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पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी का जैन संस्कृति के संवर्धन में बहुत अधिक महत्व है। ऐसे उपकारी पुरुष के जीवन को हम सभी को अवश्य ही जानना चाहिए।

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६४ - पं गोपालदास बरैया के संपर्क में


जय जिनेन्द्र बंधुओं,          
         आप जान रहे हैं एक ऐसे महापुरुष की आत्मकथा जिनका जन्म तो अजैन कुल में हुआ था लेकिन जो आत्मकल्याण हेतु संयम मार्ग पर चले तथा वर्तमान में सुलभ दिख रही जैन संस्कृति के सम्बर्धन का श्रेय उन्ही को जाता है।     प्रस्तुत अंशो से हम लोग देख रहे हैं पूज्य वर्णी ने कितनी सहजता से अपनी ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आई सभी बातों को प्रस्तुत किया है। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
      *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"*                     *क्रमांक -६४*
 
       ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था।         आपके भोजन की व्यवस्था श्रीमान बरैयाजी ने मेरे जिम्मे कर दी। चतुर्दशी का दिन था। पंडितजी ने कहा बाजार से पूड़ी तथा शाक ले आओ।' मैं बाजार गया और हलवाई के यहाँ से पूडी तथा शाक ले आ रहा था कि मार्ग में देवयोग से श्रीमान पं. नंदराम जी साहब पुनः मिल गये। मैंने प्रणाम किया।        पंडितजी ने देखते ही पूछा- 'कहाँ गये थे? मैंने कहा- पंडितजी के लिए बाजार से पूडी शाक लेने गया था।' उन्होंने कहा- 'किस पंडितजी के लिए?' मैंने उत्तर दिया- 'हरिपुर जिला इलाहाबाद के पंडित श्री ठाकुरप्रसाद जी के लिए, जोकि दिगम्बर जैन महाविद्यालय मथुरा में पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए हैं।'       अच्छा, बताओ शाक क्या है? मैंने कहा - 'आलू और बैगन का।' सुनते ही पंडितजी साहब अत्यन्त कुपित हुए। क्रोध से झल्लाते हुए बोले- 'अरे मूर्ख नादान ! आज चतुर्दशी के दिन यह क्या अनर्थ किया?'        मैंने धीमे स्वर में कहा- 'महाराज ! मैं तो छात्र हूँ? मैं अपने खाने को तो नहीं लाया, कौन सा अनर्थ इसमें हो गया? मैं तो आपकी दया का पात्र हूँ।'
? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथि- वैशाख कृष्ण ७?
 

पं गोपालदास जी बरैया के संपर्क में - ६३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,          
         पूज्य वर्णीजी की प्रारम्भ से ही ज्ञानार्जन की प्रबल भावना थी तभी तो वह अभावजन्य विषय परिस्थियों में भी आगे आकर ज्ञानार्जन हेतु संलग्न हो पाये। भरी गर्मी में दोपहर में एक मील ज्ञानार्जन हेतु पैदल जाना भी उनकी ज्ञानपिपासा का ही परिचय है।       बहुत ही सरल ह्रदय थे गणेशप्रसाद। उनके जीवन का सम्पूर्ण वर्णन बहुत ही ह्रदयस्पर्शी हैं। ? संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
      *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"*                      *क्रमांक -६३*
             पं. बलदेवदासजी महराज को मध्यन्होंपरांत ही अध्ययन कराने का अवसर मिलता था। गर्मी के दिन थे पण्डितजी के घर जाने में प्रायः पत्थरों से पटी हुई सड़क मिलती थी।        मोतीकटरा से पंडितजी का मकान एक मील अधिक दूर था, अतः मैं जूता पहने ही हस्तलिखित पुस्तक लेकर पण्डितजी के घर पर जाता था।        यद्यपि इसमें अविनय थी और ह्रदय से ऐसा करना नहीं चाहता था, परंतु निरुपाय था। दुपहरी में यदि पत्थरों पर चलूँ तो पैरों को कष्ट हो, न जाऊँ तो अध्ययन से वंछित रहूँ-मैं दुविधा में पड़ गया।        लाचार अंतरात्मा ने यही उत्तर दिया कि अभी तुम्हारी छात्रावस्था है, अध्ययन की मुख्यता रक्खो। अध्ययन के बाद कदापि ऐसी अविनय नहीं करना......इत्यादि तर्क-वितर्क के बाद मैं पढ़ने के लिए चला जाता था।       यहाँ पर श्रीमान पंडित नंदराम जी रहते थे जो कि अद्वितीय हकीम थे। हकीमजी जैनधर्म के विद्वान ही न थे, सदाचारी भी थे। भोजनादि की भी उनके घर में पूर्ण शुद्धता थी। आप इतने दयालु थे कि आगरे में रहकर भी नाली आदि में मूत्र क्षेपण नहीं करते थे।       एक दिन पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा था, देवयोग से आप मिल गये। कहने लगे- कहाँ जाते हो? मैंने कहा- 'महराज ! पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा हूँ।' 'बगल में क्या है!' मैंने कहा- पाठ्य पुस्तक सर्वार्थसिद्धि है।' आपने मेरा वाक्य श्रवण कर कहा - 'पंचम काल है ऐसा ही होगा, तुमसे धर्मोंनति की क्या आशा हो सकती है और पण्डितजी से क्या कहें? '       मैंने कहा- 'महराज निरुपाय हूँ।' उन्होंने कहा- 'इससे तो निरुक्षर रहना अच्छा।' मैंने कहा- महराज ! अभी गर्मी का प्रकोप है पश्चात यह अविनय न होगी।'        उन्होंने एक न सुनी और कहा- 'अज्ञानी को उपदेश देने से क्या लाभ?' मैंने कहा- महराज ! जबकि भगवान पतितपावन हैं और आप उनके सिद्धांतों के अनुगामी हैं तब मुझ जैसे अज्ञानियों का उद्धार कीजिए। हम आपके बालक हैं, अतः आप ही बतलाइये कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या करूँ?'       उन्होंने कहा- 'बातों के बनाने में तो अज्ञानी नहीं, पर आचार के पालने में अज्ञान बनते हो!'        ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथि- श्रावण कृष्ण ४?

