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Showing content with the highest reputation since 05/05/2020 in all areas

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    🙏🏻जिणवाणी थुदि🙏🏻🌹 सिरि जिणवाणी जग कल्लाणी जगजणमदतममोहहरी जणमणहारी गणहरहारी जम्मजराभवरोगहरी । तित्थयराणं दिव्वझुणिं जो पढइ सुणइ मईए धारइ णाणं सोक्खमणंतं धरिय सासद मोक्खपदं पावइ ।।
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    ..........🙏 जय जिनेन्द्र 🙏🙏 नमस्ते 🙏........ * शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये । * सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है । * त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं। * रोज़ कुछ त्याग करने से असंख्यात बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है * नरक गति का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते हैं । दिनांक - 2 - 6 - 2020 ------------------------------ "" आप चाहे तो सिर्फ आज के लिये ये नियम / त्याग भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते हैं 🙏 आज ज्येष्ठा शुक्ल की ग्यारस है * ।आज मंगलवार है * । * आज ग़ुस्सा करने का त्याग (नियम कम से कम 2 घंटे के लिए ) *🙏 🔻विनम्र आग्रह🔻 🐄🐈 एक रोटी या कुछ भी जीव दया के लिए हम भी देवे और अपने सभी जानकारों को भी रोज़ ऐसा करने के लिए प्रेरित करें 🙏🙏 🙏🙏 निवेदन :-(शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की भावना रखे ) आज - 2 - 6 - 2020 एक दिन का संकल्प करना चाहते हैं तो प्रति उत्तर में नियम / त्याग लिखकर के वापिस ग्रुप में पोस्ट भी कर सकते हैं (आप नीचे दिए गए लिंक पर नियम लेने के लिए comment कर के भी नियम ले सकते हैं ) https://jainsamaj.vidyasagar.guru/blogs/blog/8-1
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    ..........🙏 जय जिनेन्द्र 🙏🙏 नमस्ते 🙏........ * शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये । * सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है । * त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं। * रोज़ कुछ त्याग करने से असंख्यात बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है * नरक गति का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते हैं । दिनांक - 1 - 6 - 2020 ------------------------------ "" आप चाहे तो सिर्फ आज के लिये ये नियम / त्याग भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते हैं 🙏 आज ज्येष्ठा शुक्ल की दशमी है * ।आज सोमवार है * । * आज काजू खाने का त्याग *🙏 🔻विनम्र आग्रह🔻 🐄🐈 एक रोटी या कुछ भी जीव दया के लिए हम भी देवे और अपने सभी जानकारों को भी रोज़ ऐसा करने के लिए प्रेरित करें 🙏🙏 🙏🙏 निवेदन :-(शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की भावना रखे ) आज - 1 - 6 - 2020 एक दिन का संकल्प करना चाहते हैं तो प्रति उत्तर में नियम / त्याग लिखकर के वापिस ग्रुप में पोस्ट भी कर सकते हैं (आप नीचे दिए गए लिंक पर नियम लेने के लिए comment कर के भी नियम ले सकते हैं ) https://jainsamaj.vidyasagar.guru/blogs/blog/8-1
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    ..........🙏 जय जिनेन्द्र 🙏🙏 नमस्ते 🙏........ * शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये । * सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है । * त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं। * रोज़ कुछ त्याग करने से असंख्यात बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है * नरक गति का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते हैं । दिनांक - 31 - 5 - 2020 ------------------------------ "" आप चाहे तो सिर्फ आज के लिये ये नियम / त्याग भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते हैं 🙏 आज ज्येष्ठा शुक्ल की नवमी है * ।आज रविवार है * । * आज रात को सोते (सोने के बाद से जब भी उठे जब तक ) समय चारों तरह के आहार का त्याग करके सोने का नियम *🙏 🔻विनम्र आग्रह🔻 🐄🐈 एक रोटी या कुछ भी जीव दया के लिए हम भी देवे और अपने सभी जानकारों को भी रोज़ ऐसा करने के लिए प्रेरित करें 🙏🙏 🙏🙏 निवेदन :-(शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की भावना रखे ) आज - 31 - 5 - 2020 एक दिन का संकल्प करना चाहते हैं तो प्रति उत्तर में नियम / त्याग लिखकर के वापिस ग्रुप में पोस्ट भी कर सकते हैं (आप नीचे दिए गए लिंक पर नियम लेने के लिए comment कर के भी नियम ले सकते हैं ) https://jainsamaj.vidyasagar.guru/blogs/blog/8-1
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    Sumat chandra jain parivar digoda tikamgarh
