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यह है जयपुर - ५९

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,

        यहाँ पूज्यवर्णी जी ने जयपुर में उस समय श्रावकों की धर्म परायणता को व्यक्त किया है। साथ ही वहाँ से पाठशालाओं आदि से निकले विद्वानों का भी उल्लेख किया है।

       आप सोच सकते हैं कि इन सभी विद्वानों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना, अतः उनसे मुझे क्या प्रयोजन। 

        मेरा मानना है कि पूज्य वर्णी जी द्वारा उल्लखित विद्वानों का वर्णन आज हम लोगों के लिए इतिहास की भाँति ही है। यह एक सौभाग्य ही है जो हमको गुणीजनों तथा उनके गुणों को जानने का अवसर मिल रहा है।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


               *"यह है जयपुर"*
            
                  *क्रमांक - ५९*


          जयपुर में इन दिनों विद्वानों का ही समागम न था, किन्तु बड़े-बड़े गृहस्थों का भी समागम था, जो अष्टमी चतुर्दशी को व्यापार छोड़कर मंदिर में धर्मध्यान द्वारा समय का सदुपयोग करते हैं।

        पठन-पाठन का जितना सुअवसर यहाँ था उतना अन्यत्र न था। एक जैन पाठशाला मनिहारों के रास्ते में थी। श्रीमान पं. नाथूलाल जी शास्त्री, श्रीमान पं. कस्तूरचंद जी शास्त्री, श्रीमान पं. जवाहरलाल जी शास्त्री तथा श्रीमान पं. इंद्रलालजी शास्त्री आदि इसी पाठशाला द्वारा गणनीय विद्वानों में हुए। कहाँ तक लिखूँ? बहुत से छात्र अभ्यास कर यहाँ से पंडित बन प्रखर विद्वान हो जैनधर्म का उपकार कर रहे हैं।

      यहाँ पर उन दिनों जब कि मैं पढ़ता था, श्रीमान स्वर्गीय अर्जुनदासजी भी एंट्रेंस में पढ़ते थे। आपकी अत्यंत प्रखर बुद्धि थी। साथ ही आपको जाति के उत्थान की भी प्रबल भावना थी।

     आपका व्याख्यान इतना प्रबल होता था कि जनता तत्काल ही आपने अनुकूल हो जाती थी। आपके द्वारा पाठशाला भी स्थापित हुई थी। उसमें पठन-पाठन बहुत सुचारू रूप से होता था। उसकी आगे चलकर अच्छी ख्याति हुई। कुछ दिनों बाद उसको राज्य से भी सहायता मिलने लगी। अच्छे-अच्छे छात्र उसमें आने लगे।

      आपका ध्येय देशोद्वार का विशेष था, अतः आपका कांग्रेस संस्था से अधिक प्रेम हो गया। आपका सिद्धांत जैनधर्म के अनुकूल ही राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करने का था। आप अहिंसा का यथार्थ स्वरूप समझते थे। बहुधा बहुत से पुरुष दया को हो अहिंसा मान बैठते हैं, पर आपको अहिंसा और दया के मार्मिक भेद का अनुगम था।

? *मेरी जीवनगाथा - आत्मकथा*?
?आजकी तिथि- आषाढ़ शु.पूर्णिमा?

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