Abhishek Jain

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पं गोपालदास जी बरैया के संपर्क में - ६२


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        यहाँ से गणेशप्रसाद का जैनधर्म के बड़े विद्वान पं. गोपालदासजी वरैयाजी से संपर्क का वर्णन प्रारम्भ हुआ। वर्णीजी ने यहाँ उस समय उनके गुरु पं. पन्नालालजी बाकलीवाल का भी उनके जीवन में बहुत महत्व बताया है।         वर्णीजी के अध्यन के समय तक सिर्फ हस्तलिखित ग्रंथ ही प्रचलन में थे। यह महत्वपूर्ण बात यहाँ से ज्ञात होती है। जिनवाणी की कितनी विनय थी उस समय के श्रावकों में कि ग्रंथों का मुद्रण भी योग्य नहीं समझते थे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
*पं.गोपालदास वरैया के संपर्क में*
   
                    *क्रमांक - ६२*
                बम्बई परीक्षा फल निकला। श्रीजी के चरणों के प्रसाद से मैं परीक्षा उत्तीर्ण हो गया। महती प्रसन्नता हुई।          श्रीमान स्वर्गीय पंडित गोपालदासजी का पत्र आया कि मथुरा में दिगम्बर जैन विद्यालय खुलने वाला है, यदि तुम्हे आना हो तो आ सकते हो। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।         मैं श्री पंडितजी की आज्ञा पाते ही आगरा चला गया और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहर गया। वहीं श्री गुरु पन्नालाल जी बाकलीवाल भी आ गये। आप बहुत ही उत्तम लेखक तथा संस्कृत के ज्ञाता थे।           आपकी प्रकृति अत्यंत सरल और परोपकाररत थी। मेरे तो प्राण ही थे-इनके द्वारा मेरा जो उपकार हुआ उसे इस जन्म में नहीं भूल सकता। आप श्रीमान स्वर्गीय पं. बलदेवदास जी से सर्वार्थसिद्धि का अभ्यास करने लगे। मैं आपके साथ जाने लगा।       उन दिनों छापे का प्रचार जैनियों में न था। मुद्रित पुस्तक का लेना महान अनर्थ का कारण माना जाता था, अतः हाथ से लिखे हुए ग्रंथों का पठन पाठन होता था। हम भी हाथ की लिखी सर्वार्थसिद्धि पर अभ्यास करते थे। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथि - श्रावण कृष्ण ३?

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महान मेला - ६१


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        यहाँ वर्णीजी द्वारा जयपुर मेले का वर्णन चल रहा है। इस मेले में जैनधर्म की बहुत ही प्रभावना हुई।       जयपुर नरेश द्वारा व्यक्त की जिनबिम्ब की महिमा बहुत सुंदर वर्णन है।      श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंदजी सोनी द्वारा मेले के आयोजन के कारण ही धर्म की अधिक प्रभावना हुई। यहाँ वर्णीजी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही- द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय है लेकिन उसका सदुपयोग बहुत ही कम पुण्यात्मा कर पाते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                  *"महान मेला"*                      *क्रमांक-६२*
            मेला में श्री महाराजाधिराज जयपुर नरेश भी पधारे थे। आपने मेले की सुंदरता देख बहुत ही प्रसन्नता व्यक्त की थी। तथा जिनबिम्बों को देखकर स्पष्ट शब्दों में कहा था कि - 'शुभ ध्यान की मुद्रा तो इससे उत्तम संसार में नहीं हो सकती।          जिसे आत्मकल्याण करना हो वह इस प्रकार की मुद्रा बनाने का प्रयत्न करे। इस मुद्रा में बाह्यडम्बर छू भी नहीं गया है। साथ ही इनकी सौम्यता भी इतनी अधिक है कि इसे देखकर निश्चय हो जाता है कि जिनकी यह मुद्रा है उनके अंतरंग में कोई कलुषता नहीं थी।         मैं यही भावना भाता हूँ कि मैं भी इसी पद को प्राप्त होऊँ। इस मुद्रा के देखने से जब इतनी शांति होती है तब जिनके ह्रदय में कलुषता नहीं उनकी शांति का अनुमान होना ही दुर्लभ है।'        इस प्रकार मेला में जो जैनधर्म की अपूर्व प्रभावना हुई उसका श्रेय श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों के भाग्य में था। द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय से होता है परंतु उसका सदुपयोग विरले ही पुण्यात्माओं के भाग्य में होता है।       जो वर्तमान में पुण्यात्मा हैं वही मोक्षमार्ग के अधिकारी हैं। संपत्ति पाकर मोक्षमार्ग का लाभ जिसने लिया उसी रत्न ने मनुष्य जन्म का लाभ लिया। अस्तु, यह मेला का वर्णन हुआ। ? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
 ?आजकि तिथि- श्रावण कृष्ण २?

Abhishek Jain

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महान मेला - ६०


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        यहाँ वर्णीजी ने जयपुर के मेले का उल्लेख किया है। मेले से तात्पर्य धार्मिक आयोजन से रहता है।        यहाँ पर वर्णी जी ने स्व. श्री मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों का विशेष उल्लेख किया। उनकी विद्वानों के प्रति आदर की प्रवृत्ति से अपष्ट होता है कि जो जितना गुणवान होता है वह उतना विनम्र होता है। ऐसे गुणी लोगों के संस्मरण हम श्रावकों को भी दिशादर्शन करते हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेश प्रसाद वर्णी?
                   *"महान मेला"*
            
                     *क्रमांक - ६०*
              उन दिनों जयपुर में एक महान मेला हुआ था, जिसमें भारत वर्ष के सभी विद्वान और धनिक वर्ग तथा सामान्य जनता का बृहत्समारोह हुआ। गायक भी अच्छे आये थे।       मेला को भराने वाले श्री स्वर्गीय मूलचंद जी सोनी अजमेर वाले थे। यह बहुत ही धनाढ्य और सद्गृहस्थ थे। आपके द्वारा ही तेरापंथ का विशेष उत्थान हुआ- शिखरजी में तेरहपंथी कोठी का विशेष उत्थान आपके ही सत्प्रयत्न से हुआ। अजमेर में आपके मंदिर और नसियाँजी देखकर आपके वैभव का अनुमान होता है।              आप केवल मंदिरों के ही उपासक ही न थे, पंडितों के भी बड़े प्रेमी थे। श्रीमान स्वर्गीय बलदेवदासजी आपही के मुख्य पंडित थे। जब पंडित जी अजमेर जाते और आपकी दुकान पर पहुँचते तब आप आदर पूर्वक उन्हें आपने स्थान पर बैठाते थे। पंडितजी महराज जब यह कहते कि आप हमारे मालिक हैं अतः दुकान पर यह व्यवहार योग्य नहीं, तब सेठजी साहब उत्तर देते कि महराज ! यह तो पुण्योदय की देन है  परंतु आपके द्वारा वह लक्ष्मी मिल सकती है जिसका कभी नाश नहीं।       आपकी सौम्य मुद्रा और सदाचार को देखकर बिना ही उपदेश के जीवों का कल्याण हो जाता है। हम तो आपके द्वारा उस मार्ग पर हैं जो आज तक नहीं पाया।'       इस प्रकार सेठजी और पंडितजी का परस्पर सद्व्यवहार था। कहाँ तक उनका शिष्टाचार लिखा जावे? पंडितजी की सम्मति के बिना कोई भी धार्मिक कार्य सेठजी नहीं करते थे। जो जयपुर में मेला था वह पंडितजी की सम्मति से ही हुआ था।
? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
?आजकी तिथि - आषाढ़ शु. पूर्णिमा?

