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Abhishek Jain

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  1. देवादिदेव श्री १००८ शासननायक महावीर भगवान, तेंदूखेड़ा, जिला नरसिंहपुर (म.प्र)
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    पद्मपुराण भाग 1
  3. ☀ *कल जन्म कल्याणक पर्व है* ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल २३ नवंबर, दिन शुक्रवार, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा शुभ तिथि को तृतीय *तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ संभवनाथ भगवान* का *जन्म कल्याणक* पर्व है तथा *श्री अष्टान्हिका पर्व का अंतिम दिन* है- 🙏🏻 कल अत्यंत भक्तिभाव से *देवादिदेव श्री १००८ संभवनाथ भगवान* की पूजन कर जन्म कल्याणक पर्व मनाएँ। 🙏🏻 *संभवनाथ भगवान की जय*🙏🏻 🙏🏻 *जन्म कल्याणक पर्व की जय*🙏🏻 👏🏻 *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई* 👏🏻
  4. ? *कल चतुर्दशी पर्व है* ? जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल २३ अक्टूबर, दिन मंगलवार को अश्विन शुक्ल चतुर्दशी तिथि अर्थात *चतुर्दशी पर्व* है। ?? प्रतिदिन जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करना अपना मनुष्य जीवन मिलना सार्थक करना है अतः प्रतिदिन देवदर्शन करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन नहीं कर पाते उनको कम से कम अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में देवदर्शन अवश्य करना चाहिए। ?? जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन करते हैं उनको अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में श्रीजी के अभिषेक व् पूजन आदि के माध्यम से अपने जीवन को धन्य करना चाहिए। ?? जमीकंद का उपयोग घोर
  5. ? *कल अष्टमी व् मोक्षकल्याणक पर्व*? जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल १७ अक्टूबर, दिन बुधवार, अश्विन शुक्ल अष्टमी की शुभ तिथि को *१० वें तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान* का *मोक्ष कल्याणक पर्व* तथा *अष्टमी पर्व* है। ?? कल अत्यंत भक्ति-भाव से देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान की पूजन करें तथा अपने भी कल्याण की भावना से भगवान के श्री चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित करें। ?? प्रतिदिन जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करना अपना मनुष्य जीवन मिलना सार्थक करना है अतः प्रतिदिन देवदर्शन करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन नहीं कर पाते उनको कम से कम अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्
  6. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, आप जान रहे हैं एक ऐसे महापुरुष की आत्मकथा जिनका जन्म तो अजैन कुल में हुआ था लेकिन जो आत्मकल्याण हेतु संयम मार्ग पर चले तथा वर्तमान में सुलभ दिख रही जैन संस्कृति के सम्बर्धन का श्रेय उन्ही को जाता है। प्रस्तुत अंशो से हम लोग देख रहे हैं पूज्य वर्णी ने कितनी सहजता से अपनी ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आई सभी बातों को प्रस्तुत किया है। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"* *क्रमांक -६४* ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में
  7. ? *१५ जनवरी को प्रथम तीर्थंकर मोक्षकल्याणक पर्व*? जय जिनेन्द्र बंधुओं, १५ जनवरी, दिन सोमवार, माघ कृष्ण चतुर्दशी की शुभ तिथि को इस अवसर्पणी काल के *प्रथम तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ ऋषभनाथ भगवान* का मोक्ष कल्याणक पर्व आ रहा है- ?? १५ जनवरी को सभी अपने-२ नजदीकी जिनालयों में सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाकर मोक्षकल्याणक पर्व मनाएँ। ?? इस पुनीत अवसर धर्म प्रभावना के अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। ?? इस पुनीत अवसर मानव सेवा के कार्यक्रमों का भी आयोजन करना चाहिए। ?? *ऋषभनाथ भगवान की जय*?? ?? *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*??