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    The entire family sat together to recite Namokar Mantra for 30 minutes
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    Namokar maha mantra held...🙏🙏 Slot no. 17 Date: 7 May 2020 Time: 4 PM to 4:30 pm
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    इत्थं यथा तव विभूति- रभूज्-जिनेन्द्र ! धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य। यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा, तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥
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    सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश! कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:। प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम् नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥
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    अतिशय क्षेत्र भातकुली जैन महाराष्ट्र नाम एवं पता - श्री आदिनाथ स्वामी दि. जैन संस्थान (अतिशय क्षेत्र), भातकुली जैन, ग्राम एवं तह. भातकुली जैन, जिला - अमरावती (महाराष्ट्र) पिन - 444721 टेलीफोन - 0721 - 2389041, 2389385, Email - utkarshtraders@reddimail.com संतोष जैन-099706 92038, शैलेष जैन - 096734 31796 क्षेत्र पर उपलब्ध सुविधाएँ आवास - कमरे (अटैच बाथरूम) - 13, कमरे (बिना बाथरूम) - 20 हाल-2 (यात्री क्षमता-250), गेस्ट हाऊस-प्रस्तावित - 4 फ्लेट यात्री ठहराने की कुल क्षमता - 500. भोजनशाला - अनुरोध पर सशुल्क प्रवचन गृह - क्षमता - 500 औषधालय - शीघ्र प्रारम्भ हो रहा है। पुस्तकालय - है। विद्यालय - नहीं। एस.टी.डी./ पी.सी.ओ.- है आवागमन के साधन रेल्वे स्टेशन - बड़नेरा (सेन्ट्रल रेल्वे) - 20 कि.मी. दूर बस स्टेण्ड - अमरावती से भातकुली जैन - 18 कि.मी. पहँचने का सरलतम मार्ग - रेल व सड़क मार्ग निकटतम प्रमुख नगर - अमरावती-18 कि.मी., नागपुर-170 कि.मी.,अकोला-90 कि.मी.,कारंजा-60 कि.मी., मुक्तागिरि-50 कि.मी., शिरपुर जैन-135 कि.मी., नेमगिरि-180 कि.मी. प्रबन्ध व्यवस्था संस्था - श्री आदिनाथ स्वामी दि. जैन संस्थान, भातकुली जैन अध्यक्ष - श्री सतीश वाय संगई (0721-2673333 नि. 2562833) मो.: 098230 - 39299, 09422855666) मंत्री - श्री नाना आत्माराम चांदुरकर (094239-49393) व्यवस्थापक - श्री जयकुमार भोंगाड़े (0721 - 2389041) क्षेत्र का महत्व क्षेत्र पर मन्दिरों की संख्या : 03 क्षेत्र पर पहाड़ : नहीं ऐतिहासिकता : भगवान आदिनाथ की मूलनायक प्रतिमा लगभग 2500 वर्ष पूर्व की है। 18 वीं शताब्दी के अंतिम काल में ग्राम प्रमुख को स्वप्न देकर भूगर्भ से निकाली गई, तत्पश्चात् पूज्य श्री नेमसागरजी महाराज के सानिध्य में मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। विशेष आयोजन : प्रति वर्ष दीपावली के पश्चात पंचमी को भगवान आदिनाथ का रथ-यात्रा महोत्सव होता है। विशेष जानकारी : शेगांव गजानन महाराज संस्थान - 150 कि.मी., चिखलदरा टायगर फारेस्ट 80 कि.मी. समीपवर्ती तीर्थक्षेत्र : भामदेवी-40 कि.मी. मुक्तागिरि-50 कि.मी.,शिरपुर-135 कि.मी.,कारंजा(लाड़)-60 कि.मी., नेमगिरि - 180 कि.मी., चिखलदरा - स्टेशन - 100 कि.मी., रामटेक - 200 कि.मी., वाढोना रामनाथ-60 कि.मी. आपका सहयोग : जय जिनेन्द्र बन्धुओं, यदि आपके पास इस क्षेत्र के सम्बन्ध में ऊपर दी हुई जानकारी के अतिरिक्त अन्य जानकारी है जैसे गूगल नक्षा एवं फोटो इत्यादि तो कृपया आप उसे नीचे कमेंट बॉक्स में लिखें| यदि आप इस क्षेत्र पर गए है तो अपने अनुभव भी लिखें| ताकि सभी लाभ प्राप्त कर सकें|
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    ॥दोहा॥ वीतराग वंदौं सदा, भावसहित सिरनाय। कहुँ कांड निर्वाण की भाषा सुगम बनाय॥ अष्टापद आदीश्वर स्वामी, बासु पूज्य चंपापुरनामी। नेमिनाथस्वामी गिरनार वंदो, भाव भगति उरधार ॥१॥ चरम तीर्थंकर चरम शरीर, पावापुरी स्वामी महावीर। शिखर सम्मेद जिनेसुर बीस, भाव सहित वंदौं निशदीस ॥२॥ वरदतराय रूइंद मुनिंद, सायरदत्त आदिगुणवृंद। नगरतारवर मुनि उठकोडि, वंदौ भाव सहित करजोड़ि ॥३॥ श्री गिरनार शिखर विख्यात, कोडि बहत्तर अरू सौ सात। संबु प्रदुम्न कुमार द्वै भाय, अनिरुद्ध आदि नमूं तसु पाय ॥४॥ रामचंद्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुण धीर। पाँचकोड़ि मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि बंदौ निरधार ॥५॥ पांडव तीन द्रविड राजान आठकोड़ि मुनि मुक्तिपयान। श्री शत्रुंजय गिरि के सीस, भाव सहित वंदौ निशदीस ॥६॥ जे बलभद्र मुक्ति में गए, आठकोड़ि मुनि औरहु भये। श्री गजपंथ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ॥