Abhishek Jain

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यह है जयपुर - ५९


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         यहाँ पूज्यवर्णी जी ने जयपुर में उस समय श्रावकों की धर्म परायणता को व्यक्त किया है। साथ ही वहाँ से पाठशालाओं आदि से निकले विद्वानों का भी उल्लेख किया है।        आप सोच सकते हैं कि इन सभी विद्वानों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना, अतः उनसे मुझे क्या प्रयोजन।          मेरा मानना है कि पूज्य वर्णी जी द्वारा उल्लखित विद्वानों का वर्णन आज हम लोगों के लिए इतिहास की भाँति ही है। यह एक सौभाग्य ही है जो हमको गुणीजनों तथा उनके गुणों को जानने का अवसर मिल रहा है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
               *"यह है जयपुर"*
            
                  *क्रमांक - ५९*
          जयपुर में इन दिनों विद्वानों का ही समागम न था, किन्तु बड़े-बड़े गृहस्थों का भी समागम था, जो अष्टमी चतुर्दशी को व्यापार छोड़कर मंदिर में धर्मध्यान द्वारा समय का सदुपयोग करते हैं।         पठन-पाठन का जितना सुअवसर यहाँ था उतना अन्यत्र न था। एक जैन पाठशाला मनिहारों के रास्ते में थी। श्रीमान पं. नाथूलाल जी शास्त्री, श्रीमान पं. कस्तूरचंद जी शास्त्री, श्रीमान पं. जवाहरलाल जी शास्त्री तथा श्रीमान पं. इंद्रलालजी शास्त्री आदि इसी पाठशाला द्वारा गणनीय विद्वानों में हुए। कहाँ तक लिखूँ? बहुत से छात्र अभ्यास कर यहाँ से पंडित बन प्रखर विद्वान हो जैनधर्म का उपकार कर रहे हैं।       यहाँ पर उन दिनों जब कि मैं पढ़ता था, श्रीमान स्वर्गीय अर्जुनदासजी भी एंट्रेंस में पढ़ते थे। आपकी अत्यंत प्रखर बुद्धि थी। साथ ही आपको जाति के उत्थान की भी प्रबल भावना थी।      आपका व्याख्यान इतना प्रबल होता था कि जनता तत्काल ही आपने अनुकूल हो जाती थी। आपके द्वारा पाठशाला भी स्थापित हुई थी। उसमें पठन-पाठन बहुत सुचारू रूप से होता था। उसकी आगे चलकर अच्छी ख्याति हुई। कुछ दिनों बाद उसको राज्य से भी सहायता मिलने लगी। अच्छे-अच्छे छात्र उसमें आने लगे।       आपका ध्येय देशोद्वार का विशेष था, अतः आपका कांग्रेस संस्था से अधिक प्रेम हो गया। आपका सिद्धांत जैनधर्म के अनुकूल ही राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करने का था। आप अहिंसा का यथार्थ स्वरूप समझते थे। बहुधा बहुत से पुरुष दया को हो अहिंसा मान बैठते हैं, पर आपको अहिंसा और दया के मार्मिक भेद का अनुगम था। ? *मेरी जीवनगाथा - आत्मकथा*?
?आजकी तिथि- आषाढ़ शु.पूर्णिमा?

Abhishek Jain

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चिरकांक्षित जयपुर - ५८


जय जिनेन्द्र बंधुओं,       आजकी प्रस्तुती में गणेश प्रसाद के जयपुर में अध्ययन का उल्लेख तथा उनकी पत्नी की मृत्यु के समाचार मिलने आदि का उल्लेख है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
             *"चिरकांक्षित जयपुर"*                     *"क्रमांक - ५८"*
          यहाँ जयपुर में मैंने १२ मास रहकर श्री वीरेश्वरजी शास्त्री से कातन्त्र व्याकरण का अभ्यास किया और श्री चन्द्रप्रभचरित्र भी पाँच सर्ग पढ़ा।        श्री तत्वार्थसूत्रजी का अभ्यास किया और एक अध्याय श्री सर्वार्थसिद्धि का भी अध्ययन किया। इतना पढ़ बम्बई की परीक्षा में बैठ गया।         जब कातन्त्र व्याकरण प्रश्नपत्र लिख रहा था, तब एक पत्र मेरे पास ग्राम से आया। उसमें लिखा था कि तुम्हारी स्त्री का देहावसान हो गया। मैंने मन ही मन कहा- 'हे प्रभो ! आज मैं बंधन से मुक्त हुआ।' यद्यपि अनेकों बंधनों का पात्र था, वह बंधन ऐसा था, जिससे मनुष्य की सर्व सुध-बुध भूल जाती है।'        पत्र को पढ़ते देखकर श्री जमुनालालजी मंत्री ने कहा- 'प्रश्नपत्र छोड़कर पत्र क्यों पढ़ने लगे?'      मैंने उत्तर दिया कि 'पत्र पर लिखा था कि जरूरी पत्र है।' उन्होंने पत्र को मांगा। मैंने दे दिया।       पढ़कर उन्होंने समवेदना प्रगट की और कहा कि- 'चिंता मत करना, प्रश्नपत्र सावधानी से लिखना, हम तुम्हारी फिर से शादी करा देवेंगे।'        मैंने कहा- 'अभी तो प्रश्नपत्र लिख रहा हूँ, बाद में सर्व व्यवस्था आपको श्रवण कराऊँगा।'       अंत में सब व्यवस्था उन्हें सुना दी और उसी दिन बाईजी को पत्र सिमरा दिया एवं सब व्यवस्था लिख दी। यह भी लिख दिया कि 'अब मैं निशल्य होकर अध्ययन करूँगा।' इतने दिन से पत्र नहीं दिया सो क्षमा करना।' ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १३?

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चिरकांक्षित जयपुर - ५७


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
        गणेश प्रसाद के अंदर लंबे समय से जयपुर जाकर अध्ययन करने की भावना चल रही थी। विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हुए वह जयपुर पहुँचे।        वर्णीजी बहुत ही सरल प्रवृत्ति के थे। आर्जव गुण अर्थात मन, वचन व काय की एकरूपता उनके जीवन से सीखी जा सकती है।         आज की प्रस्तुती में कलाकंद का प्रसंग आया, आत्मकथा में उनके द्वारा इसका वर्णन उनके ह्रदय की स्वच्छता का परिचय देता है। उस समय वह एक विद्यार्थी से व्रती नहीं थे।       अगली प्रस्तुती में उनके अध्ययन के विषय तथा पत्नी की मृत्यु आदि बातों को जानेंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
            *"चिरकांक्षित जयपुर"*                      *क्रमांक - ५८*
                जयपुर की ठोलिया की धर्मशाला में ठहर गया। यहाँ जमनाप्रसादजी काला से मेरी मैत्री हो गई। उन्होंने श्रीवीरेश्वर शास्त्री के पास, जोकि राज्य के मुख्य विद्वान थे, मेरा पढ़ने का प्रबंध कर दिया। मैं आनंद से जयपुर में रहने लगा। यहाँ पर सब प्रकार की आपत्तियों से मुक्त हो गया।         एक दिन श्री जैनमंदिर के दर्शन करने के लिए गया। मंदिर के पास श्री नेकरजी की दुकान थी।  उनका कलाकंद भारत में प्रसिद्ध था। मैंने एक पाव कलाकंद लेकर खाया। अत्यंत स्वाद आया। फिर दूसरे दिन भी एक पाव खाया। कहने का तात्पर्य यह है कि मैं बारह मास जयपुर में रहा, परंतु एक दिन भी उसका त्याग न कर सका। अतः मनुष्यों को उचित है कि ऐसी प्रकृति न बनावें जो कष्ट उठाने पर उसे त्याग न सके। जयपुर छोड़ने के बाद ही वह आदत छूट सकी। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १२?

