Jump to content
  • Blogs

    1. 🌤 *कल अष्टमी व् मोक्षकल्याणक पर्व*🌤


      जय जिनेन्द्र बंधुओं,


              कल १७ अक्टूबर, दिन बुधवार, अश्विन शुक्ल अष्टमी की शुभ तिथि को *१० वें तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान* का *मोक्ष कल्याणक पर्व* तथा *अष्टमी पर्व* है।


      🙏🏻
      कल अत्यंत भक्ति-भाव से देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान की पूजन करें तथा अपने भी कल्याण की भावना से भगवान के श्री चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित करें।

      🙏🏻
      प्रतिदिन जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करना अपना मनुष्य जीवन मिलना सार्थक करना है अतः प्रतिदिन देवदर्शन करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन नहीं कर पाते उनको कम से कम अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में देवदर्शन अवश्य करना चाहिए।

      🙏🏻
      जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन करते हैं उनको अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में श्रीजी के अभिषेक व् पूजन आदि के माध्यम से अपने जीवन को धन्य करना चाहिए।

      🙏🏻
      जमीकंद का उपयोग घोर हिंसा का कारण है अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए। जो लोग इनका उपयोग करते हैं उनको पर्व के इन दोनों में इनका त्याग करके सुख की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

      🙏🏻
      इस दिन रागादि भावों को कम करके ब्रम्हचर्य के साथ रहना चाहिए।


      बच्चों को धर्म के संस्कार देना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है और बच्चों पर माता-पिता का सबसे बड़ा उपकार है। धर्म के संस्कार संतान को वर्तमान में तो विपत्तियों से रक्षा करते ही हैं साथ ही पर भव में भी नरक तिर्यंच गति आदि के दुखों से बचाते हैं। *बच्चों को पाठशाला अवश्य भेजें।*


      👏🏻 *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*👏🏻
        *"मातृभाषा अपनाएँ, संस्कृति बचाएँ"*

    2. मुनिश्री ब्रह्मानन्द महाराज की समाधि

      samadhi.jpgपंचम युग में चतुर्थकालीन चर्या का पालन करने वाले व्योवर्द्ध महातपस्वी परम् पूजनीय मुनिश्री ब्रह्मनन्द जी महामुनिराज ने समस्त आहार जल त्याग कर उत्कृष्ट समाधि पूर्वक देह त्याग दी।
      परम् पुज्य मुनिश्री ऐसे महान तपस्वी रहें है जिनकी चर्या का जिक्र अक्सर आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संघस्थ साधुगण एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज प्रवचन के दौरान करते थे।
      पिड़ावा के श्रावकजनो ने मुनिश्री की संलेखना के समय अभूतपुर्व सेवा एवं वैयावर्ती की है।
      ऐसे समाधिस्थ पुज्य मुनिराज के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन।
      मुनिराज का समाधिमरण अभी दोपहर 1:35 पर हुआ उनकी उत्क्रष्ट भावना अनुसार 48 मिनट के भीतर ही देह की अंतेष्टि की जाएगी।
                 (20,अप्रैल,2018)

       

