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अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१०


Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,

        आज का प्रसंग अवश्य पढ़ें। इस प्रसंग को पढ़कर आपको ज्ञात होगा कि किस तरह दिगम्बर मुनिराज अपने ऊपर आये समस्त उपसर्गों को अद्भुत समता के साथ सहन करते हैं और कष्टों के प्रति ग्लानि के भाव नहीं लाते भले ही उनको अपना शरीर ही क्यों न त्यागना  पढे।

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१०   ?


    "अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि १"

  
                   किसी को पता न था, कि मुनिराज को पुराना मृगी का रोग था, अग्नि का संपर्क पाकर अपस्मार का वेग हो गया। उससे मूर्छित होकर वे गिर गए और उनका पैर सिगड़ी की अग्नि के भीतर पड़ गया। पैर से जो रक्तधारा बही, उसने उस अग्नि को बुझाया।

          होश में आने के बाद मुनिराज ने सच्चे महावीरों के समान दृढ़वृत्ति का परिचय दिया तथा शांत भाव से द्वादश अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन पूर्वक उस असह्य वेदना को सहन किया, चुप चाप मौन ही रहे आए।

            प्रभात हुआ। दर्शनार्थी आये। भीषण दृश्य देखकर घबरा गए। अब समाज बड़ा दुखी हुआ, लेकिन एक का दुख दूसरा नहीं बांट सकता है? संयम अविरोधी उपचार किए गए, किन्तु वे फलप्रद न हुए। 

            प्रायः मुनि जीवन में संयमी रहने से रोग आता नहीं है, और यदि कोई बीमारी असाता के उदयवश आई तो शरीर को समाप्त होने से विलंब नहीं लगता है।

          श्री अनंतकीर्ति मुनिराज के शरीर में धनुर्वात रोग ने आक्रमण किया। लोग किंकर्तव्यविमूढ़ थे। बड़े-बड़ेविद्वान थे, किन्तु कर्मों के प्रचण्ड प्रहार के आगे पंडिताई क्या करेगी? उस रोग के कारण वे महराज मूर्छित हो जाते थे। सारा पैर जला है। उसकी वेदना शांत भाव से सहन करते थे। अब नया भीषण रोग आ गया।

             उस अवस्था में उनके मुख में कोई शब्द निकलते थे, तो  'अरिहंता सीमंधरा'। उस समय वे दुखी श्रावकों को उल्टा साहस देते हुए कहते थे, 'तुम क्यों घबराते हो, शरीर नहीं चलता, उसे छोड़ देना, रत्नत्रय धर्म नहीं छोड़ना' यह कहकर पुनः 'अरिहंता सीमंधरा' उच्चारण करते थे।

            उनकी स्थिरता, निस्पृहता, वैराग्यभाव आदि देखकर आदमी चकित हो जाता था। ऐसी स्थिति में दिखने लगता है कि इस आत्मा में भेद-विज्ञान का कितना उज्ज्वल प्रकाश है? मूर्च्छा आने पर चुप हो जाते, अन्यथा 'अरिहंता सीमांधरा' शब्द कुछ देर तक सुनाई देता था।

        अब प्रभु नाम लेते-लेते प्राणों ने उर्ध्वलोक प्रयाण किया। देखा तो ज्ञात हुआ कि महराज ने स्वर्गारोहण कर दिया। ऐसी विशुद्ध आत्मा का दाह संस्कार बस्ती के बाहर योग्य स्थल पर किया गया था। इस कारण मुरैना अनंतकीर्ति मुनिराज की समाधि भूमि के के रूप में मान्य है।

धन्य है संसार की यह सर्वोत्कृष्ट निर्ग्रन्थ अवस्था...नमोस्तु,नमोस्तु,नमोस्तु


? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?

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