Jump to content
JainSamaj.World

Abhishek Jain

Members
  • Posts

    432
  • Joined

  • Last visited

  • Days Won

    3

Abhishek Jain last won the day on April 20

Abhishek Jain had the most liked content!

About Abhishek Jain

  • Birthday 09/25/1982

Recent Profile Visitors

2,095 profile views

Abhishek Jain's Achievements

Newbie

Newbie (1/14)

6

Reputation

  1. देवादिदेव श्री १००८ शासननायक महावीर भगवान, तेंदूखेड़ा, जिला नरसिंहपुर (म.प्र)
  2. Version 1..2

    790 downloads

    पद्मपुराण भाग 1
  3. ☀ *कल जन्म कल्याणक पर्व है* ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल २३ नवंबर, दिन शुक्रवार, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा शुभ तिथि को तृतीय *तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ संभवनाथ भगवान* का *जन्म कल्याणक* पर्व है तथा *श्री अष्टान्हिका पर्व का अंतिम दिन* है- 🙏🏻 कल अत्यंत भक्तिभाव से *देवादिदेव श्री १००८ संभवनाथ भगवान* की पूजन कर जन्म कल्याणक पर्व मनाएँ। 🙏🏻 *संभवनाथ भगवान की जय*🙏🏻 🙏🏻 *जन्म कल्याणक पर्व की जय*🙏🏻 👏🏻 *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई* 👏🏻
  4. ? *कल चतुर्दशी पर्व है* ? जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल २३ अक्टूबर, दिन मंगलवार को अश्विन शुक्ल चतुर्दशी तिथि अर्थात *चतुर्दशी पर्व* है। ?? प्रतिदिन जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करना अपना मनुष्य जीवन मिलना सार्थक करना है अतः प्रतिदिन देवदर्शन करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन नहीं कर पाते उनको कम से कम अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में देवदर्शन अवश्य करना चाहिए। ?? जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन करते हैं उनको अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में श्रीजी के अभिषेक व् पूजन आदि के माध्यम से अपने जीवन को धन्य करना चाहिए। ?? जमीकंद का उपयोग घोर हिंसा का कारण है अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए। जो लोग इनका उपयोग करते हैं उनको पर्व के इन दोनों में इनका त्याग करके सुख की ओर आगे बढ़ना चाहिए। ?? इस दिन रागादि भावों को कम करके ब्रम्हचर्य के साथ रहना चाहिए। ☀ बच्चों को धर्म के संस्कार देना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है और बच्चों पर माता-पिता का सबसे बड़ा उपकार है। धर्म के संस्कार संतान को वर्तमान में तो विपत्तियों से रक्षा करते ही हैं साथ ही पर भव में भी नरक तिर्यंच गति आदि के दुखों से बचाते हैं। *बच्चों को पाठशाला अवश्य भेजें।* ?? *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*?? *"मातृभाषा अपनाएँ, संस्कृति बचाएँ"*
  5. ? *कल अष्टमी व् मोक्षकल्याणक पर्व*? जय जिनेन्द्र बंधुओं, कल १७ अक्टूबर, दिन बुधवार, अश्विन शुक्ल अष्टमी की शुभ तिथि को *१० वें तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान* का *मोक्ष कल्याणक पर्व* तथा *अष्टमी पर्व* है। ?? कल अत्यंत भक्ति-भाव से देवादिदेव श्री १००८ शीतलनाथ भगवान की पूजन करें तथा अपने भी कल्याण की भावना से भगवान के श्री चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित करें। ?? प्रतिदिन जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करना अपना मनुष्य जीवन मिलना सार्थक करना है अतः प्रतिदिन देवदर्शन करना