७॥ राम हणू सुग्रीव सुडील, गवगवाख्य नीलमहानील। कोड़ि निण्यान्वे मुक्ति पयान, तुंगीगिरी वंदौ धरिध्यान ॥८॥ नंग अनंग कुमार सुजान, पाँच कोड़ि अरू अर्ध प्रमान। मुक्ति गए सोनागिरि शीश, ते वंदौ त्रिभुवनपति इस ॥९॥ रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गए रेवातट सार। कोड़ि पंच अरू लाख पचास ते वंदौ धरि परम हुलास। ।१०॥ रेवा नदी सिद्धवरकूट, पश्चिम दिशा देह जहाँ छूट। द्वै चक्री दश कामकुमार, उठकोड़ि वंदौं भवपार। ।११॥ बड़वानी बड़नयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरिचूल उतंग। इंद्रजीत अरू कुंभ जु कर्ण, ते वंदौ भवसागर तर्ण। ।१२॥ सुवरण भद्र आदि मुनि चार, पावागिरिवर शिखर मंझार। चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गयैं बंदौं नित तास। ॥१३॥ फलहोड़ी बड़ग्राम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप। गुरु दत्तादि मुनिसर जहाँ, मुक्ति गए बंदौं नित तहाँ। ।१४॥ बाली महाबाली मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय। श्री अष्टापद मुक्ति मंझार, ते बंदौं नितसुरत संभार। ।१५॥ अचलापुर की दशा ईसान, जहाँ मेंढ़गिरि नाम प्रधान। साड़े तीन कोड़ि मुनिराय, तिनके चरण नमूँ चितलाय। ।१६॥ वंशस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुन्थुगिरि सोय। कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूँ प्रणाम। ।१७॥ जशरथराजा के सुत कहे, देश कलिंग पाँच सो लहे। कोटिशिला मुनिकोटि प्रमान, वंदन करूँ जौर जुगपान। ।१८॥ समवसरण श्री पार्श्वजिनेंद्र, रेसिंदीगिरि नयनानंद। वरदत्तादि पंच ऋषिराज, ते वंदौ नित धरम जिहाज। ।१९॥ सेठ सुदर्शन पटना जान, मथुरा से जम्बू निर्वाण। चरम केवलि पंचमकाल, ते वंदौं नित दीनदयाल। ॥२०॥ तीन लोक के तीरथ जहाँ, नित प्रति वंदन कीजे तहाँ। मनवचकाय सहित सिरनाय, वंदन करहिं भविक गुणगाय। ॥२१॥ संवत्‌ सतरहसो इकताल, आश्विन सुदी दशमी सुविशाल। भैया वंदन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाण कांड गुणमाल। ॥२२॥
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    मैं देव श्री अरहंत पूजूँ, सिद्ध पूजूँ चाव सों । आचार्य श्री उवझाय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सों ॥ अरहंत भाषित वैन पूजूँ, द्वादशांग रचे गनी । पूजूँ दिगम्बर गुरुचरण, शिवहेत सब आशा हनी ॥ सर्वज्ञ भाषित धर्म दशविधि, दयामय पूजूँ सदा । जजि भावना षोडस रत्नत्रय, जा बिना शिव नहिंकदा ॥ त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम, चैत्य चैत्यालय जजूँ । पंचमेरु नन्दीश्वर जिनालय, खचर सुर पूजित भजूँ ॥ कैलाश श्री सम्मेदगिरि गिरनार मैं पूजूँ, सदा । चम्पापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा ।। चौबीस श्री जिनराज पूजूँ, बीस क्षेत्र विदेह के । नामावली इक सहस वसु जय होय पति शिव गेह के ।। दोहा जल गन्धाक्षत पुष्प चुरु, दीप धूप फल लाय । सर्व पूज्य पद पूजहू बहू विधि भक्ति बढाय ॥ ऊँ ही भाव पूजा, भाव वन्दना, त्रिकाल पूजा, त्रिकाल वन्दना, करवी, कराववी, भावना, भाववी श्री अरहंत सिद्वजी, आचार्यजी, उपाध्यायजी, सर्वसाधुजी पंच परमेष्ठिभ्यो नमः । प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चराणानुयोग, द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः दर्शन विशुद्धयादि षोढष कारणेभ्यो नमः । उत्तमक्षमदि दशलक्षण धर्मेभ्योः नमः । सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक चरित्रेभ्यो नमः । जल विषे, थल विषे, आकाश विषे, गुफा विषे, पहाड विषे, नगर-नगरी विषे उर्ध्वलोक मध्यलोक पाताल लोक विषे विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालय स्थित जिनबिम्बेभ्यो नमः । विदेह क्षेत्र विद्यमान बीस तीर्थकरेभ्यो नमः । पाँच भरत पाँच ऐरावत दसक्षेत्र सम्बन्धी तीस चौबीसी के सात सौ बीस जिनेन्द्रेभ्यो नमः । नन्दीश्वर दीप स्थित बावन जिनचैत्यालयोभ्य नमः । पंचमेरु सम्बन्धि अस्सी जिनचैत्यालयोभ्यो नमः । श्री सम्मैद शिखर, कैलाश गिरी, चम्पापुरी, पावापुर, गिरनार आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः । जैन बद्री, मूल बद्री, राजग्रही शत्रुंजय, तारंगा, कुन्डलपुर, सोनागिरि, ऊन, बड्वानी, मुक्तागिरी, सिद्ववरकूट, नैनागिर आदि तीर्थक्षेत्रेभ्यो नमः । तीर्थकर पंचकल्याणक तीर्थ क्षेत्रेभ्यो नमः । श्री गौतमस्वामी, कुन्दकुन्दाचार्य श्रीचारण ऋद्विधारीसात परम ऋषिभ्यो नमः। इति उपर्युक्तभ्यः सर्वेभ्यो महा अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
