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  2. फागी नगरी में अवश्य पधारे । ये फागी नगरी 7 भव्य जिनालयों से सुशोभित जिनमे क्रमशः पार्श्वनाथ जैन चैत्यालय, चंदप्रभः जी की काली नसियां, मुुुनिसुव्रत भगवान का बिचला मंंदिर, पार्श्वनाथ जी का कांच वाला मंदिर , आदिनाथ जी का बड़ा मंदिर, आदिनाथ जी महावीर जी और शांतिनाथ जी का त्रिमूर्ती मंदिर , एवं चंदप्रभः जी का चंद्रपूरी है। यहाँ एक भव्य संत भवन का भी निर्माण हो रहा है । फागी नगरी के गुणसागर कॉलोनी में परम पूज्य आर्यिका 105 श्री पार्श्व वति माताजी का समाधिस्थल भी है । एवं कांच वाले मंदिर में आचार्य श्री 108 चारित्र दिवाकर श्री चंद्रसागर जी महाराज की शिष्या माताजी का समाधिस्थल भी है। और फागी नगरी से चकवाड़ा की और जाने में लगभग 4 किलोमीटर में ही एक और भव्य गुणस्थली तीर्थ आता है जहाँ शांतिनाथ भगवान का भव्य जिनालय है और परम पूज्य तपोनिधि वनिसिद्ध 108 मुनि श्री गुणसागर जी का समाधिस्थल भी है । श्री गुणसागर जी महाराज की असीम अनुकंपा से ही फागी में 5 मंदिर का पंचकल्याण हुआ था उनमे से 4 का जीर्णोद्धार एवं एक मंदिर नया जो की त्रिमूर्ती मंदिर है । श्री गुणसागर जी महाराज वाणीसिद्ध थे । इस भव्य नगरी में अवश्य पधारे । विनीत:- सकल दिगंबर जैन समाज फागी , जिला -जयपुर तहसील फागी 303005
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  4. बंदौं पॉचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज । करुँ शुध्द आलोचना, शुध्दि करन के काज ॥ सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी । तिनकी अब निवृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा ॥ इक बे ते चउ इंद्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा । तिनकी नहीं करुणा धारी, निरदई ह्वे घात विचारी ॥ समरंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ । कृत कारित मोदन करिकै, क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ॥ शतआठ जु इमि भेदन तैं, अघ कीने परिछेदन तैं । तिनकी कहुँ कोलौं कहानी, तुम जानत केवल ज्ञानी ॥ विपरीत एकांत विनयके, संशय अज्ञान कुनयके । वशहोय घोर अघ कीने, वचतैं नहिं जात कहीने ॥ कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदया करि भीनी । या विधि मिथ्यात भ्रमायो, चहुँ गतिमधि दोष उपायो ॥ हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, परवनिता सौं दृग जोरी । आरंभ परिग्रह भीनो, पन पाप जुया विधि कीनो ॥ सपरस सरना घ्रानन को, चखु कान विषय - सेवन को । बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने ॥ फल पंच उदंबर खाये, मधु माँस मद्य चित चाये । नहिं अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुव्यसन दुखकारे ॥ दुइवीस अभख जिन गाये, सो भी निसिदिन भुंजाये । कछू भेदाभेद न पायौ, ज्यों-ज्यों करि उदर भरायौ ॥ अनंतांनुबंधी जु जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो । संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश मुनिये ॥ परिहास अरति रति शोक, भय ग्लानितिवेद संजोग । पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम ॥ निद्रा वश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई । फिर जागि विषय वन धायो, नाना विध विषफल खायो ॥ आहार विहार निहारा, इनमें नहिं जतन विचारा । बिन देखी धरी उठाई, बिन सोधी वस्तु जु खाई ॥ तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकलप उपजायो । कछू सुधि बुधि नाहिं रही है, मिथ्यामति छाय गयी है ॥ मरजादा तुम ढ़िगं लीनी, ताहु में दोस जु कीनी । भिनभिन अब कैसें कहिये, तुम झान विषैं सब पइये ॥ हा हा ! मैं दुठ अपराधी, त्रस जीवन-राशि विराधी । थावर की जतन न कीनी, उरमें करुना नहीं लीनी ॥ पृथिवी बहु खोद कराई, महलादिक जागाँ चिनाई । पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखा तै पवन बिलोल्यो ॥ हा हा ! मैं अदयाचारी, बहु हरित काय जु विदारी । ता मधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनंदा ॥ हा हा ! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई । ता मधि जे जीव जु आये, ते हू परलोकसिधाये ॥ बींध्यो अन राति पिसाये, ईंधन बिन सोधि जलायो । झाडू ले जागाँ बुहारी, चींटीऽदिक जीव बिदारी ॥ जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि डारि जु दीनी । नहिं जल-थानक पहॅुंचाई, किरिया बिन पाप उपाई ॥ जल मल मोरिन गिरवायौ, कृमिकुल बहुघात करायौ । नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव कराये ॥ अन्नादिक शोध कराई, तामैं जु जीव निसराई । तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया ॥ पुनि द्रव्य कमावन काजे, बहु आरंभ हिंसा साजे । किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी ॥ इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता । संतति चिरकाल उपाई, बानी तैं कहिय न जाई ताको जु उदय अब आयो, नानाविध मोहि सतायो । फल भुजंतजिय दुख पावै, बचतैं कैसे करि गावै ॥ तुम जानत केवल ज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी । हम तुमरी शरण लही है, जिनतारन विरद सही है ॥ जो गाँवपती इक होवैं, सो भी दुखिया दुख खोवै । तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अंतरजामी ॥ द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीता प्रति कमल रचायौ । अंजन से किये अकामी, दुख मेटो अंतरजामी ॥ मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनोविरद सम्हारो । सब दोष रहित करि स्वामी, दुख मेटहु अंतरजामी ॥ इंद्रादिक पदवी नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊॅं । रागादिक दोष हरीजै, परमातम निजपद दीजै ॥ दोष रहित जिनदेव जी, निजपद दीज्यो मोय । सब जीवन के सुख बढ़ै, आनंद-मंगल होय ॥ अनुभव मानिक पारखी, 'जौहरी', आप जिनन्द । यहि वर मोहि दीजिये, चरन-सरन आनन्द ॥
  5. *दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों की प्रदर्शनी* *उद्घाटन समय* प्रातः 9:00 बजे *सुगंध दशमी व अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर मंदिर जी प्रांगण में दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों की प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है इसमें सचित्र दुर्लभ ग्रंथों, मानचित्रों, कुण्डलाकार (रोलनुमा) का प्रदर्शन पहली बार हो रहा है।* *पर्यूषण के पावन पर्व पर ऐतिहासिक एवं दुर्लभ साक्षात् जिनवाणी का दर्शन कर धर्म लाभ लेवें।* *दिनांक* 8 व 12 सितंबर *स्थान* श्री दिगंबर जैन मंदिर यति यशोदानंद जी चौड़ा रास्ता, जयपुर
  6. सुगंध दशमी पर्व पर विभिन्न जैन मंदिरों में भव्य झांकियों का आयोजन रविवार दिनांक 8 सितंबर 2019 को किया गया है। जिनकी जानकारी नीचे दी जा रही है। आप सभी से निवेदन है कि समय निकालकर इनके अवलोकनार्थ पधारें 🚩 गणेश मार्ग, बापू नगर : *शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जी वंदना* 🚩 कीर्ति नगर, टोंक रोड : *चंद्रगुप्त मौर्य के अद्भुत 16 सपने आज हो रहे सच* 🚩 महावीर नगर, टोंक रोड : *शिरपुर वाले अंतरिक्ष पारसनाथ* (सजीव झांकी) 🚩 S.F.S., मानसरोवर : *सिद्ध क्षेत्र श्री बावन गजा जी (बड़वानी)* 🚩 थड़ी मार्केट, मानसरोवर : *"काल चक्र की महिमा“* (सजीव झांकी) 🚩 राधा निकुंज, मानसरोवर : *सिद्ध क्षेत्र श्री बावन गजा जी (बड़वानी)* 🚩 कृष्णा मार्ग, श्याम नगर, सोडाला : *"निगोद से सिद्धयालय तक"* (सजीव झांकी) 🚩 राधा विहार, न्यू सांगानेर रोड, सोडाला : *महिमा भक्तामर की* 🚩 मोहनबाड़ी, सूरजपोल : *नेमी का वैराग्य* 🚩 तारानगर, जगतपुरा (NRI सर्किल के पास) : *कमठ का उपसर्ग* 🚩जवाहर नगर अष्टापद 🙏निवेदन 🙏