चाहिए। जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन नहीं कर पाते उनको कम से कम अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में देवदर्शन अवश्य करना चाहिए। ?? जो लोग प्रतिदिन देवदर्शन करते हैं उनको अष्टमी/चतुर्दशी आदि पर्व के दिनों में श्रीजी के अभिषेक व् पूजन आदि के माध्यम से अपने जीवन को धन्य करना चाहिए। ?? जमीकंद का उपयोग घोर हिंसा का कारण है अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए। जो लोग इनका उपयोग करते हैं उनको पर्व के इन दोनों में इनका त्याग करके सुख की ओर आगे बढ़ना चाहिए। ?? इस दिन रागादि भावों को कम करके ब्रम्हचर्य के साथ रहना चाहिए। ☀ बच्चों को धर्म के संस्कार देना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है और बच्चों पर माता-पिता का सबसे बड़ा उपकार है। धर्म के संस्कार संतान को वर्तमान में तो विपत्तियों से रक्षा करते ही हैं साथ ही पर भव में भी नरक तिर्यंच गति आदि के दुखों से बचाते हैं। *बच्चों को पाठशाला अवश्य भेजें।* ?? *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*?? *"मातृभाषा अपनाएँ, संस्कृति बचाएँ"*
  6. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, आप जान रहे हैं एक ऐसे महापुरुष की आत्मकथा जिनका जन्म तो अजैन कुल में हुआ था लेकिन जो आत्मकल्याण हेतु संयम मार्ग पर चले तथा वर्तमान में सुलभ दिख रही जैन संस्कृति के सम्बर्धन का श्रेय उन्ही को जाता है। प्रस्तुत अंशो से हम लोग देख रहे हैं पूज्य वर्णी ने कितनी सहजता से अपनी ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आई सभी बातों को प्रस्तुत किया है। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"* *क्रमांक -६४* ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था। आपके भोजन की व्यवस्था श्रीमान बरैयाजी ने मेरे जिम्मे कर दी। चतुर्दशी का दिन था। पंडितजी ने कहा बाजार से पूड़ी तथा शाक ले आओ।' मैं बाजार गया और हलवाई के यहाँ से पूडी तथा शाक ले आ रहा था कि मार्ग में देवयोग से श्रीमान पं. नंदराम जी साहब पुनः मिल गये। मैंने प्रणाम किया। पंडितजी ने देखते ही पूछा- 'कहाँ गये थे? मैंने कहा- पंडितजी के लिए बाजार से पूडी शाक लेने गया था।' उन्होंने कहा- 'किस पंडितजी के लिए?' मैंने उत्तर दिया- 'हरिपुर जिला इलाहाबाद के पंडित श्री ठाकुरप्रसाद जी के लिए, जोकि दिगम्बर जैन महाविद्यालय मथुरा में पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए हैं।' अच्छा, बताओ शाक क्या है? मैंने कहा - 'आलू और बैगन का।' सुनते ही पंडितजी साहब अत्यन्त कुपित हुए। क्रोध से झल्लाते हुए बोले- 'अरे मूर्ख नादान ! आज चतुर्दशी के दिन यह क्या अनर्थ किया?' मैंने धीमे स्वर में कहा- 'महाराज ! मैं तो छात्र हूँ? मैं अपने खाने को तो नहीं लाया, कौन सा अनर्थ इसमें हो गया? मैं तो आपकी दया का पात्र हूँ।' ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*? ?आजकी तिथि- वैशाख कृष्ण ७?
  7. ? *१५ जनवरी को प्रथम तीर्थंकर मोक्षकल्याणक पर्व*? जय जिनेन्द्र बंधुओं, १५ जनवरी, दिन सोमवार, माघ कृष्ण चतुर्दशी की शुभ तिथि को इस अवसर्पणी काल के *प्रथम तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ ऋषभनाथ भगवान* का मोक्ष कल्याणक पर्व आ रहा है- ?? १५ जनवरी को सभी अपने-२ नजदीकी जिनालयों में सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाकर मोक्षकल्याणक पर्व मनाएँ। ?? इस पुनीत अवसर धर्म प्रभावना के अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। ?? इस पुनीत अवसर मानव सेवा के कार्यक्रमों का भी आयोजन करना चाहिए। ?? *ऋषभनाथ भगवान की जय*?? ?? *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*?? *"मातृभाषा अपनाएँ,संस्कृति बचाएँ"*