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    तजि के सरवारथसिद्धि विमान, सुभान के आनि आनन्द बढ़ाये | जगमात सुव्रति के नन्दन होय, भवोदधि डूबत जंतु कढ़ाये || जिनके गुन नामहिं प्रकाश है, दासनि को शिवस्वर्ग मँढ़ाये | तिनके पद पूजन हेत त्रिबार, सुथापतु हौं इहं फूल चढ़ाये || ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | मुनि मन सम शुचि शीर नीर अति, मलय मेलि भरि झारी | जनमजरामृत ताप हरन को, चरचौं चरन तुम्हारी || परमधरम-शम-रमन धरम-जिन, अशरन शरन निहारी | पूजौं पाय गाय गुन सुन्दर नाचौं दे दे तारी || ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| केशर चन्दन कसली नन्दन, दाहनिकन्दन लीनि | जलसंग घस लसि शसिसम शमकर, भव आताप हरीनो |परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2| जलज जीर सुखदास हीर हिम, नीर किरनसम लायो | पुंज धरत आनन्द भरत भव, दंद हरत हरषायो ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3| सुमन सुमन सम सुमणि थाल भर, सुमनवृन्द विहंसाई | सुमन्मथ-मद-मंथन के कारन, अरचौं चरन चढ़ाई ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4| घेवर बावर अर्द्ध चन्द्र सम, छिद्र सहज विराजे | सुरस मधुर ता सों पद पूजत, रोग असाता भाजै ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5| सुन्दर नेह सहित वर दीपक, तिमिर हरन धरि आगे | नेह सहित गाऊँ गुन श्रीधर, ज्यों सुबोध उर जागे ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6| अगर तगर कृष्णागर तव दिव हरिचन्दन करपूरं | चूर खेय ज्वलन मांहि जिमि, करम जरें वसु कूरं ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7| आम्र काम्रक अनार सारफल, भार मिष्ट सुखदाई | सो ले तुम ढिग धरहुँ कृपानिधि, देहु मोच्छ ठकुराई ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8| आठों दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुनगाई | बाजत दृमदृम दृम मृदंग गत, नाचत ता थेई थाई ||परम0 ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9| पंच कल्याणक अर्घ्यावली पूजौं हो अबार, धरम जिनेसुर पूजौं ||टेक आठैं सित बैशाख की हो, गरभ दिवस अधिकार | जगजन वांछित पूर को, पूजौं हो अबार ||धरम0 ॐ ह्रीं वैशाखशुक्ला अष्टम्यां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |1| शुकल माघ तेरसि लयो हो, धरम धरम अवतार | सुरपति सुरगिर पूजियो, पूजौं हो अबार ||धरम0 ॐ ह्रीं माघशुक्ला त्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |2| माघशुक्ल तेरस लयो हो, दुर्द्धर तप अविष्कार | सुरऋषि सुमनन तें पूजें, पूजौं हो अबार ||धरम0 ॐ ह्रीं माघशुक्ला त्रयोदश्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |3| पौषशुक्ल पूनम हने अरि, केवल लहि भवितार | गण-सुर-नरपति पूजिया, पूजौं हो अबार ||धरम0 ॐ ह्रीं पौषशुक्ला पूर्णिमायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |4| जेठशुकल तिथि चौथ की हो, शिव समेद तें पाय | जगतपूज्यपद पूजहूँ, पूजौं हो अबार ||धरम0 ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्ला चतुर्थ्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीधर्म0जि0अर्घ्यं निर्व0 |5| जयमाला दोहाः- घनाकार करि लोक पट, सकल उदधि मसि तंत | लिखै शारदा कलम गहि, तदपि न तुव गुन अंत |1| जय धरमनाथ जिन गुनमहान, तुम पद को मैं नित धरौं ध्यान | जय गरभ जनम तप ज्ञानयुक्त, वर मोच्छ सुमंगल शर्म-भुक्त |2| जय चिदानन्द आनन्दकंद, गुनवृन्द सु ध्यावत मुनि अमन्द | तुम जीवनि के बिनु हेतु मित्त, तुम ही हो जग में जिन पवित्त |3| तुम समवसरण में तत्वसार, उपदेश दियो है अति उदार | ता को जे भवि निजहेत चित्त, धारें ते पावें मोच्छवित्त |4| मैं तुम मुख देखत आज पर्म, पायो निज आतमरुप धर्म | मो कों अब भवदधि तें निकार, निरभयपद दीजे परमसार |5| तुम सम मेरो जग में न कोय, तुमही ते सब विधि काज होय | तुम दया धुरन्धर धीर वीर, मेटो जगजन की सकल पीर |6| तुम नीतिनिपुन विन रागरोष, शिवमग दरसावतु हो अदोष | तुम्हरे ही नामतने प्रभाव, जगजीव लहें शिव-दिव-सुराव |7| ता तें मैं तुमरी शरण आय, यह अरज करतु हौं शीश नाय | भवबाधा मेरी मेट मेट, शिवराधा सों करौं भेंट भेंट |8| जंजाल जगत को चूर चूर, आनन्द अनूपम पूर पूर | मति देर करो सुनि अरज एव, हे दीनदयाल जिनेश देव |9| मो कों शरना नहिं और ठौर, यह निहचै जानो सुगुन मौर | वृन्दावन वंदत प्रीति लाय, सब विघन मेट हे धरम-राय |10| जय श्रीजिनधर्मं, शिवहितपर्मं, श्रीजिनधर्मं उपदेशा | तुम दयाधुरंधर विनतपुरन्दर, कर उरमन्दर परवेशा |11| ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा | जो श्रीपतिपद जुगल, उगल मिथ्यात जजे भव | ता के दुख सब मिटहिं, लहे आनन्द समाज सब || सुर-नर-पति-पद भोग, अनुक्रम तें शिव जावे | ता तें वृन्दावन यह जानि, धरम-जिन के गुन ध्यावे || इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