पूज्य वर्णीजी के जीवन चरित्र को जानने के लिए अनेकों लोगों की जिज्ञासा देखने मिल रही है। मेरा प्रयास है कि मैं पूरी आत्मकथा को नियमित रूप से आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत करता रहूँ, लेकिन कभी-२ संभव नहीं हो पाता।       वर्णीजी की आत्मकथा के प्रति आप लोगों की जिज्ञासा को जानकर मुझे प्रस्तुती के लिए उत्साह वर्धन होता रहता है।

Abhishek Jain

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विद्याध्ययन का सुयोग - ५६


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
        बम्बई में गणेश प्रसाद का अध्ययन प्रारम्भ हो गया लेकिन जलवायु उनके स्वास्थ्य के अनुकूल न थी अस्वस्थ्य हो गये। यहाँ से पूना गए।          स्वास्थ्य ठीक होने पर बम्बई आए, वहाँ कुछ दिन बार पुनः ज्वर आने लगा। वहाँ से अजमेर का पास केकड़ी गया। कुछ दिन ठहरा वहाँ से गणेशप्रसाद चिरकाल से प्रतीक्षित स्थान जयपुर गए। कल से उसका वर्णन रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
            *"विद्याध्ययन का सुयोग"*                      *क्रमांक - ५६*
    मेरा परीक्षाफल देखकर देहली के एक जवेरी लक्ष्मीचंद्रजी ने कहा कि 'दस रुपया मासिक हम बराबर देंगे, तुम सानंद अध्ययन करो।'         मैं अध्ययन करने लगा किन्तु दुर्भाग्य का उदय इतना प्रबल था कि बम्बई का पानी मुझे अनुकूल न पड़ा। शरीर रोगी हो गया। गुरुजी और स्वर्गीय पं. गोपालदासजी ने बहुत ही समवेदना प्रगट की। तथा यह आदेश दिया कि तुम पूना जाओ, तुम्हारा सब प्रबंध हो जायेगा। एक पत्र भी लिख दिया।        मैं उनका पत्र लेकर  पूना चला गया। धर्मशाला में ठहरा। एक जैनी के यहाँ भोजन करने लगा। वहाँ की जलवायु सेवन करने से मुझे आराम हो गया। पश्चात एक मास बाद मैं बम्बई आ गया। वहाँ कुछ दिन ठहरा फिर ज्वर आने लगा।      श्री गुरुजी ने मुझे अजमेर के पास केकड़ी है, वहाँ भेज दिया। केकड़ी में पं. धन्नालालजी, साहब रहते थे। योग्य पुरुष थे। आप बहुत ही दयालु और सदाचारी थे। आपके सहवास से मुझे बहुत लाभ हुआ। आपका कहना था कि 'जिसे आत्म-कल्याण करना हो वह जगत के प्रपंचों से दूर रहे।' आपके द्वारा यहाँ एक पाठशाला चलती थी।       मैं श्रीमान रानीवालों की दुकान पर ठहर गया। उनके मुनीम बहुत योग्य थे। उन्होंने मेरा सब प्रबंध कर दिया। यहाँ औषधालय में जो वैद्यराज दौलतराम जी थे, वह बहुत ही सुयोग्य थे। मैंने कहा- महराज मैं तिजारी से बहुत दुखी हूँ। कोई ऐसी औषधि दीजिए जिससे मेरी बीमारी चली जावे।        वैद्यराज ने मूँग के बराबर गोली दी और कहा- 'आज इसे खा लो तथा S४ दूध की S चावल डालकर खीर बनाओ तथा जितनी खाई जाए उतनी खाओ। कोई विकल्प न करना।'        मैंने दिनभर खीर खाई। पेट खूब भर गया। पन्द्रह दिन केकड़ी में रहकर जयपुर चला गया।
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १०?

Abhishek Jain

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विद्याध्ययन का सुयोग - ५५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
         ज्ञानप्राप्ति की प्रबल भावना रखने वाले गणेश प्रसाद का बम्बई से अध्ययन प्रारम्भ हो पाया। यही पर उनका परिचय जैनधर्म के मूर्धन्य विद्वान पंडित गोपालदासजी वरैया । जैन सिद्धांत प्रवेशिका इन्ही के द्वारा लिखी गई है।          बम्बई से अध्ययन प्रारम्भ होने तथा अवरोध प्रस्तुत होने का उल्लेख प्रस्तुत प्रसंग में है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
            *"विद्याध्ययन का सुयोग"*                      *क्रमांक - ५५*
      मैं आनंद से अध्ययन करने लगा और भाद्रमास में रत्नकरण्डश्रावकाचार तथा कातन्त्र व्याकरण की पञ्चसंधि में परीक्षा दी। उसी समय बम्बई परीक्षालय खुला था। रिजल्ट निकला। मैं दोनों विषय में उत्तीर्ण हुआ। साथ में पच्चीस रुपये इनाम भी मिला। समाज प्रसन्न हुई।      श्रीमान पंडित गोपालदास वरैया उस समय वहीं पर रहते थे। आप बहुत ही सरल तथा जैनधर्म के मार्मिक पंडित थे, साथ में अत्यंत दयालु भी थे।        वह मुझसे बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि- 'तुम आनंद से विद्याध्ययन करो, कोई चिंता मत करो।' वह एक साहब के यहाँ काम करते थे। साहब इनसे  अत्यंत प्रसन्न था।        पंडितजी ने मुझसे कहा- 'तुम शाम को मुझे विद्यालय आफिस से ले आया करो, तुम्हारा जो मासिक खर्च होगा, मैं दूँगा। यह न समझना कि मैं तुम्हे नौकर समझूँगा। मैं उनके समक्ष कुछ नहीं कह सका।'     मेरा परीक्षाफल देखकर देहली के एक जवेरी लक्ष्मीचंद्रजी ने कहा कि 'दस रुपया मासिक हम बराबर देंगे, तुम सानंद अध्ययन करो।'         मैं अध्ययन करने लगा किन्तु दुर्भाग्य का उदय इतना प्रबल था कि बम्बई का पानी मुझे अनुकूल न पड़ा। शरीर रोगी हो गया। गुरुजी और स्वर्गीय पं. गोपालदासजी ने बहुत ही समवेदना प्रगट की। तथा यह आदेश दिया कि तुम पूना जाओ, तुम्हारा सब प्रबंध हो जायेगा। एक पत्र भी लिख दिया। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल ७?