  8. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, पूज्य वर्णीजी की प्रारम्भ से ही ज्ञानार्जन की प्रबल भावना थी तभी तो वह अभावजन्य विषय परिस्थियों में भी आगे आकर ज्ञानार्जन हेतु संलग्न हो पाये। भरी गर्मी में दोपहर में एक मील ज्ञानार्जन हेतु पैदल जाना भी उनकी ज्ञानपिपासा का ही परिचय है। बहुत ही सरल ह्रदय थे गणेशप्रसाद। उनके जीवन का सम्पूर्ण वर्णन बहुत ही ह्रदयस्पर्शी हैं। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"* *क्रमांक -६३* पं. बलदेवदासजी महराज को मध्यन्होंपरांत ही अध्ययन कराने का अवस
  9. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ से गणेशप्रसाद का जैनधर्म के बड़े विद्वान पं. गोपालदासजी वरैयाजी से संपर्क का वर्णन प्रारम्भ हुआ। वर्णीजी ने यहाँ उस समय उनके गुरु पं. पन्नालालजी बाकलीवाल का भी उनके जीवन में बहुत महत्व बताया है। वर्णीजी के अध्यन के समय तक सिर्फ हस्तलिखित ग्रंथ ही प्रचलन में थे। यह महत्वपूर्ण बात यहाँ से ज्ञात होती है। जिनवाणी की कितनी विनय थी उस समय के श्रावकों में कि ग्रंथों का मुद्रण भी योग्य नहीं समझते थे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *पं.गोपालदास वरैया के संपर्क में* *क्रमांक - ६२*
  10. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ वर्णीजी द्वारा जयपुर मेले का वर्णन चल रहा है। इस मेले में जैनधर्म की बहुत ही प्रभावना हुई। जयपुर नरेश द्वारा व्यक्त की जिनबिम्ब की महिमा बहुत सुंदर वर्णन है। श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंदजी सोनी द्वारा मेले के आयोजन के कारण ही धर्म की अधिक प्रभावना हुई। यहाँ वर्णीजी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही- द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय है लेकिन उसका सदुपयोग बहुत ही कम पुण्यात्मा कर पाते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"महान मेला"* *क्रमांक-६२* मेला म
  11. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ वर्णीजी ने जयपुर के मेले का उल्लेख किया है। मेले से तात्पर्य धार्मिक आयोजन से रहता है। यहाँ पर वर्णी जी ने स्व. श्री मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों का विशेष उल्लेख किया। उनकी विद्वानों के प्रति आदर की प्रवृत्ति से अपष्ट होता है कि जो जितना गुणवान होता है वह उतना विनम्र होता है। ऐसे गुणी लोगों के संस्मरण हम श्रावकों को भी दिशादर्शन करते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेश प्रसाद वर्णी? *"महान मेला"* *क्रमांक - ६०* उन दिनों जयपुर में एक महान मेला हुआ था, जिसमें भा
  12. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ पूज्यवर्णी जी ने जयपुर में उस समय श्रावकों की धर्म परायणता को व्यक्त किया है। साथ ही वहाँ से पाठशालाओं आदि से निकले विद्वानों का भी उल्लेख किया है। आप सोच सकते हैं कि इन सभी विद्वानों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना, अतः उनसे मुझे क्या प्रयोजन। मेरा मानना है कि पूज्य वर्णी जी द्वारा उल्लखित विद्वानों का वर्णन आज हम लोगों के लिए इतिहास की भाँति ही है। यह एक सौभाग्य ही है जो हमको गुणीजनों तथा उनके गुणों को जानने का अवसर मिल रहा है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"यह है जयपुर"*
  13. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, आजकी प्रस्तुती में गणेश प्रसाद के जयपुर में अध्ययन का उल्लेख तथा उनकी पत्नी की मृत्यु के समाचार मिलने आदि का उल्लेख है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"चिरकांक्षित जयपुर"* *"क्रमांक - ५८"* यहाँ जयपुर में मैंने १२ मास रहकर श्री वीरेश्वरजी शास्त्री से कातन्त्र व्याकरण का अभ्यास किया और श्री चन्द्रप्रभचरित्र भी पाँच सर्ग पढ़ा। श्री तत्वार्थसूत्रजी का अभ्यास किया और एक अध्याय श्री सर्वार्थसिद्धि का भी अध्ययन किया। इतना पढ़ बम्बई की परीक्षा में बैठ गया। जब कातन्त्र व
  14. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, गणेश प्रसाद के अंदर लंबे समय से जयपुर जाकर अध्ययन करने की भावना चल रही थी। विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हुए वह जयपुर पहुँचे। वर्णीजी बहुत ही सरल प्रवृत्ति के थे। आर्जव गुण अर्थात मन, वचन व काय की एकरूपता उनके जीवन से सीखी जा सकती है। आज की प्रस्तुती में कलाकंद का प्रसंग आया, आत्मकथा में उनके द्वारा इसका वर्णन उनके ह्रदय की स्वच्छता का परिचय देता है। उस समय वह एक विद्यार्थी से व्रती नहीं थे। अगली प्रस्तुती में उनके अध्ययन के विषय तथा पत्नी की मृत्यु आदि बातों को जानेंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
  15. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, बम्बई में गणेश प्रसाद का अध्ययन प्रारम्भ हो गया लेकिन जलवायु उनके स्वास्थ्य के अनुकूल न थी अस्वस्थ्य हो गये। यहाँ से पूना गए। स्वास्थ्य ठीक होने पर बम्बई आए, वहाँ कुछ दिन बार पुनः ज्वर आने लगा। वहाँ से अजमेर का पास केकड़ी गया। कुछ दिन ठहरा वहाँ से गणेशप्रसाद चिरकाल से प्रतीक्षित स्थान जयपुर गए। कल से उसका वर्णन रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"विद्याध्ययन का सुयोग"* *क्रमांक - ५६* मेरा परीक्षाफल देखकर देहली के एक जवेरी लक्ष्मीचंद्रजी ने कहा कि 'दस रुपया मासिक हम बराब
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