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    शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ।। सर्व साधू और सरस्वती, जिनमन्दिर सुखकार । महावीर भगवान् को मन मंदिर में धार।। जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी। वर्धमान हैं नाम तुम्हारा, लगे ह्रदय को प्यारा प्यारा ।। शांत छवि मन मोहिनी मूरत, शांत हंसिली सोहिनी सूरत। तुमने वेश दिगंबर धारा, करम शत्रु भी तुमसे हारा ।। क्रोध मान वा लोभ भगाया माया ने तुमसे डर खाया । तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता ।। तुझमे नहीं राग वा द्वेष, वीतराग तू हित उपदेश । तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा बच्चा ।। भुत प्रेत तुमसे भय खावे, व्यंतर राक्षस सब भाग जावे। महा व्याधि मारी न सतावे, अतिविकराल काल डर खावे।। काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी । ना ही कोई बचाने वाला, स्वामी तुम ही करो प्रतिपाला ।। अग्नि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो। नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठंडी होवे ।। हिंसामय था भारत सारा, तब तुमने लीना अवतारा । जन्म लिया कुंडलपुर नगरी, हुई सुखी तब जनता सगरी ।। सिद्धार्थ जी पिता तुम्हारे, त्रिशाला की आँखों के तारे । छोड़ के सब झंझट संसारी, स्वामी हुए बाल ब्रम्हाचारी ।। पंचम काल महा दुखदायी, चांदनपुर महिमा दिखलाई । टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दुध झराया ।। सोच हुआ मन में ग्वाले के, पंहुचा एक फावड़ा लेके । सारा टीला खोद गिराया, तब तुमने दर्शन दिखलाया ।। जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा जब तेरा । ठंडा हुआ तोप का गोला, तब सब ने जयकारा बोला ।। मंत्री ने मंदिर बनवाया, राजा ने भी दरब लगाया । बड़ी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने की ठहराई ।। तुमने तोड़ी बीसों गाडी, पहिया खिसका नहीं अगाडी । ग्वाले ने जब हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया ।। पहले दिन बैसाख वदी के, रथ जाता है तीर नदी के । मीना गुजर सब ही आते, नाच कूद सब चित उमगाते ।। स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का तुम मान बढाया । हाथ लगे ग्वाले का तब ही, स्वामी रथ चलता हैं तब ही ।। मेरी हैं टूटी सी नैया, तुम बिन स्वामी कोई ना खिवैया । मुझ पर स्वामी ज़रा कृपा कर, मैं हु प्रभु तुम्हारा चाकर ।। तुमसे मैं प्रभु कुछ नहीं चाहू, जनम जनम तव दर्शन चाहू । चालिसे को चन्द्र बनावे, वीर प्रभु को शीश नमावे ।। नित ही चालीस बार, पाठ करे चालीस । खेय धुप अपार, वर्धमान जिन सामने ।। होय कुबेर समान, जन्म दरिद्र होय जो । जिसके नहीं संतान, नाम वंश जग में चले ।।
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    वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज। करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥ १॥ सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी। तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥ २॥ इक वे ते चउ इन्द्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा। तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदय ह्वै घात विचारी॥ ३॥ समरंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ। कृत कारित मोदन करिकै , क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ॥ ४॥ शत आठ जु इमि भेदन तैं, अघ कीने परिछेदन तैं। तिनकी कहुँ कोलों कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥ ५॥ विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनय के। वश होय घोर अघ कीने, वचतैं नहिं जाय कहीने॥ ६॥ कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदयाकरि भीनी। या विधि मिथ्यात भ्ऱमायो, चहुंगति मधि दोष उपायो॥ ७॥ हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, परवनिता सों दृगजोरी। आरंभ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो॥ ८॥ सपरस रसना घ्राननको, चखु कान विषय-सेवनको। बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने॥ ९॥ फल पंच उदम्बर खाये, मधु मांस मद्य चित चाहे। नहिं अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुविसन दुखकारे॥ १०॥ दुइबीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये। कछु भेदाभेद न पायो, ज्यों-त्यों करि उदर भरायो॥ ११॥ अनंतानु जु बंधी जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो। संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये॥ १२॥ परिहास अरति रति शोग, भय ग्लानि त्रिवेद संयोग। पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम॥ १३॥ निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई। फिर जागि विषय-वन धायो, नानाविध विष-फल खायो॥