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  2. Artist(s): रजत जैन
    The most basic mantra is Om, which in Hinduism is known as the "Pranava Mantra," the source of all mantras. The Hindu philosophy behind this is the premise that before existence and beyond existence is only One reality, Brahm, and the first manifestation of Brahm expressed as Om. For this reason, Om is considered as a foundational idea and reminder, and thus is prefixed and suffixed to all Hindu prayers. Chanting of Om, The Eternal Divine Mantra 108 times (1 Mala). Om is said to be the first sound heard at the creation of the universe. When each syllable is pronounced fully, you should feel the energy of the sound lifting from your pelvic floor all the way up through the crown of your head.    “Om” is a powerful mantra that sends vibrations to bring complete and ultimate spiritual benefits and creative power. It’s often said before and after yoga session but many recommend that you recite it regularly throughout each day to receive its full potential.   
  3. Artist(s): रजत जैन
    The most basic mantra is Om, which in Hinduism is known as the "Pranava Mantra," the source of all mantras. The Hindu philosophy behind this is the premise that before existence and beyond existence is only One reality, Brahm, and the first manifestation of Brahm expressed as Om. For this reason, Om is considered as a foundational idea and reminder, and thus is prefixed and suffixed to all Hindu prayers. Chanting of Om, The Eternal Divine Mantra 108 times (1 Mala). Om is said to be the first sound heard at the creation of the universe. When each syllable is pronounced fully, you should feel the energy of the sound lifting from your pelvic floor all the way up through the crown of your head.    “Om” is a powerful mantra that sends vibrations to bring complete and ultimate spiritual benefits and creative power. It’s often said before and after yoga session but many recommend that you recite it regularly throughout each day to receive its full potential.   
  4. Artist(s): रजत जैन
    सामायिक पाठ   प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणी जनों में हर्ष प्रभो | करुणा स्तोत्र बहे दुखियों पर, दुर्जन में मध्यस्थ विभो ||1||  यह अनंत बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो |   ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनंत बल दो मुझको ||2||  सुख दुःख बैरी बन्धु वर्ग में, कांच कनक में समता हो | वन उपवन प्रासाद कुटी में, नहीं खेद नहीं ममता हो ||3||  जिस सुन्दरतम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ | वह सुंदर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ ||4||  एकेंद्रिय आदिक प्राणी की, यदि मैंने हिंसा की हो|   शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह, निष्फल हो दुष्कृत्य प्रभो ||5||  मोक्ष मार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन, जो कुछ किया कषायों से | विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावे सद्भावों से ||6|| चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु! मैं भी आदि उपांत | अपनी निंदा आलोचन से, करता हूँ पापों को शांत ||7||  सत्य अहिंसा अदिक व्रत में भी,  मैंने हृदय मलीन किया | व्रत विपरीत प्रवर्तन करके, शीलाचरण विलीन किया ||8||  कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया | पी-पीकर विषयों की मदिरा, मुझमें पागलपन आया ||9||  मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया | परनिंदा गाली चुगली जो, मुंह पर आया वमन किया ||10||  निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे | निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे ||11||  मुनि चक्री शक्री में हिय में, जिस अनंत का ध्यान रहे |  गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे ||12||  दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार ही वमन किये | परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे ||13||  जो भव दुःख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान | योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान ||14||  मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत|   निष्कलंक त्रैलोक्यदर्शी वह, देव मम हृदय समीप ||15||  निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे | शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञानस्वरूपी, परम देव मम हृदय रहे ||16||  देख रहा जो निखिल विश्व को, कर्म कलंक विहीन विचित्र |स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह, देव करे मम हृदय पवित्र ||17||  कर्म कलंक अछूत न जिसका, कभी छु सके दिव्य प्रकाश | मोह तिमिर का भेद चला जो, परम शरण मुझको वह आप्त ||18||  जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश | स्वयं ज्ञानमय स्व-पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त ||19||  जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ | आदि अंत से रहित शांत शिव, परम शरण मुझको वह आप्त ||20||  जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव | भय विषाद चिंता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव ||21||  तृण चौकी शिल शैल शिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन | संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के आसन ||22||  इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम | हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम ||23||  बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं | यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें ||24||  अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास |    जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ ||25||  अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है | जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है ||26||  तन से जिसका ऐक्य नहीं है, सुत तिय मित्रों से कैसे |      चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह कैसे रहे ||27||  महाकष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ जड़ देह संयोग | मोक्ष महल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग ||28||  जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़ | निर्विकल्प निर्द्वन्द आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो ||29||  स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते | करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते ||30||  अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी | “पर देता है” यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि ||31||  निर्मल, सत्य, शिवं सुंदर है, अमित गति वह देव महान |  शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण ||32||  इन बत्तीस पदों से कोई, परमातम को ध्याते हैं | साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं ||33|| 
  5. Artist(s): रजत जैन
    Jineshvar Stuti जिनेश्वर स्तुति ■ दर्शनं देवदेस्य, दर्शनं पाप नाशनं । दर्शनं स्वर्ग सोपानं, दर्शनं मोक्ष साधनं ॥  प्रभु दर्शन सुख संपदा, प्रभु दर्शन नव निध । प्रभु दर्शन थी पामीये, सकल पदारथ सिद्ध ॥  भावे भावना भावीये, भावे दीजे दान । भावे जिनवर पूजीये, भावे केवल ज्ञान ॥  तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ । तुभ्यं नमः क्षितितलामल भूषणाय ॥  तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय । तुभ्यं नमो जिन भवोदधि शोषणाय ॥  अयथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं ममः । तस्मात्‌ करुण्य भावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥  जे दृष्टि प्रभु दर्शन करे, ते दृष्टिने पण धन्य छे । जे जीभ जिनवरने स्तवे, ते जीभने पण धन्य छे ॥  पीए मुद्रा वाणीसुधा, ते कर्ण युगने धन्य छे । तुज नाम मंत्र विशद धरे, ते हृदयने पण धन्य छे ॥  मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतम प्रभुः । मंगलं स्थूलि भद्राद्या, जैन धर्मोस्तु मंगलं ॥  दादा तारी मुख-मुद्राने, अमीय नजर थी निहाली रह्यो । तारा नयनोमांथी झरतुं, दिव्य तेज हुं झीली रह्यो ॥  क्षण भर आ संसारनी माया, तारा भक्तिमा भूली गयो । तुज मूर्तिमां मस्त बनी ने, आत्मिक आनंद मानी रह्यो ॥  सरस शांति सुधारस सागरं शुचितरं गुणरत्न महागर । भविक पंकज बोध दिवाकर, प्रतिदिनं प्रणमामि जिनेश्वरं ॥  देखी मूर्ति पार्श्व जिननी, नेत्र मारां ठरे छे । ने हैयुं मारुं फरी फरी, प्रभु ध्यान तारुं धरे छे ॥   आत्मा मारो प्रभु तुज कने, आववां उल्लसे छे । आपो एवुं बल हृदयमां, माहरी आश ए छे ॥  हे प्रभो! आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए । शीघ्र सारे अवगुणों को, दूर हमसे कीजिए ॥  लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें । ब्रह्मचारी धर्म रक्षक! वीर व्रतधारी बनें ॥■  
  6. Artist(s): रजत जैन
    ■ ॐ ह्रीं श्रीं कीर्ति कौमुदी वागीश्वरी प्रसन्न वरदे कीर्ति मुख मन्दिरे स्वाहा || ■ अपना "केस" इस "मंत्र" को पूरी तरह सौंप दीजिये। इससे "मंत्र" के लिए "मैदान" खुला हो जाता है। आपके लिए सबसे बेस्ट जो है, वही हो जाता है। ये मंत्र दिखने में ऐसा लग रहा है मानो प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए मंत्र-जप किया जा रहा हो. परन्तु वास्तविकता बहुत अलग है। प्रसिद्धि कब प्राप्त होगी? जब कार्य सिद्ध होगा तब!
