्ली में सैकड़ों श्रावक आजीवन शुद्र जल का त्याग कर पूज्यश्री के ससंघ को आहार देने का सौभाग्य सहर्ष प्राप्त कर रहे थे।         अवश्य ही उन क्षणों का लेखक का यह चित्रण हम सभी श्रावकों के मन को आह्लाद से भर देता है। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१९   ?
             "दिल्ली प्रवास में प्रभावना"
               पूज्य शान्तिसागरजी महराज ससंघ का जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ता था। बहुत से मुसलमानों आदि ने मांस तथा मदिरा का त्याग किया था।             हरिजनों आदि का महराज ने सच्चा कल्याण किया था। बहुत से गरीब साधु महराज के दर्शन को आये थे, महराज उनको प्रेममय बोली में समझाते थे, "भाई, जीवों की दया पालने से जीव सुखी होता है। दूसरों जीवों को मारकर खाना बड़ा पाप है, इससे ही जीव दुखी रहता है।"            महराज के शब्दों का बड़ा प्रभाव होता था। तपश्चर्या से वाणी का प्रभाव बहुत अधिक हो जाता है। सैकड़ो हजारों हरिजनों आदि लोगों ने शराब तथा मांस सेवन का त्याग किया था तथा और भी व्रत लोग लेते थे।              अग्नि में संतप्त किया स्वर्ण विशेष दीप्तिमान होता है, उसी प्रकार तपोग्नि द्वारा जीवन वाणी, विचार, मलिनता विमुक्त हो तेजोमय तथा दिव्यतापूर्ण होते हैं।           आचार्यश्री के प्रति भक्ति इतनी बड़ रही थी कि लगभग सत्तर अस्सी चौके लगा करते थे। बिना शुद्र जल का त्याग किये कोई आहार नहीं दे सकता था लेकिन महराज को आहार देने के अपूर्व सौभाग्य के आगे नियम की कठिनता लोगों को कुछ भी नहीं दिखती थी।             उस समय लोग कहते थे कि छोटी सी प्रतिज्ञा ने हमारा अशुध्द भोजन से पिण्ड छुड़ा दिया अतः आत्म कल्याण के साथ-साथ शरीर की निरोगता का कारण बन गई। इसने स्वावलंबी जीवन को भी प्रेरणा दी।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
  ?आजकी तिथी - वैशाख शुक्ल १?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?एक अंग्रेज की शंका का समाधान - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१८


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज का प्रसंग हर एक मनुष्य के मष्तिस्क में उठ सकने वाले प्रश्न का समाधान है। पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज द्वारा दिया गया समाधान बहुत ही आनंद प्रद है।           अपने जीवन के प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखने वाले पाठक श्रावक अवश्य ही इस समाधान को जानकर आनंद का अनुभव करेंगे। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१८   ?
        "एक अंग्रेज का शंका समाधान"
       एक दिन एक विचारवान भद्र स्वभाव वाला अंग्रेज आया।       उसने पूज्य शान्तिसागरजी महराज से पूंछा, "महराज ! आपने संसार क्यों छोड़ा, क्या संसार में रहकर आप शांति प्राप्त नहीं कर सकते थे?"          महराज ने समझाया, "परिग्रह के द्वारा मन में चंचलता, राग, द्वेष आदि विकार होते हैं। पवन के बहते रहने से दीपशिखा कम्पन रहित नहीं हो सकती है। पवन के आघात से समुद्र में लहरों की परम्परा उठती जाती है। पवन के शांत होते ही दीपक की लौ स्थिर हो जाती है, समुद्र प्रशांत हो जाता है, इसी प्रकार राग- द्वेष के कारण रूप धन वैभव कुटुम्ब आदि को छोड़ देने पर मन में चंचलता नहीं रहता है।          मन के शांत रहने पर आत्मा भी शांत हो जाती है। निर्मल जीवन द्वारा मानसिक शांति आती है।          विषय भोग की आसक्ति द्वारा इस जीव की मनोवृत्ति मलिन होती है। मलिन मन पाप का संचय करता हुआ दुर्गति में जाता है। परिग्रह को रखते हुए पूर्णतः अहिंसा धर्म का पालन नहीं हो सकता है, अतएव आत्मा की साधना निर्विघ्न रुप से करने के लिए विषय भोगों का त्याग आवश्यक है।            विषय भोगों से शांति भी तो नहीं होती है। आज तक इतना खाया, पिया, सुख भोगा, फिर भी क्या तृष्णा शांत हुई? विषयों की लालसा का रोग कम हुआ? वह तो बढ़ता ही जाता है।         इससे भोग के बदले त्याग का मार्ग अंगीकार करना कल्याणकारी है। संसार का जाल ऐसा है कि उसमें जाने वाला मोहवश कैदी बन जाता है। वह फिर आत्मा का चिंत्वन नहीं कर पाता है।        दूसरी बात यह है कि जब जीव मरता है, तब सब पदार्थ यही रह जाते हैं, साथ में अपने कर्म के सिवाय कोई भी चीज नहीं जाती है, इससे बाह्य पदार्थों में मग्न रहना, उनसे मोह करना अविचारित कार्य है।"        इस विषय में आचार्यश्री की मार्मिक, अनुभवपूर्ण बातें सुनकर हर्षित हो वह अंग्रेज नतमस्तक हो गया।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आजकी तिथी-वैशाख कृ०अमावस?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?भारत की राजधानी दिल्ली में प्रवेश - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१७