Abhishek Jain

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विद्याध्ययन का सुयोग - ५४


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
      गणेशप्रसाद के अंदर ज्ञानार्जन के प्रति तीव्र लालसा का पता इसी बात से लगता है कि वह अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी अपने अध्ययन के लिए प्रयासरत थे। कुछ राशी जमा कर अध्ययन का ही प्रयास किया।     संस्कृत अध्ययन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के कारण उन्हें पच्चीस रुपये का पुरुस्कार मिला। समाज के लोगों को प्रसन्नता हुई। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
            *"विद्याध्ययन का सुयोग"*                      *क्रमांक - ५४"*
      यहाँ पर मंदिर में एक जैन पाठशाला थी। जिसमें श्री जीवाराम शास्त्री गुजराती अध्यापक थे (वे संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान थे)। ३०) मासिक पर दो घंटा पढ़ाने आते थे। साथ में श्री गुरुजी पन्नालालजी बकलीवाल सुजानगढ़ वाले ऑनरेरी धर्मशिक्षा देते थे।        मैंने उनसे कहा- 'गुरुजी ! मुझे भी ज्ञानदान दीजिए।' गुरुजी ने मेरा परिचय पूंछा, मैंने आनुपूर्वी अपना परिचय उनको सुना दिया। वह बहुत प्रसन्न हुए और बोले तुम संस्कृत पढ़ो।     उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर कातन्त्र व्याकरण श्रीयुत शास्त्री जीवारामजी से पढ़ना प्रारम्भ कर दिया। और रत्नकरण्ड श्रावकाचार जी पंडित पन्नालालजी से पढ़ने लगा। मैं पण्डितजी को गुरुजी कहता था। 
      
       बाबा गुरुदयालजी से मैंने कहा- 'बाबाजी ! मेरे पास ३१।=) कापियों के आ गए। १०) आप दे गए थे। अब मैं भाद्र तक के लिए निश्चिंत हो गया। आपकी आज्ञा हो तो संस्कृत अध्यनन करने लगूँ।'        उन्होंने हर्षपूर्वक कहा- 'बहुत अच्छा विचार है, कोई चिंता मत करो, सब प्रबंध कर दूँगा, जिस किसी पुस्तक की आवश्यकता हो, हमसे कहना।'       मैं आनंद से अध्ययन करने लगा और भाद्रमास में रत्नकरण्डश्रावकाचार तथा कातन्त्र व्याकरण की पञ्चसंधि में परीक्षा दी। उसी समय बम्बई परीक्षालय खुला था। रिजल्ट निकला। मैं दोनों विषय में उत्तीर्ण हुआ। साथ में पच्चीस रुपये इनाम भी मिला। समाज प्रसन्न हुई। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल ४?

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विद्याध्ययन का सुयोग - ५३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
       आज की प्रस्तुती से हम जानेंगे कि गणेशप्रसाद ने बम्बई में ज्ञानार्जन हेतु कापियों को बेचकर धनार्जन किया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
            *"विद्याध्ययन का सुयोग"*                      *क्रमांक - ५३"*
        बाबा गुरुदयालसिंह ने कहा आप न तो हमारे संबंधी हैं। और न हम तुमको जानते ही हैं तुम्हारे आचारादि से अभिज्ञ नहीं हैं फिर भी हमारे परिणामों में तुम्हारे रक्षा के भाव हो गए।         इससे अब तुम्हे सब प्रकार की चिंता छोड़ देना चाहिए तथा ऊपर भी जिनेन्द्रदेव के प्रतिदिन दर्शननादि कर स्वाध्याय में उपयोग लगाना चाहिए। तुम्हारी जो आवश्यकता होगी हम उसकी पूर्ति करेंगे।' इत्यादि वाक्यों द्वारा मुझे संतोष कराके चले गए।        मैंने आनंद से भोजन किया। कई दिन से चिंता के कारण निंद्रा नहीं आई थी, अतः भोजन करने के अनंतर सो गया। तीन घंटे बाद निंद्रा भंग हुई, मुख मार्जन कर बैठा ही था कि इतने में बाबा गुरुदयालजी आ गए और १०० कापियाँ देकर यह कहने लगे कि इन्हें बाजार में जाकर फेरी में बेज आना।       छह आने से कम में न देना। यह पूर्ण हो जाने पर मैं और ला दूँगा। उन कापियों में रेशम आदि कपड़ो के नमूने विलायत से आते हैं।       मैं शाम को बाजार में गया और एक ही दिन में बीस कापी बेच आया। कहने का तात्पर्य यह है कि  छह दिन में वे सब कापियाँ बिक गई और उनकी बिक्री के मेरे पास ३१।=) हो गए। अब मैं एकदम निश्चिंत हो गया।       यहाँ पर मंदिर में एक जैन पाठशाला थी। जिसमें श्री जीवाराम शास्त्री गुजराती अध्यापक थे (वे संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान थे)। ३०) मासिक पर दो घंटा पढ़ाने आते थे। साथ में श्री गुरुजी पन्नालालजी बकलीवाल सुजानगढ़ वाले ऑनरेरी धर्मशिक्षा देते थे।        मैंने उनसे कहा- 'गुरुजी ! मुझे भी ज्ञानदान दीजिए।' गुरुजी ने मेरा परिचय पूंछा, मैंने आनुपूर्वी अपना परिचय उनको सुना दिया। वह बहुत प्रसन्न हुए और बोले तुम संस्कृत पढ़ो।
      
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल २?