  7. Artist(s): रजत जैन
    ◆ ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं नमः ◆ (ये मंत्र पहले आपके पाप कर्मों को "नष्ट" करेगा और "पुण्य" को बढ़ाएगा, फिर "समृद्धि" लाएगा। ना किसी के चक्कर काटना, ना धन का खर्च और मन की शांति खोना। जप से मन में "विश्वास तुरंत आता है और “फालतू" विचारों को "ताला" लग जाता है.  बाधाएं आये ही नहीं, इसके लिए भक्ति और विश्वास से उपरोक्त मंत्र की १ माला तीर्थंकरों अथवा इष्टदेव की किसी भी मूर्ति/फोटो/तस्वीर के आगे रोज जाप करें। (घर पर हो तो दीपक और अगरबत्ती करें -इससे अधिष्ठायक देव प्रसन्न होते हैं).
  8. Artist(s): रजत जैन
    Recitation of ■ ॐ ह्रीं नमः ■ 108 times for 40 days at night time brings you out of troubles
  9. Artist(s): रजत जैन
    पापभक्षिणी विद्यारुप मंत्र ◆ ॐ अर्हन्मुख-कमलवासिनी पापात्म-क्षयंकरि, श्रुतज्ञान  ज्वाला-सहस्र प्रज्ज्वलिते- सरस्वति मम पापं हन हन,  दह दह, क्षां क्षीं क्षूं क्षौं क्षः क्षीरवर-धवले अमृत-संभवे वं वं हूं हूं स्वाहा । ◆ (इस मंत्र के जप के प्रभाव से साधक का चित्त प्रसन्नता धारण करता पाप नष्ट हो जाते हैं, और आत्मा में पवित्र भावनाओं का संचार होता हैं।
  10. Artist(s): रजर जैन
    जैन महामृत्युंजय मंत्र ■ ॐ ह्रां णमो अरिहंताणं | ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ॐ हूं णमो आइरियाणं,  ॐ ह्रौं णमो उवज्झायाणं, ॐ ह्रः णमो लोए सव्वसाहूणं, मम सर्व ग्रहारिष्टान् निवारय निवारय अपमृत्युं घातय घातय सर्वशान्तिं कुरु कुरु स्वाहा । ■ (विधि दीप जलाकर धूप देते हुए नैष्ठिक रहकर इस मंत्र का स्वयं जाप करें या अन्य द्वारा करावें | यदि अन्य व्यक्ति जाप करे तो 'मम' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम जोड़ लें जिसके लिए जाप करना है।) इस मंत्र का सवा लाख जाप करने से ग्रह-बाधा दूर हो जाती है। कम से कम इस मंत्र का 31 हजार जाप करना चाहिये | जाप के अनन्तर दशांश आहुति देकर हवन भी करें।
  11. Artist(s): रजत जैन
     Sri Bhaktamar Stotra (Fast recitation) श्री भक्तामर स्तोत्र (संस्कृत) 
  12. Artist(s): रजत जैन
    ॐ ह्रीं श्रीम्  पद्मावती पद्मनेत्रे पद्मासने लक्ष्मीदायिनी वाञ्छा पूर्णिमा  म म  ऋद्धिं सिद्धिं जयं कुरु कुरु स्वाहा!!                         प्रतिदिन मात्र 18 बार जाप करें.  100% कार्य सिद्धि.