  8. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, पूज्य वर्णीजी की प्रारम्भ से ही ज्ञानार्जन की प्रबल भावना थी तभी तो वह अभावजन्य विषय परिस्थियों में भी आगे आकर ज्ञानार्जन हेतु संलग्न हो पाये। भरी गर्मी में दोपहर में एक मील ज्ञानार्जन हेतु पैदल जाना भी उनकी ज्ञानपिपासा का ही परिचय है। बहुत ही सरल ह्रदय थे गणेशप्रसाद। उनके जीवन का सम्पूर्ण वर्णन बहुत ही ह्रदयस्पर्शी हैं। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"* *क्रमांक -६३* पं. बलदेवदासजी महराज को मध्यन्होंपरांत ही अध्ययन कराने का अवसर मिलता था। गर्मी के दिन थे पण्डितजी के घर जाने में प्रायः पत्थरों से पटी हुई सड़क मिलती थी। मोतीकटरा से पंडितजी का मकान एक मील अधिक दूर था, अतः मैं जूता पहने ही हस्तलिखित पुस्तक लेकर पण्डितजी के घर पर जाता था। यद्यपि इसमें अविनय थी और ह्रदय से ऐसा करना नहीं चाहता था, परंतु निरुपाय था। दुपहरी में यदि पत्थरों पर चलूँ तो पैरों को कष्ट हो, न जाऊँ तो अध्ययन से वंछित रहूँ-मैं दुविधा में पड़ गया। लाचार अंतरात्मा ने यही उत्तर दिया कि अभी तुम्हारी छात्रावस्था है, अध्ययन की मुख्यता रक्खो। अध्ययन के बाद कदापि ऐसी अविनय नहीं करना......इत्यादि तर्क-वितर्क के बाद मैं पढ़ने के लिए चला जाता था। यहाँ पर श्रीमान पंडित नंदराम जी रहते थे जो कि अद्वितीय हकीम थे। हकीमजी जैनधर्म के विद्वान ही न थे, सदाचारी भी थे। भोजनादि की भी उनके घर में पूर्ण शुद्धता थी। आप इतने दयालु थे कि आगरे में रहकर भी नाली आदि में मूत्र क्षेपण नहीं करते थे। एक दिन पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा था, देवयोग से आप मिल गये। कहने लगे- कहाँ जाते हो? मैंने कहा- 'महराज ! पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा हूँ।' 'बगल में क्या है!' मैंने कहा- पाठ्य पुस्तक सर्वार्थसिद्धि है।' आपने मेरा वाक्य श्रवण कर कहा - 'पंचम काल है ऐसा ही होगा, तुमसे धर्मोंनति की क्या आशा हो सकती है और पण्डितजी से क्या कहें? ' मैंने कहा- 'महराज निरुपाय हूँ।' उन्होंने कहा- 'इससे तो निरुक्षर रहना अच्छा।' मैंने कहा- महराज ! अभी गर्मी का प्रकोप है पश्चात यह अविनय न होगी।' उन्होंने एक न सुनी और कहा- 'अज्ञानी को उपदेश देने से क्या लाभ?' मैंने कहा- महराज ! जबकि भगवान पतितपावन हैं और आप उनके सिद्धांतों के अनुगामी हैं तब मुझ जैसे अज्ञानियों का उद्धार कीजिए। हम आपके बालक हैं, अतः आप ही बतलाइये कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या करूँ?' उन्होंने कहा- 'बातों के बनाने में तो अज्ञानी नहीं, पर आचार के पालने में अज्ञान बनते हो!' ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*? ?आजकी तिथि- श्रावण कृष्ण ४?
  9. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ से गणेशप्रसाद का जैनधर्म के बड़े विद्वान पं. गोपालदासजी वरैयाजी से संपर्क का वर्णन प्रारम्भ हुआ। वर्णीजी ने यहाँ उस समय उनके गुरु पं. पन्नालालजी बाकलीवाल का भी उनके जीवन में बहुत महत्व बताया है। वर्णीजी के अध्यन के समय तक सिर्फ हस्तलिखित ग्रंथ ही प्रचलन में थे। यह महत्वपूर्ण बात यहाँ से ज्ञात होती है। जिनवाणी की कितनी विनय थी उस समय के श्रावकों में कि ग्रंथों का मुद्रण भी योग्य नहीं समझते थे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *पं.