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गजपंथा से बम्बई - ५२


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
       हम देख रहे हैं, जिनधर्म के मर्म को जानने की प्यास लिए गणेश प्रसाद कैसे अपने लक्ष्य प्राप्ति की और आगे बड़ रहे हैं। उनके पास तात्कालिक साधनों का तो अभाव था लेकिन धर्म के प्रति नैसर्गिक श्रद्धान व पुण्य का उदय जो अभावपूर्ण स्थिति में भी उनकी व्यवस्था बनती जा रही थी।       अगली प्रस्तुती में आप देखेंगे कि धर्म की इतनी प्रभावना करने वाले महापुरुष पूज्य वर्णीजी ने कभी बम्बई में कापियाँ बेचकर अपने आगे के अध्यन हेतु धनार्जन किया था।       बहुत ही रोचक है वर्णीजी का जीवन चरित्र। आप अवश्य ही पढ़ें पूज्य वर्णीजी की आत्मकथा "मेरी जीवन गाथा।" ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                *"गजपंथा से बम्बई"*                      *क्रमांक - ५३*
       समान लेकर मंदिर गया, नीचे धर्मशाला में समान रखकर ऊपर दर्शन करने गया। लज्जा के साथ दर्शन किये, क्योंकि शरीर क्षीण था। वस्त्र मलिन थे। चेहरा बीमारी के कारण विकृत था। शीघ्र दर्शनकर एक पुस्तक उठा ली और धर्मशाला में स्वाध्याय करने लगा। सेठजी आठ आने देकर चले गए।          मैं किंकर्तव्यविमूढ़की तरह स्वाध्याय करने लगा। इतने में ही एक बाबा गुरुदयालसिंह, जो खुरजा के रहने वाले थे, मेरे पास आये और पूछने लगे- 'कहाँ से आये हो और बम्बई आकर क्या करोगे?' मुझसे कुछ नहीं कहा गया, प्रत्युत गदगद हो गया।
       
         श्रीयुत बाबा गुरुदयालसिंहजी ने कहा- 'हम आध घंटा बाद आवेंगे तुम यहीं मिलना।' मैं शांतिपूर्वक स्वाध्याय करने लगा।        उनकी अमृतमयी वाणी से इतनी तृप्ति हुई कि सब दुख भूल गया। आध घंटे के बाद बाबाजी आ गए और दो धोती, दो जोड़े दुपट्टे, रसोई के सब बर्तन, आठ दिन का भोजन का सामान, सिगड़ी, कोयला तथा दस रुपया नगद देकर बोले- 'आनंद से भोजन बनाओ, कोई चिंता न करना, हम तुम्हारी सब तरह रक्षा करेंगे।'        अशुभकर्मं के विपाक में मनुष्यों को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है और जब शुभ कर्म का विपाक आता है तब अनायास जीवों को सुख सामग्री का लाभ हो जाता है। कोई न कर्ता है हर्ता है, देखो, हम खुरजा के निवासी हैं। आजीविका के निमित्त बम्बई में रहते हैं। दलाली करते हैं, तम्हे मंदिर में देख स्वयमेव हमारे परिणाम हो गए कि इस जीवकी रक्षा करनी चाहिए।       आप न तो हमारे संबंधी हैं। और न हम तुमको जानते ही हैं तुम्हारे आचारादि से अभिज्ञ नहीं हैं फिर भी हमारे परिणामों में तुम्हारे रक्षा के भाव हो गए।         इससे अब तुम्हे सब प्रकार की चिंता छोड़ देना चाहिए तथा ऊपर भी जिनेन्द्रदेव के प्रतिदिन दर्शननादि कर स्वाध्याय में उपयोग लगाना चाहिए। तुम्हारी जो आवश्यकता होगी हम उसकी पूर्ति करेंगे।' इत्यादि वाक्यों द्वारा मुझे संतोष कराके चले गए। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल १?

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गजपंथा से बम्बई - ५१


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          शायद आपने सोचा भी नहीं होगा कि जैनधर्म इतना बड़ा मर्मज्ञ इतनी विषम परिस्थितियों से गुजरा होगा। बड़ा ही रोचक है पूर्ण वर्णीजी का जीवन। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                *"गजपंथा से बम्बई"*                      *क्रमांक - ५१*
       मैंने वह एक आना मुनीम को दे दिया। मुनीम ने लेने में संकोच किया। सेठजी भी हँस पड़े और मैं भी संकोचवश लज्जित हो गया, परंतु मैंने अंतरंग से दिया था, अतः उस एक आना के दान ने मेरा जीवन पलट दिया।        सेठजी कपढ़ा खरीदने बम्बई जा रहे थे। आरवी में उनकी दुकान थी। उन्होंने मुझसे कहा- 'बम्बई चलो, वहाँ से गिरिनारजी चले जाना।' मैंने कहा- 'मैं पैदल यात्रा करूँगा।'        यद्यपि साधन कुछ भी न था- साधन के नाम पर एक पैसा साथ न था, फिर भी अपनी दरिद्र अवस्था वचनों द्वारा सेठ के सामने व्यक्त न होने दी- मन में याचना का भाव नहीं आया।       सेठजी को मेरे ऊपर अन्तरंग से प्रेम हो गया। प्रेम के साथ मेरे प्रति दया की भावना भी हो गई। बोले 'तुम आग्रह मत करो, हमारे साथ बम्बई चलो, हम तुम्हारे हितैषी हैं।'       उनके आग्रह करने पर मैंने भी उन्हीं के साथ बम्बई प्रस्थान कर दिया। नाशिक होता हुआ रात्रि के नौ बजे बम्बई के स्टेशन पर पहुँचा। रौशनी आदि की प्रचुरता देखकर आश्चर्य में पड़ गया।         यह चिंता हुई कि पास में तो पैसा नहीं, क्या करूँगा? नाना विकल्पों के जाल में पड़ गया, कुछ भी निश्चित न कर सका। सेठजी के साथ घोड़ा-गाड़ी  में बैठकर जहाँ सेठ साहब ठहरे उसी मकान में ठहर गया।       मकान क्या था स्वर्ग का एक खंड था। देखकर आनंद के बदले खेद-सागर में डूब गया। क्या करूँ? कुछ भी निश्चित न कर सका। रात्रि भर नींद नहीं आई। प्रातः शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर बैठा था कि सेठजी ने कहा- 'चलो मंदिर चलें और आपका जो भी समान हो वह भी लेते चलें। वहीं मंदिर के नीचे धर्मशाला में ठहर जाना।' मैंने कहा- 'अच्छा।'        समान लेकर मंदिर गया, नीचे धर्मशाला में समान रखकर ऊपर दर्शन करने गया। लज्जा के साथ दर्शन किये, क्योंकि शरीर क्षीण था। वस्त्र मलिन थे। चेहरा बीमारी के कारण विकृत था। शीघ्र दर्शनकर एक पुस्तक उठा ली और धर्मशाला में स्वाध्याय करने लगा। सेठजी आठ आने देकर चले गए। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृ. अमा.?