  13. Artist(s): रजत जैन
     मेरी भावना ~ जिसने राग कामादिक जीते, सब जग जान लिया। सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया । बुद्ध, बोर, जिन, हरिहर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो । भक्ति भाव से प्रेरित हो यह चित्त नसी में कौन रहो ।  रहे सदा मांग उन्हीं का प्यान उन्हीं का नृत्य रहें । उन हो जैसी चय्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे । नहीं सताळ किस जोन को झूठ कभी नहीं कहा करू । परधन बनिता पर न नुभाऊ संतोषामृत पिया करो।  अहंकार का भाव न रखूँ नहीं किसो पर क्रोध करू । देख दूसरों को बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धम्। रहे भावना ऐसी मेरी सरल-सत्य व्यवहार करूं। बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार कर ॥  मैत्री-भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे। .  दोन-दुःखो जीवों पर मेरे उर से करूणा स्वत बहे ॥  दुर्जन, का कुमार्गरतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे । साम्य भाव क्या मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥ गुण जनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे। बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह में सुख पावे ॥ होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं द्रोह न मेरे उर आवे ।  गुरण-ग्रहण का भाव रहे नित हष्टि न दोषों पर जावे ।।  कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आये या जाये ।  लाखों वर्ष तक जोऊ या मृत्यु आज ही आ जावे ||  अथवा कोई कैसा भी भय या लालच देने आवे । तो भो न्याय मार्ग से मेरा कभी न पद डिगने पावे ॥ कार प्रेम परस्पर जग में मोह दूर पर रहा करे। अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे।। बन कर सब 'युग-बोर हृदय से जग हिताय रत रहा करें।  बस्तु-स्वरूप विवार खुशी से सब दुख-संकट सहा करें।
  14. Artist(s): रजत जैन
     Namokar Mantra Paath 9 times. Used at every occasion before or after a ceremony, religious or personal. A daily must. ■ णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं नमो आईरियाणं णमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहूणं।  एसो पंच णमोक्कारो, सवपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।। ■
  15. Artist(s): रजत जैन
    ■ Swasti Vaachan स्वस्ति वाचन ■       ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।  स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥  स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः।  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥।    स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया स्वस्तिवाचन कहलाती है। ◆ Ath Puja Peethika अथ पूजा पीठिका ◆  णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं नमो आईरियाणं णमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहूणं ◆ चत्तारि मंगल, अरिहंता मंगल, सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगल।  चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुतमा साहू लोगुतमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा  चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंतेसरणं पव्वज्जामि सिद्धेसरणं पव्वज्जामि, साहूसरणं पव्वज्जामि केवलिपण्णत्तो धम्मोसरणं पव्वज्जामि ◆ एसो पंच णमोक्कारो, सवपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं।।।  ◆
  16. Artist(s): रजत जैन
    ■ Swasti Vaachan स्वस्ति वाचन ■       ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।  स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥  स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः।  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥।    स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया स्वस्तिवाचन कहलाती है। 
  17. Artist(s): रजत जैन