१४|| आहार विहार निहारा, इनमें नहिं जतन विचारा। बिन देखी धरी उठाई, बिन शोधी वस्तु जु खाई॥ १५॥ तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकलप उपजायो। कछु सुधि बुधि नाहिं रही है, मिथ्यामति छाय गयी है॥ १६॥ मरजादा तुम ढिंग लीनी, ताहू में दोस जु कीनी। भिनभिन अब कैसे कहिये, तुम ज्ञानविषैं सब पइये॥ १७॥ हा हा! मैं दुठ अपराधी, त्रसजीवन राशि विराधी। थावर की जतन न कीनी, उर में करुना नहिं लीनी॥ १८॥ पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागां चिनाई। पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो,पंखातैं पवन बिलोल्यो॥ १९॥ हा हा! मैं अदयाचारी, बहु हरितकाय जु विदारी। तामधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनंदा॥ २०॥ हा हा! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई। तामधि जीव जु आये, ते हू परलोक सिधाये॥ २१॥ बींध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन-सोधि जलायो। झाडू ले जागां बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी॥ २२॥ जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि-डारि जु दीनी। नहिं जल-थानक पहुँचाई, किरिया बिन पाप उपाई॥ २३॥ जलमल मोरिन गिरवायो, कृमिकुल बहुघात करायो। नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये॥ २४॥ अन्नादिक शोध कराई, तामें जु जीव निसराई। तिनका नहिं जतन कराया, गलियारैं धूप डराया॥ २५॥ पुनि द्रव्य कमावन काजे, बहु आरंभ हिंसा साजे। किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी॥ २६॥ इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता। संतति चिरकाल उपाई, वानी तैं कहिय न जाई॥ २७॥ ताको जु उदय अब आयो, नानाविध मोहि सतायो। फल भुँजत जिय दुख पावै, वचतैं कैसें करि गावै॥ २८॥ तुम जानत केवलज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी। हम तो तुम शरण लही है जिन तारन विरद सही है॥ २९॥ इक गांवपती जो होवे, सो भी दुखिया दुख खोवै। तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३०॥ द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीता प्रति कमल रचायो। अंजन से किये अकामी, दुख मेटो अन्तरजामी॥ ३१॥ मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनो विरद सम्हारो। सब दोषरहित करि स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी॥ ३२॥ इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ । रागादिक दोष हरीजे, परमातम निजपद दीजे॥ ३३॥ दोहा दोष रहित जिनदेवजी, निजपद दीज्यो मोय। सब जीवन के सुख बढ़ै, आनंद-मंगल होय॥ ३४॥ अनुभव माणिक पारखी, जौहरी आप जिनन्द। ये ही वर मोहि दीजिये, चरन-शरन आनन्द॥ ३५॥
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    भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्।। 1॥ य: संस्तुत: सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:। स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥ बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्। बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥ वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्, कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या । कल्पान्त -काल-पवनोद्धत- नक्र- चक्रं , को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥ सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश! कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:। प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम् नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥ अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् । यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥ त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं, पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रान्त-लोक-मलि -नील-मशेष-माशु, सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥ मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, - मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् । चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु, मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥ आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं, त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥ नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूत-नाथ! भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त:। तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥ दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं, नान्यत्र-तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:। पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:, क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥ यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं, निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत ! तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां, यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥ वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि, नि:शेष- निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम् । बिम्बं कलङ्क-मलिनं क्व निशाकरस्य, यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥ सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप- शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति। ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं, कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥ चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्- नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन, किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥ निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:, कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि। गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:, स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति। नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा- प्रभाव:, सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥ नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं, गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्। विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति, विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥ किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ! निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके, कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥ ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं, नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु। तेजो स्फ़ुरन् मणिषु याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥ मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा, दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति। किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:, कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं, प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥ त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस- मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्। त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं, नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥ त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं, ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनङ्ग-केतुम्। योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं, ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥ बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् । धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्, व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥ तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ! तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय। तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥ को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्- त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ! दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:, स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥ उच्चै-रशोक- तरु-संश्रितमुन्मयूख - माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्। स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं, बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥ सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे, विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्। बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥ कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं, विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्। उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर-वारि -धार- मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥ छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त- मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्। मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं, प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥ गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्- त्रैलोक्य-लोक -शुभ-सङ्गम -भूति-दक्ष:। सद्धर्म -राज-जय-घोषण-घोषक: सन्, खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥ मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात- सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा। गन्धोद-बिन्दु- शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता, दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥ शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते, लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती। प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर-भूरि -संख्या, दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥ स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:, सद्धर्म- तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:। दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व- भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥ उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ती, पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ। पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:, पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥ इत्थं यथा तव विभूति- रभूज्-जिनेन्द्र ! धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य। यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा, तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥ श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल, मत्त- भ्रमद्- भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्। ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥ भिन्नेभ-कुम्भ- गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त, मुक्ता-फल- प्रकरभूषित-भूमि-भाग:। बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि, नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥ कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि -कल्पं, दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिङ्गम्। विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं, त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥ रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्, क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्। आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्कस्- त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥ वल्गत्-तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीमनाद- माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्। उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥ कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह, वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे। युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्- त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥ अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र- पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ। रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान-पात्रास्- त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥ उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार- भुग्ना:, शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:। त्वत्पाद-पङ्कज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:, मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥ आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा, गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जङ्घा:। त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:, सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥ मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज-दवानलाहि- संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध -नोत्थम्। तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव, यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥ स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्, भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्। धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं, तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥
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