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Showing content with the highest reputation since 07/08/2020 in all areas

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    सिविल सर्विस(IAS IPS IFS) 2019 में सफल (टॉप165) जैन भाई बहनों को बधाई All India Rank 1.हिमांशु जैन रैंक-4 2.रवि जैन रैंक-9 3.अजय जैन। रैंक-12 4.अनमोल जैन रैंक-14 5.अभिषेक जैन रैंक-24 6.आयुषी जैन रैंक-41 7.अमित जैन। रैंक-100 8.विशाखा जैन रैंक-101 9.मयूर खंडेलबाल जैन रैंक-106 10.नबल कुमार जैन रैंक-125 11.राघब जैन रैंक-127 12.akarshi jain रैंक-140 13.अभिषेक ओसवाल जैन रैंक-154 14.चिराग जैन रैंक-160 15.अंगद मेहता जैन रैंक-161 16.अहिंसा जैन रैंक-164 समस्त जैन समाज आप पर गर्व करता है
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    सभी जैन भाई बहनों को बहुत बहुत बधाई और आशीर्वाद, ऐसे ही प्रगति करते रहे। आप सभी ने जैन समाज का नाम रोशन किया है।
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    ..........🙏 जय जिनेन्द्र 🙏🙏 नमस्ते 🙏........ * शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये । * सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है । * त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं। * रोज़ कुछ त्याग करने से असंख्यात बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है * नरक गति का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते हैं । दिनांक - 3 - 8 - 2020 ------------------------------ "" आप चाहे तो सिर्फ आज के लिये ये नियम / त्याग भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते हैं 🙏* आज श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा , सोमवार है , 🙏 आज किन्ही भी 2 लोगों को जय जिनेंद्र / जय राम जी की या जो भी भगवान का नाम हम मानते है वो नमस्ते की जगह बोलने का नियम 🙏* 🔻विनम्र आग्रह🔻 🐄🐈 एक रोटी या कुछ भी जीव दया के लिए हम भी देवे और अपने सभी जानकारों को भी रोज़ ऐसा करने के लिए प्रेरित करें 🙏🙏 🙏🙏 निवेदन :-(शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की भावना रखे ) आज - 3 - 8 - 2020 एक दिन का संकल्प करना चाहते हैं तो प्रति उत्तर में नियम / त्याग लिखकर के वापिस ग्रुप में पोस्ट भी कर सकते हैं (आप नीचे दिए गए लिंक पर नियम लेने के लिए comment कर के भी नियम ले सकते हैं ) https://jainsamaj.vidyasagar.guru/blogs/blog/8-1
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    हा मै exam देना चाहती हूँ। जय जिनेन्द्र उपहार की जरुरत नही परिग्रह नही बढाना ञान बढाना हे।
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    अध्याय-१ सूत्र-५ कृपया निक्षेप का अर्थ बताएं?
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    चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्- नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन, किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥
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    उपजाति छन्द: सत्त्वेषु मैत्रीं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपा-परत्वम्। माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ, सदा ममात्मा विदधातु देव॥ १॥ शरीरत: कत्र्तुमनन्त-शक्तिं, विभिन्नमात्मानमपास्त-दोषम्। जिनेन्द्र! कोषादिव खड्ग-यष्टिं, तव प्रसादेन ममाऽस्तु शक्ति:॥ २॥ दु:खे सुखे वैरिणि बन्धुवर्गे, योगे वियोगे भवने वने वा। निराकृताशेष-ममत्वबुद्धे: समं मनो मेऽस्तु सदाऽपि नाथ!॥ ३॥ मुनीश! लीनाविव कीलिताविव, स्थिरौ निखाताविव बिम्बिताविव। पादौ त्वदीयौ मम तिष्ठतां सदा, तमोधुनानौ हृदि दीपकाविव॥ ४॥ एकेन्द्रियाद्या यदि देव! देहिन:, प्रमादत: सञ्चरता इतस्तत:। क्षता विभिन्ना मिलिता निपीडितास्, तदस्तु मिथ्या दुरनुष्ठितं तदा॥ ५॥ विमुक्तिमार्ग-प्रतिकूलवर्तिना, मया कषायाक्षवशेन दुर्धिया। चारित्रशुद्धेर्यदकारि लोपनं, तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो!॥ ६॥ विनिन्दनाऽऽलोचन-गर्हणैरहं, मनोवच:कायकषाय-निर्मितम्। निहन्मि पापं भवदु:खकारणं, भिषग्विषं मन्त्रगुणैरिवाखिलम्॥ ७॥ अतिक्रमं यद्विमतेव्र्यतिक्रमं, जिनातिचारं सुचरित्रकर्मण:। व्यधामनाचारमपि प्रमादत:, प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये॥८॥ क्षतिं मन: शुद्धि-विधेरतिक्रमं, व्यतिक्रमं शील-व्रतेर्विलङ्घनम्। प्रभोऽतिचारं विषयेषु वर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तताम्॥ ९॥ यदर्थमात्रा-पदवाक्यहीनं, मया प्रमादाद्यदि किञ्चनोक्तम्। तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी, सरस्वती केवलबोधलब्धिम्॥ १०॥ बोधि: समाधि: परिणामशुद्धि:, स्वात्मोपलब्धि: शिवसौख्यसिद्धि:। चिन्तामणिं चिन्तितवस्तुदाने, त्वां वन्दमानस्य ममास्तु देवि!॥ ११॥ य: स्मर्यते सर्वमुनीन्द्रवृन्दै, र्य: स्तूयते सर्वनराऽमरेन्द्रै:। यो गीयते वेदपुराणशास्त्रै:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १२॥ यो दर्शनज्ञानसुखस्वभाव:, समस्त-संसार-विकारबाह्य:। समाधिगम्य: परमात्मसञ्ज्ञ:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १३॥ निषूदते यो भवदु:खजालं, निरीक्षते यो जगदन्तरालम्। योऽन्तर्गतो योगिनिरीक्षणीय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १४॥ विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो, यो जन्ममृत्युव्यसनाद्यतीत:। त्रिलोकलोकी विकलोऽकलङ्क: स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १५॥ क्रोडीकृताऽशेष-शरीरिवर्गा, रागादयो यस्य न सन्ति दोषा:। निरिन्द्रियो ज्ञानमयोऽनपाय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १६॥ यो व्यापको विश्वजनीनवृत्ते:, सिद्धो विबुद्धो धुतकर्मबन्ध:। ध्यातो धुनीते सकलं विकारं, स देवदेवो हृदये ममास्ताम्॥ १७॥ न स्पृश्यते कर्मकलङ्कदोषै: यो ध्वान्तसङ्घैरिव तिग्मरश्मि:। निरञ्जनं नित्यमनेकमेकं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये॥ १८॥ विभासते यत्र मरीचिमाली, न विद्यमाने भुवनावभासी। स्वात्मस्थितं बोधमयप्रकाशं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये॥ १९॥ विलोक्यमाने सति यत्र विश्वं, विलोक्यते स्पष्टमिदं विविक्तम्। शुद्धं शिवं शान्तमनाद्यनन्तं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये॥ 20॥ येन क्षता मन्मथमानमूच्र्छा, विषादनिद्राभय-शोक-चिन्ता:। क्षतोऽनलेनेव तरुप्रपञ्चस्, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये॥ २१॥ न संस्तरोऽश्मा न तृणं न मेदिनी, विधानतो नो फलको विनिर्मित:। यतो निरस्ताक्षकषाय-विद्विष:, सुधीभिरात्मैव सुनिर्मलो मत:॥ २२॥ न संस्तरो भद्र! समाधिसाधनं, न लोकपूजा न च सङ्घमेलनम्। यतस्ततोऽध्यात्मरतो भवानिशं, विमुच्य सर्वामपि बाह्यवासनाम्॥ २३॥ न सन्ति बाह्या मम केचनार्था भवामि तेषां न कदाचनाहम्। इत्थं विनिश्चित्य विमुच्य बाह्यं, स्वस्थ: सदा त्वं भव भद्र! मुक्त्यै॥ २४॥ आत्मानमात्मन्यवलोक्यमानस् त्वं दर्शनज्ञानमयो विशुद्ध:। एकाग्रचित्त: खलु यत्र तत्र, स्थितोऽपि साधुर्लभते समाधिम्॥ २५॥ एक: सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मल: साधिगमस्वभाव:। बहिर्भवा: सन्त्यपरे समस्ता, न शाश्वता: कर्मभवा: स्वकीया:॥ २६॥ यस्यास्ति नैक्यं वपुषापि साद्र्धं, तस्यास्ति किं पुत्र-कलत्र-मित्रै:। पृथक्कृते चर्मणि रोमकूपा:, कुतो हि तिष्ठन्ति शरीरमध्ये॥ २७॥ संयोगतो दु:खमनेकभेदं, यतोऽश्नुते जन्मवने शरीरी। ततस्त्रिधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निर्वृतिमात्मनीनाम्॥ २८॥ सर्वं निराकृत्य विकल्प-जालं, संसार-कान्तार- निपातहेतुम्। विविक्तमात्मानमवेक्ष्य-माणो, निलीयसे त्वं परमात्मतत्त्वे॥ २९॥ स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्। परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा॥ ३०॥ निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किञ्चन। विचारयन्नेव-मनन्यमानस:, परो ददातीति विमुञ्च शेमुषीम्॥ ३१॥ यै: परमात्माऽमितगतिवन्द्य:, सर्वविविक्तो भृशमनवद्य:। शश्वदधीतो मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते॥ ३२॥ इति द्वात्रिंशतावृत्तै:, परमात्मानमीक्षते। योऽनन्यगत-चेतस्को, यात्यसौ पदमव्ययम्॥
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