      कर्नाटक प्रांत के हारुवेरी कस्बे में जन्मे  महान साधक छुल्लक श्री मणिभद्र सागर जी 80 के दशक आत्मकल्याण और जिनधर्म की प्रभावना करते हुऐ मध्यप्रदेश  में प्रवेश किया । छुल्लक अवस्था मे चतुर्थकालीन मुनियों सी चर्या । कठिन तप ,त्याग के कारण छुल्लक जी ने जँहा भी प्रवास किया वँहा अनूठी छाप छोड़ी।
        पीड़ित मानवता के लिए महाराज श्री के मन मे असीम वात्सल्य था।  महाराज श्री की प्रेरणा से तेंदूखेड़ा(नरसिंहपुर)मप्र में 
      समाज सेवी संस्था का गठन किया गया। लगभग बीस वर्षों तक इस संस्था द्वारा हजारों नेत्ररोगियों को निःशुल्क नेत्र शिवरों के माध्यम से नेत्र ज्योति प्रदान की गई। जरूरतमंद   समाज के गरीब असहाय लोगों को आर्थिक सहयोग संस्था द्वारा किया जाता था। आज भी लगभग बीस वर्षों तक महाराज श्री की प्रेणना से संचालित इस संस्था ने समाज सेवा के अनेक कार्य किये ।    
            छुल्लक मणिभद्र सागर जी ने मप्र के  सिलवानी नगर में आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य मुनि श्री सरल सागर जी से मुनि दीक्षा धारण की और नाम मिला मुनि श्री ब्रम्हांन्द सागर जी। इस अवसर पर अन्य दो दीक्षाएं और हुईं जिनमे मुनि आत्मा नन्द सागर, छुल्लक स्वरूपानन्द सागर,। महाराज श्री का बरेली,सिलवानी, तेंदूखेड़ा,महाराजपुर,केसली,सहजपुर,टडा, वीना आदि विभिन्न स्थानों पर सन 1985 से से लगातार सानिध्य ,बर्षायोग, ग्रीष्मकालीन,शीतकालीन सानिध्य प्राप्त होते रहे।। महाराज श्री को आहार देने वाले पात्र का रात्रि भोजन,होटल,गड़न्त्र, का आजीवन त्याग, होना आवश्यक था। और बहुत सारे नियम आहार देने वाले पात्र के लिए आवश्यक थे। महाराज श्री को निमित्य ज्ञान था। जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण मेरे स्वयं के पास है। उनके द्वारा कही बात मैने सत्य होते देखी है।
      आज 20 अप्रेल मध्यान 1:45 पर
      पंचम युग में चतुर्थकालीन चर्या' का पालन करने वाले व्योवर्द्ध महातपस्वी परम् पूजनीय मुनिश्री ब्रह्मनन्द जी महामुनिराज ने समस्त आहार जल त्याग कर उत्कृष्ट समाधि पूर्वक देह त्याग दी।
      परम् पुज्य मुनिश्री ऐसे महान तपस्वी रहें है जिनकी चर्या का जिक्र अक्सर आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संघस्थ साधुगण एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज प्रवचन के दौरान करते थे।
      पिड़ावा के श्रावकजनो ने मुनिश्री की संलेखना के समय अभूतपुर्व सेवा एवं वैयावर्ती की है।
      ऐसे समाधिस्थ पुज्य मुनिराज के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन।  महाराज श्री की भावना अनुसार 48 मिनिट के भीतर ही उनकी अंतिम क्रियाएं की जाएंगी।
      मुनि श्री को बारम्बार नमोस्तु 👏
       

          
                 🙏🏼नमोस्तु मुनिवर🙏🏼


    3. जय जिनेन्द्र बंधुओं,

               
               आप जान रहे हैं एक ऐसे महापुरुष की आत्मकथा जिनका जन्म तो अजैन कुल में हुआ था लेकिन जो आत्मकल्याण हेतु संयम मार्ग पर चले तथा वर्तमान में सुलभ दिख रही जैन संस्कृति के सम्बर्धन का श्रेय उन्ही को जाता है।

          प्रस्तुत अंशो से हम लोग देख रहे हैं पूज्य वर्णी ने कितनी सहजता से अपनी ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आई सभी बातों को प्रस्तुत किया है।

      🍀 संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी🍀


            *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"*

                          *क्रमांक -६४*


       
             ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था।

              आपके भोजन की व्यवस्था श्रीमान बरैयाजी ने मेरे जिम्मे कर दी। चतुर्दशी का दिन था। पंडितजी ने कहा बाजार से पूड़ी तथा शाक ले आओ।' मैं बाजार गया और हलवाई के यहाँ से पूडी तथा शाक ले आ रहा था कि मार्ग में देवयोग से श्रीमान पं. नंदराम जी साहब पुनः मिल गये। मैंने प्रणाम किया। 

            पंडितजी ने देखते ही पूछा- 'कहाँ गये थे? मैंने कहा- पंडितजी के लिए बाजार से पूडी शाक लेने गया था।' उन्होंने कहा- 'किस पंडितजी के लिए?' मैंने उत्तर दिया- 'हरिपुर जिला इलाहाबाद के पंडित श्री ठाकुरप्रसाद जी के लिए, जोकि दिगम्बर जैन महाविद्यालय मथुरा में पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए हैं।'

            अच्छा, बताओ शाक क्या है? मैंने कहा - 'आलू और बैगन का।' सुनते ही पंडितजी साहब अत्यन्त कुपित हुए। क्रोध से झल्लाते हुए बोले- 'अरे मूर्ख नादान ! आज चतुर्दशी के दिन यह क्या अनर्थ किया?'

             मैंने धीमे स्वर में कहा- 'महाराज ! मैं तो छात्र हूँ? मैं अपने खाने को तो नहीं लाया, कौन सा अनर्थ इसमें हो गया? मैं तो आपकी दया का पात्र हूँ।'


      🌿 *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*🌿
       🔹आजकी तिथि- वैशाख कृष्ण ७🔹

  • Popular Contributors

    Nobody has received reputation this week.

  • Who's Online   1 Member, 0 Anonymous, 2 Guests (See full list)

  • Member Statistics

    1,812
    Total Members
    109
    Most Online
    Dr Kalyan Gangwal
    Newest Member
    Dr Kalyan Gangwal
    Joined
×