  7. 1. Sambhav nath bhgwan 2. Abhinandan nath bhgwan 3. Shantinath bhgwan 4. Ajit nath bhgwan 5. Shital nath bhgwan 6. 7. Aadinath ji 8. Dharm nath ji 9. Padmprabh ji 10. Vaspujya ji 11. Chanda prabh ji 12. Pushpadnt ji 13. Annat nath ji 14. Munisuvrat nath ji 15. Mahavir swami
  8. दसलक्षण पर्व को दसलक्षण पर्व ही बोलें* आज मैं आप सभी का ध्यान एक बात की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। हम सब लोग हमारे *दसलक्षण पर्व* को *पर्युषण* बोलते हैं, और *पर्यूषण* के नाम से ही जानते हैं। इतना ही नहीं हमारे *दिगंबर जैन समाज के अधिकांश लोग इसे पर्यूषण ही कहते हैं,* जबकि वास्तविकता यह है कि *पर्यूषण श्वेतांबर परम्परा में कहा जाता है, जो 8 दिन के होते हैं। जबकि दिगम्बर परम्परा में दसलक्षण पर्व 10 दिन के होते हैं।* और खास बात यह होती है, कि *जिस दिन हमारे दसलक्षण पर्व प्रारम्भ होते हैं, उस दिन पर्युषण पर्व समाप्त होते हैं।* *हमारे दिगंबर परम्परा में दसलक्षण पर्व, 10 धर्मो पर आधिरत होते हैं।* इन दस धर्म में *उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम अकिंचन और उत्तम ब्रह्मचर्य होते हैं।* चूंकि हम प्रत्येक दिन एक धर्म की आराधना करते हुए उसे अपने जीवन में अंगीकार करते हैं, और साधना को निरंतर बढ़ाते चले जाते हैं, तो इन्हीं दस धर्मों के कारण इन्हें *दसलक्षण महापर्व* कहा गया है। तो कृपया निवेदन है कि हम इन्हें दसलक्षण पर्व के नाम से ही संबोधित करें। सादर *दिलीप जैन शिवपुरी* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
  9. 1.chandragiri 2. 3 neelgiri 4. 5. Hastinapur 6. Padmapura 7. 8. Gantakaran 9. Astapad 10. 11. 12 13 pushpgiri 14 nainagir 15 kailashgiri 16. Tarangaji 17 osyaam 18 sankheshwarji 19 rajgrahi 20 nageshwarji 21 22 23 24 25 shripadgiri
  10. *दिमाग लगाओ 🙇‍♀ तीर्थस्थान के नाम बताओ*🙏👍🙏👍 🔓1)🌙🌕 🔑1) 🔓2) ✋⛰ 🔑2) 🔓3) 💎🌕 🔑3) 🔓4) 🦁⛰ 🔑4) 🔓5) 🐘❌पुर 🔑5) 🔓6) 👣⛰ 🔑6) 🔓7) 🍞🌕 🔑7) 🔓8) 👂🔔⭕ 🔑8) 🔓9) 8⃣👣 🔑9) 🔓10) 🍞⛰ 🔑10) 🔓11) 👏🏼 ⛳🗻 🔑11) 🔓12)🌙🚶🏽 🔑12) 🔓13) 🌺😬⛰ 🔑13) 🔓14) 👀⛰ 🔑14) 🔓15) 🍌sh⛰ 🔑15) 🔓16)Taa🎨 🔑16) 🔓17) o 🌊 यां 🔑17) 🔓18) 🐚🙏 🔑18) 🔓19) 👑🏠 🔑19) 🔓20) 🐍🙏 🔑20) 🔓21) 🥇⛰ 🔑21) 🔓22) 💪सा❌ 🔑22) 🔓23)🤵🏻👂🏼aa 🔑23) 🔓24) 🎼⛰ 🔑24) 🔓25) श्री👣⛰ 🔑 🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀🏆🚴‍♀
  11. *प्रतिमाओं का मंजन* *विधि एवं आवश्यक सावधानियां* _*कुछ ही दिनों में हमारे दसलक्षण पर्व प्रारंभ हो जाएंगे, और उसके पूर्व मंदिर जी में प्रतिमाओं का मंजन प्रारंभ हो जाएगा।*_ प्रतिमाओं के मंजन के संबंध में लोगों को भ्रांति रहती है, अतः मार्गदर्शन स्वरूप यह पोस्ट दी जा रही है। *मंजन पूर्व की तैयारी-* 1- *खजूर की छोटी-छोटी डंडी लेकर उसका सिरा पत्थर से कूटकर उसे ब्रश जैसा बना लेना चाहिए, जिससे प्रतिमा पर जमे हुए दागों को साफ किया जा सके।* *2- लोंग का चूरा बनाने के लिए लोंग को धोकर अच्छी तरह से सुखा लेना चाहिए, और फिर सूखी लोंग को मिक्सी में चला कर उसका पाउडर बना लेना चाहिए।* *3- प्रतिमाओं के मार्जन हेतु रीठे को अच्छी तरह से साफ कर चेक कर लेना चाहिए जीव आदि न हों।