        मैं पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज के जीवन चरित्र का लगातार अध्ययन कर रहा हूँ, फलस्वरूप मेरी दृष्टि में पूज्यश्री का दिल्ली का चातुर्मास एक महत्वपूर्ण चातुर्मास था। इस चातुर्मास के माध्यम से दिगम्बरत्व का प्रचार भली प्रकार से हुआ। सर्वत्र दिगम्बर मुनिराज के दर्शन व जन-जन तक उनके स्वरूप की जानकारी पहुँचना पूज्य शान्तिसागरजी महराज के उत्कृष्ट तपश्चरण का ही प्रभाव था। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१७   ?
  "भारत की राजधानी दिल्ली में प्रवेश"
                पूज्य शान्तिसागरजी महराज ने ससंघ  ललितपुर चातुर्मास के उपरांत बूंदेलखड की सभी तीर्थ, ग्वालियर, आगरा, मथुरा विभिन्न स्थानों को अपनी पदरज से धन्य करते हुए राजधानी दिल्ली में प्रवेश किया।           खुरजा के अपने अमृत-उपदेश से उपकृत करते हुए संघ ने प्रस्थान कर सिकन्दराबाद में निवास किया। इसके अनंतर गजियाबाद तथा शहादरा होते हुए पौष सुदी दशमी को संघ ने भारत की राजधानी दिल्ली में प्रवेश किया।        कहते हैं, अब पचास हजार से भी अधिक संख्या हो गई है। वहाँ धार्मिक प्रकृति के लोग बहुत हैं, इसलिए संघ के आने पर दिल्ली समाज के रोम-रोम में आनंद व्याप्त होता था।            राजधानी के योग्य गौरवपूर्ण जुलूस द्वारा आचार्य शान्तिसागर महराज के प्रति भक्ति व्यक्त की गई। बडे-बड़े प्रतिष्ठान तथा विचारशील नागरिक तथा उच्च अधिकारी लोग आचार्यश्री के दर्शनार्थ आते थे, अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न करते थे तथा समाधान प्राप्त कर हर्षित होते थे।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आजकी तिथी- वैशाख कृ० १३/१४?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?सर सेठ हुकुमचंद और उनका ब्रम्हचर्य व्रत - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१६