    भगवान महावीर ने कहा है "खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्तिमे सव्व भुएस् वैरं ममझं न केणई।" - अर्थात सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा बैर नहीं है। यह वाक्य परंपरागत जरूर है, मगर विशेष आशय रखता है। इसके अनुसार क्षमा मांगने से ज्यादा जरूरी क्षमा करना है। क्षमा देने से आप अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे और सभी जीवों और पदार्थों के प्रति मैत्रीभाव रखेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है, जब वह अपने से बाहर हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमा भाव ही इसका मूल मंत्र है।  
  18. Artist(s): रजत जैन
     गंधार्वालय स्तोत्र    जिनान् जिताराति-गणान् गरिष्ठान्  देशावधीन् सर्वपरावधींश्च।  सत्कोष्ठबीजादि-पदानुसारीन्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ १॥     संभिन्न-श्रोत्रान्वित-सन्मुनीन्द्रान्  प्रत्येक-सम्बोधित-बुद्धधर्मान्।  स्वयं प्रबुद्धांश्च विमुक्तिमार्गान्  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ २॥     द्विधा मन:पर्यय-चित्प्रयुक्तान्  द्वि-पञ्च-सप्त-द्वय-पूर्वसक्तान्।  अष्टाङ्ग-नैमित्तिक-शादक्षान्  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥३॥     विकुर्वाणाख्यद्र्धि-महाप्रभावान्,  विद्याधरांश्चारण-ऋद्धिप्राप्तान्।  प्रज्ञाश्रितान्नित्य-खगामिनश्च,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ४॥     आशीर्विषान् दृष्टिविषान्मुनीन्द्रा-  नुग्राति-दीप्तोत्तमतप्त-तप्तान्।  महातिघोर-प्रतप:प्रसक्तान्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ५॥     वंद्यान् सुरैर्घोर-गुणांश्च लोके,  पूज्यान् बुधै-र्घोरपरा-क्रमांश्च।  घोरादि-संसद्गुण-ब्रह्म-युक्तान्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ६॥     आमद्र्धि-खेलद्र्धि-प्रजल्लविडृद्धि-  सर्वद्र्धि-प्राप्तांश्च व्यथादिहन्तॄन्।  मनोवच:काय-बलोपयुक्तान्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ७॥     सत्क्षीरसर्पिर्मधुरा-मृतद्र्धीन्,  यतीन् वराक्षीण-महानसांश्च।  प्रवर्धमानांि-जगत्पूज्यान्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ८॥     सिद्धालयान् श्रीमहतोऽतिवीरान्,  श्रीवर्धमानद्र्धिविबुद्धि-दक्षान्।  सर्वान् मुनीन् मुक्तिवरानृषीन्द्रान्,  स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै॥ ९॥     नृसुर-खचर-सेव्या, विश्व-ोष्ठद्र्धिभूषा,  विविध-गुण-समुद्रा, मारमातङ्ग-सिंहा:।  भवजल-निधि-पोता, वन्दिता मे दिशन्तु,  मुनिगणसकला: श्रीसिद्धिदा: सदृषीन्द्रान्॥ १०॥  
  19. Artist(s): रजत जैन
    Kaal Sarp Dosh Nivaran Jain Mantra कालसर्पदोष निवारण हेतु जैन मन्त्र प्रतिदिन "पार्श्वनाथ" भगवान के दर्शन और "नमिउण पास विसहर वसह जिण फुलिंग" इस मंत्र के जप से हो जाता है। ये मंत्र कितना जपा जाए, ये "समस्या" की तीव्रता पर निर्भर करता है और साधना की क्वालिटी पर भी। महापूजन के लिए पंडित आते हैं और बहुत सी पूजन सामग्री चाहिए जिसका खर्च बहुत अधिक आता है. परन्तु यदि जप विधि करनी हो तो "स्वयं" को करनी चाहिए और उसमें खर्च भी शून्य के बराबर आता है. हाँ, "तपना" स्वयं को पड़ता है
  20. Artist(s): रजत जैन
     कर्ज़ मुक्ति मन्त्र ~  ये श्लोक मात्र एक बार ही बोलें~   "सर्वदा वासुपूज्य अस्य  नाम्ना शान्तिम् जय श्रियं  रक्षा कुरु धरासुतो  अशुभोऽपि शुभ भवः ।।   फिर इस मंत्र को रोज मात्र बारह बार बोलें: (हथेली में उंगलिओं में जो १२ जोड़ हैं, उन पर) ~  ॐ ह्रीं श्रीं भौमाय पूजिताय  श्री वासुपूज्य स्वामिने नमः ||   मंत्र पूरे एकाग्र चित्त से जपें।   ये मंत्र:  १. शांति प्रदान करता है. (इसका अर्थ बहुत गंभीर है)  जिस पर कर्जा हो, वो शान्ति में कैसे जी सकता है? परन्तु मंत्र प्रभाव से वो शान्ति से जीयेगा.  शांति से तभी जीयेगा जब ऋण से मुक्ति होगी. मतलब ऋण से मुक्ति इस मंत्र के प्रभाव से हो जाती है).   २. हर कार्य सिद्ध करता है.  ३. रुका हुआ पैसा आता है.  ४. शत्रु/सरकार/कोर्ट केस में रक्षा करता है.   सबसे विशेष: ५. अशुभोऽपि शुभ भवः  जो अभी अशुभ दिख रहा है, वो शुभ में कन्वर्ट हो जाएगा. 