गोपालदास वरैया के संपर्क में* *क्रमांक - ६२* बम्बई परीक्षा फल निकला। श्रीजी के चरणों के प्रसाद से मैं परीक्षा उत्तीर्ण हो गया। महती प्रसन्नता हुई। श्रीमान स्वर्गीय पंडित गोपालदासजी का पत्र आया कि मथुरा में दिगम्बर जैन विद्यालय खुलने वाला है, यदि तुम्हे आना हो तो आ सकते हो। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। मैं श्री पंडितजी की आज्ञा पाते ही आगरा चला गया और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहर गया। वहीं श्री गुरु पन्नालाल जी बाकलीवाल भी आ गये। आप बहुत ही उत्तम लेखक तथा संस्कृत के ज्ञाता थे। आपकी प्रकृति अत्यंत सरल और परोपकाररत थी। मेरे तो प्राण ही थे-इनके द्वारा मेरा जो उपकार हुआ उसे इस जन्म में नहीं भूल सकता। आप श्रीमान स्वर्गीय पं. बलदेवदास जी से सर्वार्थसिद्धि का अभ्यास करने लगे। मैं आपके साथ जाने लगा। उन दिनों छापे का प्रचार जैनियों में न था। मुद्रित पुस्तक का लेना महान अनर्थ का कारण माना जाता था, अतः हाथ से लिखे हुए ग्रंथों का पठन पाठन होता था। हम भी हाथ की लिखी सर्वार्थसिद्धि पर अभ्यास करते थे। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*? ?आजकी तिथि - श्रावण कृष्ण ३?
  10. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ वर्णीजी द्वारा जयपुर मेले का वर्णन चल रहा है। इस मेले में जैनधर्म की बहुत ही प्रभावना हुई। जयपुर नरेश द्वारा व्यक्त की जिनबिम्ब की महिमा बहुत सुंदर वर्णन है। श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंदजी सोनी द्वारा मेले के आयोजन के कारण ही धर्म की अधिक प्रभावना हुई। यहाँ वर्णीजी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही- द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय है लेकिन उसका सदुपयोग बहुत ही कम पुण्यात्मा कर पाते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"महान मेला"* *क्रमांक-६२* मेला में श्री महाराजाधिराज जयपुर नरेश भी पधारे थे। आपने मेले की सुंदरता देख बहुत ही प्रसन्नता व्यक्त की थी। तथा जिनबिम्बों को देखकर स्पष्ट शब्दों में कहा था कि - 'शुभ ध्यान की मुद्रा तो इससे उत्तम संसार में नहीं हो सकती। जिसे आत्मकल्याण करना हो वह इस प्रकार की मुद्रा बनाने का प्रयत्न करे। इस मुद्रा में बाह्यडम्बर छू भी नहीं गया है। साथ ही इनकी सौम्यता भी इतनी अधिक है कि इसे देखकर निश्चय हो जाता है कि जिनकी यह मुद्रा है उनके अंतरंग में कोई कलुषता नहीं थी। मैं यही भावना भाता हूँ कि मैं भी इसी पद को प्राप्त होऊँ। इस मुद्रा के देखने से जब इतनी शांति होती है तब जिनके ह्रदय में कलुषता नहीं उनकी शांति का अनुमान होना ही दुर्लभ है।' इस प्रकार मेला में जो जैनधर्म की अपूर्व प्रभावना हुई उसका श्रेय श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों के भाग्य में था। द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय से होता है परंतु उसका सदुपयोग विरले ही पुण्यात्माओं के भाग्य में होता है। जो वर्तमान में पुण्यात्मा हैं वही मोक्षमार्ग के अधिकारी हैं। संपत्ति पाकर मोक्षमार्ग का लाभ जिसने लिया उसी रत्न ने मनुष्य जन्म का लाभ लिया। अस्तु, यह मेला का वर्णन हुआ। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*? ?आजकि तिथि- श्रावण कृष्ण २?