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१६   ?
"सरसेठ हुकुमचंद और उनका ब्रम्हचर्य प्रेम"
            लेखक दिवाकरजी ने लिखा है कि सर सेठ हुकुमचंद जी के विषय में बताया कि आचार्य महराज ने उनके बारे ये शब्द कहे थे, "हमारी अस्सी वर्ष की उम्र हो गई, हिन्दुस्तान के जैन समाज में हुकुमचंद सरीखा वजनदार आदमी देखने में नहीं आया।          राज रजवाड़ों में हुकुमचंद सेठ के वचनों की मान्यता रही है। उनके निमित्त से जैनों का संकट बहुत बार टला है। उनको हमारा आशीर्वाद है, वैसे तो जिन भगवान की आज्ञा से चलने वाले सभी जीवों को हमारा आशीर्वाद है।'              हुकुमचंद के विषय में एक समय आचार्य महराज ने कहा था, "एक बार संघपति गेंदनमल और दाडिमचंद ने हमारे पास से जीवन भर के लिए ब्रम्हचर्य व्रत लिया, तब हुकुमचंद सेठ ने इसकी बहुत प्रसंशा की। उस समय आचार्यश्री ने हुकुमचंद सेठ से कहा 'तुमको भी ब्रम्हचर्य व्रत लेना चाहिए।'          हुकुमचंद ने तुरंत ब्रम्हचर्य व्रत लिया और कहा था, 'महराज ! आगामी भव में भी ब्रम्हचर्य का पालन करूँ।' हुकुमचंद का ब्रम्हचर्य व्रत पर इतना प्रेम है।"
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
 ?आज की तिथी - वैशाख कृष्ण १२?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?दीक्षा तथा चातुर्मासों का विवरण - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         आज चारित्र चक्रवर्ती पूज्य शान्तिसागरजी महराज के जीवन पर्यन्त के एक महत्वपूर्ण विवरण को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह पोस्ट आप संरक्षित रखकर बहुत सारे रोचक प्रसंगों के वास्तविक समय का अनुमान लगा पाएँगे तथा उनके तपश्चरण की भूमि का समय के सापेक्ष में भी अवलोकन कर पाएँगे। विवरण ग्रंथ में उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही है।
?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१५   ?               "चातुर्मास सूची" पूज्य शान्तिसागर जी महराज की दीक्षा संबंधी जानकारी का विवरण निम्न है-
क्षुल्लक दीक्षा         -  १९१५
ऐलक    दीक्षा        -  १९१९
मुनि      दीक्षा        -   १९२०
आचार्य    पद        -   १९२४
चारित्र चक्रवर्ती पद -   १९३७
आचार्य पद त्याग   -   १९५५
समाधि                -   १९५५ 
               ?चातुर्मास विवरण?
क्र.       सन          स्थान १.       १९१५       कोगनोली
२.       १९१६       कुम्भोज
३.       १९१७       कोगनोली
४.       १९१८       जैनवाड़ी
५.       १९१९       नसलापुर
६.       १९२०       ऐनापुर
७.       १९२१    नसलापुर
८.       १९२२       ऐनापुर
९.       १९२३       कोंनुर
१०.    १९२४       समडोली ११.    १९२५       कुम्भोज
१२.    १९२६       नांदनी
१३.    १९२७       बाहुबली
१४.    १९२८       कटनी
१५.   १९२९       ललितपुर
१६.   १९३०       मथुरा
१७.   १९३१       दिल्ली
१८.   १९३२       जयपुर
१९.   १९३३       ब्यावर
२०.   १९३४       उदयपुर २१.   १९३५       गोरल
२२.   १९३६       प्रतापगढ़
२३.   १९३७       गजपंथा
२४.   १९३८       बारामती
२५.   १९३९       पावागढ़
२६.   १९४०       गोरल
२७.   १९४१       अकलुज
२८.   १९४२       कोरोची
२९.   १९४३       डिगरज
३०.   १९४४       कुंथलगिरी ३१.   १९४५       फलटन
३२.   १९४६       कवलाना
३३.   १९४७       सोलापुर
३४.   १९४८       फलटण
३५.   १९४९       कवलाना
३६.   १९५०       गजपंथा
३७.   १९५१       बारामती
३८.   १९५२       लोनंद
३९.   १९५३       कुंथलगिरी
४०.   १९५४       फलटन
४१.   १९५५       कुंथलगिरी
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
  ?आज की तिथी - वैशाख कृष्ण ११?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