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गजपंथा से बम्बई - ५०


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          पूज्य वर्णीजी का जीवन पलट देने वाली बात क्या थी? आज की प्रस्तुती में यह है। अवश्य पढ़े यह अंश।      एक आना बचा था वर्णीजी के पास भोजन के लिए, यदि सेठजी के यहाँ भोजन न किया होता तो वह भी खत्म हो जाता। इसलिए पवित्र मना वर्णीजी ने वह भाव सहित दान दे दिया। वर्णीजी ने स्वयं लिखा है कि भाव सहित मेरे द्वारा बचे एक आना के दान ने मेरा जीवन बदल दिया।        ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                *"गजपंथा से बम्बई"*                      *क्रमांक - ५०*
       तीन मास से मार्ग के खेद से खिन्न था तथा जबसे माँ और स्त्री को छोड़ा, मड़ावरा से लेकर मार्ग में आज वैसा भोजन किया। दरिद्र को निधि मिलने में जितना हर्ष होता है उससे भी अधिक मुझे भोजन करने में हुआ।        भोजन के अनंतर वह सेठ मंदिर के भण्डार में द्रव्य देने के लिए गए। पाँच रुपये मुनीम को देकर उन्होंने जब रसीद ली तब मैं भी वहीं बैठा था।        मेरे पास केवल एक आना था और वह इसलिए बच गया था कि आज के दिन आरवी के सेठ के यहाँ भोजन किया था।        मैंने विचार किया था कि यदि आज अपना निजका भोजन करता तो वह एक आना खर्च हो जाता और ऐसा मधुर भोजन भी नहीं मिलता, अतः इसे भाण्डार में दे देना अच्छा है।        निदान, मैंने वह एक आना मुनीम को दे दिया। मुनीम ने लेने में संकोच किया। सेठजी भी हँस पड़े और मैं भी संकोचवश लज्जित हो गया, परंतु मैंने अंतरंग से दिया था, अतः उस एक आना के दान ने मेरा जीवन पलट दिया।
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १४?

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गजपंथा से बम्बई - ४९


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          बड़ा ही मार्मिक वृत्तांत है पूज्य वर्णीजी के जीवन का। ह्रदय को छू जाने वाला है।       अद्भुत तीर्थवंदना की भावना उस पावन आत्मा के अंदर। शरीर कृश होने के बाद भी पैदल गजपंथाजी से श्री गिरिनारजी जाने की भावना रख रहे हैं। जिनेन्द्र भक्ति हेतु आत्मबल के आगे जर्जर शरीर का कोई ख्याल ही नहीं था। तीन माह से अच्छी तरह भोजन नहीं हुआ था।       हम सभी पाठकों की पूज्य वर्णीजी का जीवन वृत्तांत पढ़कर आँखे भर आना एक सहज सी बात है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                *"गजपंथा से बम्बई"*                      *क्रमांक - ४९*        पाप के उदय की पराकाष्ठा का उदय यदि देखा तो मैंने देखा। एक दिन की बात है- सधन जंगल में, जहाँ पर मनुष्यों का संचार न था, एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया। वहीं बाजरे के चूनकी लिट्टी लगाई, खाकर सो गया। निद्रा भंग हुई, चलने को उद्यमी हुआ, इतने मे भयंकर ज्वर आ गया।           बेहोश पड़ गया। रात्रि के नौ बजे होश आया। भयानक वन में था। सुध-बुध भूल गया। रात्रि भर भयभीत अवस्था में रहा। किसी तरह प्रातःकाल हुआ। श्री भगवान का स्मरण कर मार्ग में अनेक कष्टों की अनुभूति करता हुआ, श्री गजपंथाजी में पहुँच गया और आनंद से धर्मशाला में ठहरा।        वहीं पर एक आरवी के सेठ ठहरे थे। प्रातःकाल उनके साथ पर्वत की वंदना को चला। आनंद से यात्रा समाप्त हुई। धर्म की चर्चा भी अच्छी तरह हुई।          आपने कहा- 'कहाँ जाओगे?' मैंने कहा- 'श्री गिरिनारजी की यात्रा को जाऊँगा।'  कैसे जाओगे?' पैदल जाऊँगा।'      उन्होंने मेरे शरीर की अवस्था देखकर बहुत ही दयाभाव से कहा- 'तुम्हारा शरीर इस योग्य नहीं'      मैंने कहा- 'शरीर तो नश्वर है एक दिन जावेगा ही कुछ धर्म का कार्य इससे लिया जावे।'       वह हँस पड़े और बोले- 'अभी बालक हो, 'शरीर माध्यम खलु धर्मसाधनम्' शरीर धर्म साधन का आद्य कारण है, अतः इसको धर्मसाधन के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।'       मैंने कहा- 'रखने से क्या होता है? भावना हो तब तो यह बाह्य कारण हो सकता है। इसके बिना यह किस काम का?'       परंतु वह तो अनुभवी थे, हँस गये, बोले- 'अच्छा इस विषय में फिर बातचीत होगी, अब तो चलें, भोजन करें, आज आपको मेरे ही डेरे में भोजन करना होगा।'         मैंने बाह्य से तो जैसे लोगों का व्यवहार होता है वैसा ही उनके साथ किया, पर अंतरंग से भोजन करना इष्ट था। स्थान पर आकर उनके यहाँ आनंद से भोजन किया।         तीन मास से मार्ग के खेद से खिन्न था तथा जबसे माँ और स्त्री को छोड़ा, मड़ावरा से लेकर मार्ग में आज वैसा भोजन किया। दरिद्र को निधि मिलने में जितना हर्ष होता है उससे भी अधिक मुझे भोजन करने में हुआ।
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १३?

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कर्मचक्र - ४८


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          पूज्य वर्णीजी के जीवन में कितनी विषय परिस्थियाँ थी यह आज की प्रस्तुती ज्ञात होगा।        ज्वर जो एक दिन छोड़कर आता था वह दो दिन छोड़कर आने लगा। चार कम्बल ओढ़ने से भी ज्वर में ठंड शांत न होती जबकि एक कम्बल भी नहीं। शरीर में पकनू खाज हो गई। प्रतिदिन २० मील चलते थे और भोजन था ज्वार के आटे की रोटी नमक के साथ।     मार्ग में घोर जंगल में भोजन को रुके, बुखार आने से बेहोश हो गए। ऐसी-२ कठिन परिस्थितियों में भी पूज्य वर्णीजी वंदना के मार्ग में आगे बढ़ते रहे।        ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४८*                   उस समय अपने भाग्य का गुणगान करते हुआ आगे बढ़ा। कुछ दिन बाद ऐसे स्थान पर पहुँचा, जहाँ पर जिनालय था। जिनालय में श्री जिनेन्द्र देव के दर्शन किये। तत्पश्चात यहाँ से गजपन्था के लिए प्रस्थान कर दिया और गजपंथा पहुँच भी गया।         मार्ग में कैसे कैसे कष्ट उठाये उनका इसी से अनुमान कर लो कि जो ज्वर एक दिन बाद आता था वह अब दो दिन बाद आने लगा। इसको हमारे देश में तिजारी कहते हैं। इसमें इतनी ठंड लगती है कि चार सोड़रों से भी नहीं जाती। पर पास में एक भी नहीं थी।        साथ में पकनूँ खाज हो गई, शरीर कृश हो गया। इतना होने पर भी प्रतिदिन २० मील चलना और खाने को दो पैसे का आटा। वह भी जवारी का और कभी बाजरे का और वह भी बिना दाल शाक का। केवल नमक की कंकरी शाक थी।        घी क्या कहलाता है? कौन जाने, उसके दो मास से दर्शन भी न हुए थे। दो मास से दाल का भी दर्शन न हुआ था। किसी दिन रूखी रोटी बनाकर रक्खी और खाने की चेष्टा की कि तिजारी महरानी ने दर्शन देकर कहा- 'सो जाओ, अनधिकार चेष्टा न करो, अभी तुम्हारे पाप कर्म का उदय है, समता से सहन करो।'        पाप के उदय की पराकाष्ठा का उदय यदि देखा तो मैंने देखा। एक दिन की बात है- सधन जंगल में, जहाँ पर मनुष्यों का संचार न था, एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया। वहीं बाजरे के चूनकी लिट्टी लगाई, खाकर सो गया। निद्रा भंग हुई, चलने को उद्यमी हुआ, इतने मे भयंकर ज्वर आ गया।           बेहोश पड़ गया। रात्रि के नौ बजे होश आया। भयानक वन में था। सुध-बुध भूल गया। रात्रि भर भयभीत अवस्था में रहा। किसी तरह प्रातःकाल हुआ। श्री भगवान का स्मरण कर मार्ग में अनेक कष्टों की अनुभूति करता हुआ, श्री गजपंथाजी में पहुँच गया और आनंद से धर्मशाला में ठहरा। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १२?