  11. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ वर्णीजी ने जयपुर के मेले का उल्लेख किया है। मेले से तात्पर्य धार्मिक आयोजन से रहता है। यहाँ पर वर्णी जी ने स्व. श्री मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों का विशेष उल्लेख किया। उनकी विद्वानों के प्रति आदर की प्रवृत्ति से अपष्ट होता है कि जो जितना गुणवान होता है वह उतना विनम्र होता है। ऐसे गुणी लोगों के संस्मरण हम श्रावकों को भी दिशादर्शन करते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेश प्रसाद वर्णी? *"महान मेला"* *क्रमांक - ६०* उन दिनों जयपुर में एक महान मेला हुआ था, जिसमें भारत वर्ष के सभी विद्वान और धनिक वर्ग तथा सामान्य जनता का बृहत्समारोह हुआ। गायक भी अच्छे आये थे। मेला को भराने वाले श्री स्वर्गीय मूलचंद जी सोनी अजमेर वाले थे। यह बहुत ही धनाढ्य और सद्गृहस्थ थे। आपके द्वारा ही तेरापंथ का विशेष उत्थान हुआ- शिखरजी में तेरहपंथी कोठी का विशेष उत्थान आपके ही सत्प्रयत्न से हुआ। अजमेर में आपके मंदिर और नसियाँजी देखकर आपके वैभव का अनुमान होता है। आप केवल मंदिरों के ही उपासक ही न थे, पंडितों के भी बड़े प्रेमी थे। श्रीमान स्वर्गीय बलदेवदासजी आपही के मुख्य पंडित थे। जब पंडित जी अजमेर जाते और आपकी दुकान पर पहुँचते तब आप आदर पूर्वक उन्हें आपने स्थान पर बैठाते थे। पंडितजी महराज जब यह कहते कि आप हमारे मालिक हैं अतः दुकान पर यह व्यवहार योग्य नहीं, तब सेठजी साहब उत्तर देते कि महराज ! यह तो पुण्योदय की देन है परंतु आपके द्वारा वह लक्ष्मी मिल सकती है जिसका कभी नाश नहीं। आपकी सौम्य मुद्रा और सदाचार को देखकर बिना ही उपदेश के जीवों का कल्याण हो जाता है। हम तो आपके द्वारा उस मार्ग पर हैं जो आज तक नहीं पाया।' इस प्रकार सेठजी और पंडितजी का परस्पर सद्व्यवहार था। कहाँ तक उनका शिष्टाचार लिखा जावे? पंडितजी की सम्मति के बिना कोई भी धार्मिक कार्य सेठजी नहीं करते थे। जो जयपुर में मेला था वह पंडितजी की सम्मति से ही हुआ था। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*? ?आजकी तिथि - आषाढ़ शु. पूर्णिमा?
  12. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, यहाँ पूज्यवर्णी जी ने जयपुर में उस समय श्रावकों की धर्म परायणता को व्यक्त किया है। साथ ही वहाँ से पाठशालाओं आदि से निकले विद्वानों का भी उल्लेख किया है। आप सोच सकते हैं कि इन सभी विद्वानों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना, अतः उनसे मुझे क्या प्रयोजन। मेरा मानना है कि पूज्य वर्णी जी द्वारा उल्लखित विद्वानों का वर्णन आज हम लोगों के लिए इतिहास की भाँति ही है। यह एक सौभाग्य ही है जो हमको गुणीजनों तथा उनके गुणों को जानने का अवसर मिल रहा है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"यह है जयपुर"* *क्रमांक - ५९* जयपुर में इन दिनों विद्वानों का ही समागम न था, किन्तु बड़े-बड़े गृहस्थों का भी समागम था, जो अष्टमी चतुर्दशी को व्यापार छोड़कर मंदिर में धर्मध्यान द्वारा समय का सदुपयोग करते हैं। पठन-पाठन का जितना सुअवसर यहाँ था उतना अन्यत्र न था। एक जैन पाठशाला मनिहारों के रास्ते में थी। श्रीमान पं. नाथूलाल जी शास्त्री, श्रीमान पं. कस्तूरचंद जी शास्त्री, श्रीमान पं. जवाहरलाल जी शास्त्री तथा श्रीमान पं. इंद्रलालजी शास्त्री आदि इसी पाठशाला द्वारा गणनीय विद्वानों में हुए। कहाँ तक लिखूँ? बहुत से छात्र अभ्यास कर यहाँ से पंडित बन प्रखर विद्वान हो जैनधर्म का उपकार कर रहे हैं। यहाँ पर उन दिनों जब कि मैं पढ़ता था, श्रीमान स्वर्गीय अर्जुनदासजी भी एंट्रेंस में पढ़ते थे। आपकी अत्यंत प्रखर बुद्धि थी। साथ ही आपको जाति के उत्थान