?वैयावृत्त धर्म व आचार्यश्री - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१४

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१४   ?
       "वैयावृत्त धर्म और आचार्यश्री"
        किन्ही मुनिराज के अस्वस्थ होने पर वैयावृत्त की बात तो सबको महत्व की दिखेगी, किन्तु श्रावक की प्रकृति भी बिगड़ने पर पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महराज का ध्यान प्रवचन-वत्सलता के कारण विशेष रूप से जाता था। आचार्यश्री श्रेष्ट पुरुष होते हुए भी अपने को साधुओं में सबसे छोटा मानते थे।        एक बार १९४६ में  कवलाना में ब्रम्हचारी फतेचंदजी परवार भूषण नागपुर वाले बहुत बीमार हो गए थे। उस समय आचार्य महराज उनके पास आकर बोले, "ब्रम्हचारी ! घबराना मत, अगर यहाँ श्रावक लोग तुम्हारी वैयावृत्त में प्रमाद करेंगे, तो हम तुम्हारी सम्हाल करेंगे।"               जब लेखक की ब्रम्हचारीजी से कवलाना में भेट हुई, तब उन्होंने आचार्यश्री की सांत्वना और वात्सल्य की बात कही थी। उससे ज्ञात हुआ कि महराज वात्सल्य गुण के भी भंडार थे।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
 ?आज की तिथी - वैशाख कृष्ण १०?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१३

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१३   ?
       "ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"  
            एक दिन पूज्य शान्तिसागरजी महराज कहने लगे-" हमारी भक्ति करने वाले को जैसे हम आशीर्वाद देते हैं, वैसे ही हम प्राण लेने वालों को भी आशीर्वाद देते हैं।उनका कल्याण चाहते हैं।"             इन बातों की साक्षात परीक्षा राजाखेड़ा के समय हो गई। ऐसे विकट समय पर आचार्य महराज का तीव्र पुण्य ही संकट से बचा सका, अन्यथा कौन शक्ति थी जो ऐसे योजनाबद्ध षड्यंत से जीवन की रक्षा कर सकती?             कदाचित आचार्य महराज का विहार ह्रदय की प्रेरणा के अनुसार हो गया होता, तो राजाखेड़ा कांड नहीं होता, किन्तु भवितव्य अमित है। और भी जगह देखा गया है कि भक्त लोग महराज से अनुरोध करते थे और करुणा भाव से वे लोगों का मन रखते थे, तब प्रायः गड़बड़ी हुई है। जब भी महराज ने आत्मा की आवाज के अनुसार काम किया तब कुछ भी बाधा नहीं आयी।
? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आज की तिथी - चैत्र शुक्ल नवमीं?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