  21. Artist(s): रजत जैन
     समाधि भावना ~                                        दिन रात मेरे स्वामी, मैं भावना ए भाऊ, देहांत के समय में, तुमको न भूल जाऊँ । टेक।  शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ, समता का भाव धर कर, सबसे क्षमा कराऊँ ।१  त्यागूँ आहार पानी, औषध विचार अवसर, टूटे नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊँ ।२।  जागें नहीं कषाएँ, नहीं वेदना सतावे, तुमसे ही लौ लगी हो, दुध्ध्यान को भगाऊँ ।३।  आत्म स्वरूप अथवा, आराधना विचारों, अरहंत सिद्ध साधु, रटना यही लगाऊँ ।४।  धरमात्मा निकट हों, चर्चा धरम सुनावें, वे सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊँ ।५।  जीने की हो न वाँछा, मरने की हो न ख्वाहिश, परिवार मित्र जन से, मैं मोह को हटाऊँ ।६।  भोगे जो भोग पहिले, उनका न होवे सुमिरन, मैं राज्य संपदा या, पद इंद्र का न चाहूँ।७।  रत्नत्रय का पालन, हो अंत में समाधि, 'शिवराम' प्रार्थना यह, जीवन सफल बनाऊँ ।८।
  22. Artist(s): रजत जैन
    इष्ट प्रार्थना ~                ■ भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो ।  सत्य संयम शील का, व्यवहार हर घर बार हो।।     धर्म का परचार हो, अरु देश का उद्धार हो ।  और ये उजड़ा हुआ, भारत चमन गुलजार हो ।।     ज्ञान के अभ्यास से, जीवों का पूर्ण विकास हो ।  धर्मं के परचार से, हिंसा का जग से ह्रास हो ।।     शांति अरु आनंद का, हर एक घर में वास हो ।  वीर वाणी पर सभी, संसार का विश्वास हो ।।     रॊग अरु भय शोक होवें, दूर सब परमात्मा ।  कर सके कल्याण ज्योति, सब जगत की आत्मा ।।  
  23. Artist(s): रजत जैन
     आत्म कीर्तन      हूँ स्वतन्त्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता द्रष्टा आतमराम। टेक।     मैं वह हूँ जो है भगवान, जो मैं हूँ वह है भगवान।  अन्तर यही ऊपरी जान, वे विराग यह राग-वितान॥ १॥     मम स्वरूप है सिद्ध समान, अमित शक्ति-सुख-ज्ञान-निधान।  किन्तु आशवश खोया ज्ञान, बना भिखारी निपट अजान॥2 ॥     सुख-दुख-दाता कोई न आन, मोह-राग-रुष दुख की खान।  निज को निज, पर को पर जान, फिर दुख का नहिं लेश निदान॥3 ॥     जिन, शिव, ईश्वर, ब्रह्मा, राम, विष्णु, बुद्ध, हरि जिनके नाम।  राग त्यागि पहुँचूँ शिव धाम, आकुलता का फिर क्या काम॥4 ॥     होता स्वयं जगत-परिणाम, मैं जग का करता क्या काम ।  दूर हटो पर-कृत परिणाम, सहजानन्द रहूँ अभिराम॥ ५॥  
  24. Artist(s): रजत जैन
     Easiest way in Jainism to gain Prosperity समृद्धि पाने का सबसे सरल जैन उपाय : (जिन्हें मंदिर विधि नहीं आती है)  पहले मंदिर में प्रवेश करें और फिर नीचे लिखी स्तुति बड़े भाव से बोलें:  "प्रभु दर्शन सुख सम्पदा प्रभु दर्शन नव निध | प्रभु दर्शन थी पाइए सकल पदार्थ सिध ||" (ध्यान रहे आपकी नज़र मात्र प्रभु की प्रतिमा पर रहे )  फिर बड़े ही भावपूर्वक एक बार बोलें  "श्री नमुत्थुणं सूत्र!"  तीन महीने में ही काया पलट होने लगेगी.  सूत्र का उच्चारण एकदम स्पष्ट होना चाहिए. नमुत्थुणं सूत्र शाश्वत (perpetual) है क्योंकि जब भी तीर्थंकरों का जन्म होता है, तब सौधर्मेन्द्र इसी सूत्र से भगवान की स्तुति करते हैं.  
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