* *4- (विशेष) मंजन हेतु साफ सूती हथकरघा का कपड़ा मंगा कर रख लेना चाहिए, बाजार में जो सूती कपड़ा मिलता है उसमें मटन टेलो होता है।* *अष्ट धातु की प्रतिमा का मंजन* _अष्ट धातु की प्रतिमा का मंजन *लौंग के चूरे में थोड़ा जल डाल कर उस चूरे से अच्छे से रगड़ना चाहिए।* फिर साफ कपड़े से रगड़ना चाहिए। लोंग के चूरे के बाद जितना अधिक स्वच्छ कपड़े से प्रतिमा को रगड़ेंगे, प्रतिमा उतनी ही अधिक चमक आएगी । *किसी भी हालत में पीताम्बरी अथवा नींबू आदि का प्रयोग कदापि न करना चाहिए।*_ *छोटी या मध्यम आकार की पाषाण की प्रतिमाओं का मंजन* _*पाषाण की प्रतिमाओं का मंजन अत्यंत सावधानी पूर्वक करना चाहिए।* इसके लिए सर्वप्रथम रीठे को धोकर अभिषेक के शुद्ध जल में उबाल लें। उसके बाद रीठे को मुलायम कपड़े में लेकर उसकी पोटली बनाकर उससे पाषाण की प्रतिमाओं का मंजन करते हैं। इसके लिए *प्रतिमा को मंजन से पहले किसी बड़ी थाली या कोपर आदि में विराजमान कर लेना चाहिए। जिससे जल इधर उधर न फैले, वह कोपर में ही रहे।*_ 👉 *खजूर के ब्रश उससे पाषाण की प्रतिमा यदि कहीं धूल आदि जमी हैं, तो उसे साफ करते हैं।* साथ ही रीठे के जल से मंजन करके अंत में साफ जल से प्रतिमा को साफ करते हैं। 👉 *प्रतिमा सूखने पर सूखे गोले से मंजन करना चाहिए।* *मूल नायक प्रतिमा अथवा अचल प्रतिमा का मंजन* _मूल नायक प्रतिमा का मार्जन उसी स्थान पर अत्यंत सावधानी के साथ करना चाहिए, इसके लिए *प्रतिमा के नीचे चारों ओर साफ सूखे कपड़े लगा देना चाहिए, जिससे मंजन का जल हमारे पैरों तक न आये।* बांकी विधि उपरोक्त अनुसार ही है।_ 👉 *याद रखिये गोले का चूरा किसी भी हाल में उपयोग नहीं करना चाहिए, नहीं तो उसके कण वेदी में फैल जाते हैं, एवं उसकी खुशबू से चींटियां आदि प्रतिमा पर एकत्रित हो जाती हैं।* 👉 *सारा कार्य अत्यंत विनय पूर्वक सावधानी से करना चाहिए। छोटी सी लापरवाही भी नहीं होनी चाहिए।* अंत मे मंजन किया हुआ जल जीव रहित सूखे स्थान पर विसर्जित करना चाहिए। एवं *वेदी में कपूर का चूरा डाल देना चाहिए, जिससे कोई भी जीव या चींटी आदि न आये।* *प्रस्तुति- दिलीप जैन शिवपुरी* 🚩 *पुण्योदय विद्यासंघ*🚩
  12. सूक्ष्म का अर्थ होता है जिनको हम साधारण चक्षुऔ से नहीं देख सकते हैं। परम परम सूक्ष्म का अर्थ है कि आगे आगे के शरीर क्रमश: पहले पहले शरीर से सूक्ष्म सूक्ष्म होते जाते हैं।मनुष्य और तिर्यंचो काऔदायिक शरीर होता है। औदायिक शरीर से असंख्यात गुना सूक्ष्म वैक्रियक शरीर (देवों और नारकीयों) काहोता है,तथा वैक्रियक शरीर से असंख्यात गुना सूक्ष्म आहारक शरीर (६वें गुणस्थान वर्दी मुनिराज के दाहिने कंधे से एक सफ़ेद पुतला निकलता है जो मुनि के शंका निदान हेतु केवली भगवान के पास जाकर शंका का समाधान पाकर वापिस मुनि में समा जाता है) होता है।।आहारक शरीर से अनन्त गुना सूक्ष्म तैजस शरीर (शरीर में जो तापहोता है ,उसे तेजस शरीर कहते हैं)एवं तेजस शरीर से अनन्तगुना सूक्ष्म कार्मण (कर्मों का समूह) शरीर होता है।
  13. प्रथमोदय भाग 1-2, अरुणोदय भाग 1-2, ज्ञानोदय भाग 1-4 कुल आठ भागों का सैट मात्र 200/- में नर्सरी से लेकर 8 वी तक के बच्चों के लिए मल्टीकलर आर्ट पेपर पर चित्रों से सहित जो बच्चे पाठशाला नहीं जा पाते. उनके लिए पर्वराज पर्युषण में उपहार स्वरुप भेंट कर सकते हैं. आज ही आर्डर करें. धर्मोदय विद्यापीठ सागर (मध्यप्रदेश) 7582986222 , +91 94249 51771 आर्डर करने के Pay Now लिए बटन दबाएं अब दस लक्षण पर्व के बाद फिर से उपलब्ध होआ
  14. परं परन सूक्ष्मम।। 37।। इस सूत्र में सूक्ष्म का मतलब क्या छोटे बडे आकार से है ?
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