धर्म संकट - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१२

जय जिनेन्द्र बंधुओं,  
         पूज्य शान्तिसागरजी महराज के जीवन के इस प्रसंग को जानकर आपको बहुत सारी बातें देखने को मिलेगीं। साम्य मूर्ति पूज्य शान्तिसागरजी महराज के सम्मुख बड़ी बड़ी विपत्तियाँ यूँ ही टल जाती थीं, यह उनकी महान आत्मसाधना का ही प्रतिफल था। वर्तमान में पूज्य आचार्य विद्यासागरजी महराज तथा अन्य और भी मुनिराजों के जीवन का अवलोकन करने से अनायास ही ज्ञात हो जायेगा।                दिगम्बर मुनिराज की अद्भुत क्षमा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि नंगी तलवारों से उन पर प्रहार करने आए गुंडों के समूह के लोगों को भी उनके अपराध के फलस्वरूप कैद से छुड़वाने के लिए वह यह कहकर आहार को न निकले कि "मेरे कारण यह जेल में दुख भोग रहा है तो ऐसे मैं कैसे आहार को निकल सकता हूँ। ऐसे प्रसंगों को हमको स्वयं जानना चाहिए और अन्य सभी लोगों को भी दिगम्बर मुनिराजों की अनंत क्षमा से परिचित कराना चाहिए। ?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१२   ?
                     "धर्म संकट"
               अब पाँचवा दिन आया, किसे कल्पना थी कि आज कल्पनातीत उपद्रव होगा, किन्तु सुयोग की बात कि उस दिन आचार्य महराज चर्या के हेतु कुछ पूर्व निकल गए थे। आहार की विधि भी शीघ्र सम्पन्न हो गई।              सब त्यागी लोग चबूतरे पर सामायिक करने का विचार कर रहे थे, आचार्यश्री ने आकाश पर दृष्टि डाली और उन्हें कुछ मेघ दिखाई दिए। यथार्थ में वे जल के मेघ नहीं, विपत्ति की घटा के सूचक बादल थे। उनको देखकर आचार्यश्री ने कहा कि 'आज सामायिक भीतर बैठकर करो'।               गुरुदेव के आदेश का सबने पालन किया। सब मुनिराज आत्मा के ध्यान में मग्न हो गए। सर्व जीवों के प्रति हमारे मन में समता का भाव है, यह उन्होंने अपने मन में पूर्णतः चिंतवन किया और तत्व चिंतन भी प्रारम्भ किया। अन्य श्रावक लोग अतिथि संविभाग कार्य के पश्चात अपने-२ भोजन में लगे।               इतने में क्या देखते हैं, लगभग ५०० गुंडे नंगी चमचमाती तलवार लेकर मुनि संघ पर प्रहार करने के हेतु छिद्दी ब्राम्हण के साथ वहाँ आ गए।             मुनिराज आज बाहर ध्यान नहीं कर रहे थे, इससे उनकी आक्रमण करने की पाप भावना मन के मन में ही रही आयी। उन नीचों ने जैन श्रावकों पर आक्रमण किया। श्रावकों ने यथायोग्य साधनों से मुकाबला किया। श्रावकों ने जोर की मार लगाकर उन आतताइयों को दूर भगाया था, किन्तु शस्त्र सज्जित होने के कारण वे पुनः बढ़ते आते थे, ताकि जैन साधुओं के प्राणों के साथ होली खेलें। श्रावक भी गुरुभक्त थे। प्राणों की परवाह न करते हुए उनसे खूब लड़े। किसी का हाथ कटा किसी की अंगुली कटी, जगह-२ चोट आई।          इतने में संध्या को रियासत की सेना आयी, तब इन नर पिशाचों का उपद्रव रुका। छिद्दी नामक ब्राम्हण पकड़ लिया गया। उस उपद्रव के समय संघ के साधुओं में भय का लेश भी नहीं था, वे ऐसे बैठे थे, मानों कोई चिंता की बात ही न होवे। उन्होंने अद्भुत आत्म संयम का परिचय दिया। उस समय मेघो ने भयंकर वर्षा कर दी थी, इससे उपद्रवकारियों का मनोबल सफल न हो पाया। प्रकृति ने धर्म रक्षा में योग दया था।             पुलिस के बड़े-२ अधिकारी मुनि महाराजों के पास आये। उनके दर्शन कर उनके मन में उपद्रव कारियों के प्रति भयंकर क्रोध जागृत हुआ। वे सोचने लगे, ऐसे महात्मा पर जुल्म करने की उन नरपिशाचों ने चेष्टा कर बड़ा पाप किया। उनको कड़ी से कड़ी सजा देंगे।    ?साम्य भाव अर्थात विश्व बंधुत्व?                   प्रभात का समय आया। आचार्य महराज ने यह प्रतिज्ञा की थी, कि जब तक तुम छिद्दी ब्राम्हण को हिरासत से नहीं छोड़ोगे, तब तक हम आहार नहीं लेंगे।              आचार्य महराज के व्यवहार को देखकर कौन कहेगा कि इनकी दृष्टि में भी कोई शत्रु नाम की प्राणधारी मूर्ति है? अपने अनन्त प्रेम से ये समस्त विश्व को मंगलमय बनाते हैं। ? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आज की तिथी - चैत्र शुक्ल अष्टमी?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

Sign in to follow this  
×