की भी प्रबल भावना थी। आपका व्याख्यान इतना प्रबल होता था कि जनता तत्काल ही आपने अनुकूल हो जाती थी। आपके द्वारा पाठशाला भी स्थापित हुई थी। उसमें पठन-पाठन बहुत सुचारू रूप से होता था। उसकी आगे चलकर अच्छी ख्याति हुई। कुछ दिनों बाद उसको राज्य से भी सहायता मिलने लगी। अच्छे-अच्छे छात्र उसमें आने लगे। आपका ध्येय देशोद्वार का विशेष था, अतः आपका कांग्रेस संस्था से अधिक प्रेम हो गया। आपका सिद्धांत जैनधर्म के अनुकूल ही राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करने का था। आप अहिंसा का यथार्थ स्वरूप समझते थे। बहुधा बहुत से पुरुष दया को हो अहिंसा मान बैठते हैं, पर आपको अहिंसा और दया के मार्मिक भेद का अनुगम था। ? *मेरी जीवनगाथा - आत्मकथा*? ?आजकी तिथि- आषाढ़ शु.पूर्णिमा?
  13. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, आजकी प्रस्तुती में गणेश प्रसाद के जयपुर में अध्ययन का उल्लेख तथा उनकी पत्नी की मृत्यु के समाचार मिलने आदि का उल्लेख है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"चिरकांक्षित जयपुर"* *"क्रमांक - ५८"* यहाँ जयपुर में मैंने १२ मास रहकर श्री वीरेश्वरजी शास्त्री से कातन्त्र व्याकरण का अभ्यास किया और श्री चन्द्रप्रभचरित्र भी पाँच सर्ग पढ़ा। श्री तत्वार्थसूत्रजी का अभ्यास किया और एक अध्याय श्री सर्वार्थसिद्धि का भी अध्ययन किया। इतना पढ़ बम्बई की परीक्षा में बैठ गया। जब कातन्त्र व्याकरण प्रश्नपत्र लिख रहा था, तब एक पत्र मेरे पास ग्राम से आया। उसमें लिखा था कि तुम्हारी स्त्री का देहावसान हो गया। मैंने मन ही मन कहा- 'हे प्रभो ! आज मैं बंधन से मुक्त हुआ।' यद्यपि अनेकों बंधनों का पात्र था, वह बंधन ऐसा था, जिससे मनुष्य की सर्व सुध-बुध भूल जाती है।' पत्र को पढ़ते देखकर श्री जमुनालालजी मंत्री ने कहा- 'प्रश्नपत्र छोड़कर पत्र क्यों पढ़ने लगे?' मैंने उत्तर दिया कि 'पत्र पर लिखा था कि जरूरी पत्र है।' उन्होंने पत्र को मांगा। मैंने दे दिया। पढ़कर उन्होंने समवेदना प्रगट की और कहा कि- 'चिंता मत करना, प्रश्नपत्र सावधानी से लिखना, हम तुम्हारी फिर से शादी करा देवेंगे।' मैंने कहा- 'अभी तो प्रश्नपत्र लिख रहा हूँ, बाद में सर्व व्यवस्था आपको श्रवण कराऊँगा।' अंत में सब व्यवस्था उन्हें सुना दी और उसी दिन बाईजी को पत्र सिमरा दिया एवं सब व्यवस्था लिख दी। यह भी लिख दिया कि 'अब मैं निशल्य होकर अध्ययन करूँगा।' इतने दिन से पत्र नहीं दिया सो क्षमा करना।' ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*? ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १३?
  14. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, गणेश प्रसाद के अंदर लंबे समय से जयपुर जाकर अध्ययन करने की भावना चल रही थी। विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हुए वह जयपुर पहुँचे। वर्णीजी बहुत ही सरल प्रवृत्ति के थे। आर्जव गुण अर्थात मन, वचन व काय की एकरूपता उनके जीवन से सीखी जा सकती है। आज की प्रस्तुती में कलाकंद का प्रसंग आया, आत्मकथा में उनके द्वारा इसका वर्णन उनके ह्रदय की स्वच्छता का परिचय देता है। उस समय वह एक विद्यार्थी से व्रती नहीं थे। अगली प्रस्तुती में उनके अध्ययन के विषय तथा पत्नी की मृत्यु आदि बातों को जानेंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"चिरकांक्षित जयपुर"* *क्रमांक - ५८* जयपुर की ठोलिया की धर्मशाला में ठहर गया। यहाँ जमनाप्रसादजी काला से मेरी मैत्री हो गई। उन्होंने श्रीवीरेश्वर शास्त्री के पास, जोकि राज्य के मुख्य विद्वान थे, मेरा पढ़ने का प्रबंध कर दिया। मैं आनंद से जयपुर में रहने लगा। यहाँ पर सब प्रकार की आपत्तियों से मुक्त हो गया। एक दिन श्री जैनमंदिर के दर्शन करने के लिए गया। मंदिर के पास श्री नेकरजी की दुकान थी। उनका कलाकंद भारत में प्रसिद्ध था। मैंने एक पाव कलाकंद लेकर खाया। अत्यंत स्वाद आया। फिर दूसरे दिन भी एक पाव खाया। कहने का तात्पर्य यह है कि मैं बारह मास जयपुर में रहा, परंतु एक दिन भी उसका त्याग न कर सका। अतः मनुष्यों को उचित है कि ऐसी प्रकृति न बनावें जो कष्ट उठाने पर उसे त्याग न सके। जयपुर छोड़ने के बाद ही वह आदत छूट सकी। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*? ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १२? ☀ पूज्य वर्णीजी के जीवन चरित्र को जानने के लिए अनेकों लोगों की जिज्ञासा देखने मिल रही है। मेरा प्रयास है कि मैं पूरी आत्मकथा को नियमित रूप से आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत करता रहूँ, लेकिन कभी-२ संभव नहीं हो पाता। वर्णीजी की आत्मकथा के प्रति आप लोगों की जिज्ञासा को जानकर मुझे प्रस्तुती के लिए उत्साह वर्धन होता रहता है।
  15. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, बम्बई में गणेश प्रसाद का अध्ययन प्रारम्भ हो गया लेकिन जलवायु उनके स्वास्थ्य के अनुकूल न थी अस्वस्थ्य हो गये। यहाँ से पूना गए। स्वास्थ्य ठीक होने पर बम्बई आए, वहाँ कुछ दिन बार पुनः ज्वर आने लगा। वहाँ से अजमेर का पास केकड़ी गया। कुछ दिन ठहरा वहाँ से गणेशप्रसाद चिरकाल से प्रतीक्षित स्थान जयपुर गए। कल से उसका वर्णन रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"विद्याध्ययन का सुयोग"* *क्रमांक - ५६* मेरा परीक्षाफल देखकर देहली के एक जवेरी लक्ष्मीचंद्रजी ने कहा कि 'दस रुपया मासिक हम बराबर देंगे, तुम सानंद अध्ययन करो।' मैं अध्ययन करने लगा किन्तु दुर्भाग्य का उदय इतना प्रबल था कि बम्बई का पानी मुझे अनुकूल न पड़ा। शरीर रोगी हो गया। गुरुजी और स्वर्गीय पं. गोपालदासजी ने बहुत ही समवेदना प्रगट की। तथा यह आदेश दिया कि तुम पूना जाओ, तुम्हारा सब प्रबंध हो जायेगा। एक पत्र भी लिख दिया। मैं उनका पत्र लेकर पूना चला गया। धर्मशाला में ठहरा। एक जैनी के यहाँ भोजन करने लगा। वहाँ की जलवायु सेवन करने से मुझे आराम हो गया। पश्चात एक मास बाद मैं बम्बई आ गया। वहाँ कुछ दिन ठहरा फिर ज्वर आने लगा। श्री गुरुजी ने मुझे अजमेर के पास केकड़ी है, वहाँ भेज दिया। केकड़ी में पं. धन्नालालजी, साहब रहते थे। योग्य पुरुष थे। आप बहुत ही दयालु और सदाचारी थे। आपके सहवास से मुझे बहुत लाभ हुआ। आपका कहना था कि 'जिसे आत्म-कल्याण करना हो वह जगत के प्रपंचों से दूर रहे।' आपके द्वारा यहाँ एक पाठशाला चलती थी। मैं श्रीमान रानीवालों की दुकान पर ठहर गया। उनके मुनीम बहुत योग्य थे। उन्होंने मेरा सब प्रबंध कर दिया। यहाँ औषधालय में जो वैद्यराज दौलतराम जी थे, वह बहुत ही सुयोग्य थे। मैंने कहा- महराज मैं तिजारी से बहुत दुखी हूँ। कोई ऐसी औषधि दीजिए जिससे मेरी बीमारी चली जावे। वैद्यराज ने मूँग के बराबर गोली दी और कहा- 'आज इसे खा लो तथा S४ दूध की S चावल डालकर खीर बनाओ तथा जितनी खाई जाए उतनी खाओ। कोई विकल्प न करना।' मैंने दिनभर खीर खाई। पेट खूब भर गया। पन्द्रह दिन केकड़ी में रहकर जयपुर चला गया। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*? ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १०?
×
×
  • Create New...