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कर्मचक्र - ४७


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          अजैन कुल से आकर जैनधर्म के सिद्धांतों का प्रचारित करने का श्रेय रखने वाले पूज्य वर्णीजी के प्रारंभिक जीवन में बहुत ही विषम परिस्थितियाँ थी।        आजकी प्रस्तुती को पढ़कर, पूज्य वर्णीजी के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर एक पाठक की आँख भीगे बिना नहीं रहेगी।         कितनी दयनीय स्थिति थी उस समय उनकी, पैसे के लिए मजदूरी करने का प्रयास किया, अशक्य होने से अपनी परिस्थिति में रोते रहे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४७*       अब बचे दो रुपया सो विचार किया कि अब गलती न करो, अन्यथा आपत्ति में फस जाओगे। मन संतोष कर वहाँ से चल दिए। किसी तरह कष्टों को सहते हुए बैतूल पहुँचे।        उन दिनों अन्न सस्ता था। दो पैसे में S।। जवारी का आटा मिल जाता था। उसकी रोटी खाते हुए मार्ग तय करते थे। जब बैतूल पहुँचे, तब ग्राम के बाहर सड़क पर कुली लोग काम कर रहे थे।        हमने विचार किया कि यदि हम भी इस तरह काम करें तो हमें भी कुछ मिल जाया करेगा। मेट से कहा- 'भाई ! हमको भी लगा लो।' दयालु था, उसने हमको एक गैती दे दी और कहा कि 'मिट्टी खोदकर इन औरतों की टोकनी में भरते जाओ। तीन आने शाम को मिल जावेंगे।'        मैंने मिट्टी खोदना आरम्भ किया और एक टोकनी किसी तरह से भर कर उठा दी, दूसरी टोकनी नहीं भर सका। अंत में गेंती को वही पटक कर रोता हुआ आगे चल दिया।          मेंट ने दया कर बुलाया- 'रोते क्यों हो? मिट्टी को ढोओ, दो आना मिल जावेंगे।' गरज वह भी न बन पड़ा, तब मेट ने कहा- 'आपकी इच्छा सो करो।'         मैंने कहा- 'जनाब, बन्दगी, जाता हूँ।' उसने कहा- 'जाइये, यहाँ तो हट्टे-कट्टे पुरुषों का काम है।'
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १०?

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कर्मचक्र - ४६


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          इस अंश का शीर्षक है कर्मचक्र। बिल्कुल सही शीर्षक है। जैनधर्म की महती प्रभावना करने वाले महापुरुष के जीवन में प्रारंभिक समय में कर्मों की स्थिति देखिए। कितनी दयनीय स्थिति।       कपढ़े विवर्ण हो गए, शरीर में खाज हो गया, एक दिन छोड़कर ज्वर आने लगा। कोई सहायता को नहीं, कोई पूंछने वाला नहीं। कोई सुनने वाला नहीं।       जिनधर्म में विशेष श्रद्धावान गणेश प्रसाद का वह प्रारंभिक समय बड़ा ही विषम था। वह गिरिनार जी की वंदना के लोभ स्वरूप जुएँ में पैसे भी लगा कर हार गए।        बड़ा ही रोचक है वर्णीजी की गणेशप्रसाद से वर्णी बनने तक की यात्रा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४८*
                पास में पचास रुपये मात्र रह गये। कपड़े विवर्ण हो गये। शरीर में खाज हो गई। एक दिन बाद ज्वर आने लगा। सहायी कोई नहीं। केवल दैव ही सहायी था। क्या करूँ?       कुछ समझ नहीं आता था - कर्तव्य विमूढ़ हो गया। कहाँ जाऊँ? यह भी निश्चय नहीं कर सका। किससे अपनी व्यथा कहूँ? यह भी समझ नहीं आया। कहता भी तो सुनने वाला कौन था? खिन्न होकर पड़ गया।        रात्रि को स्वप्न आया- 'दुख करने से क्या लाभ?' कोई कहता है- 'गिरिनार को चले जाओ।' 'कैसे जावें?' साधन तो कुछ है नहीं' मैंने कहा। वही उत्तर मिला- 'नरकी जीवों की अपेक्षा अच्छे हो।'         प्रातःकाल हुआ। श्री सिद्धक्षेत्र वंदना कर बैतूल नगर के लिए चल दिया। तीन कोश चलकर एक हाट मिली। वहाँ एक स्थान पर पत्ते का जुआ ही रहा था। १) के ५) मिलते थे।         हमने विचार किया- 'चलो ५) लगा दो २५) मिल जावेंगे, फिर आनंद से रेल में बैठकर श्री गिरिनार की यात्रा सहज में हो जावेगी। इत्यादि।' १) में ५) मिलेगा इस लोभ से ३) लगा दिए। पत्ता हमारा नहीं आया। ३) चले गए।        अब बचे दो रुपया सो विचार किया कि अब गलती न करो, अन्यथा आपत्ति में फस जाओगे। मन संतोष कर वहाँ से चल दिए। किसी तरह कष्टों को सहते हुए बैतूल पहुँचे। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण ८?

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मुक्तागिरी - ४५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          आज के प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी की मुक्तागिरि वंदना का वृत्तांत है।       अगली प्रस्तुती का शीर्षक है "कर्म चक्र"। जिनमार्ग में विशेष प्रीति रखने वाले पूज्य वर्णीजी की हालत उस समय अत्यंत ही दयनीय हो गई थी। आत्मकथा के उन प्रसंगों को जानकर हम पुण्य पुरुष पूज्य वर्णीजी के असाधारण व्यक्तित्व से परिचत होंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"मुक्तागिरि"*                      *क्रमांक - ४५*
                चार दिन बाद रामटेक से चल दिया, बाद में कामठी के जैन मंदिरों के दर्शन करता हुआ नागपुर पहुँचा। यहाँ पर अनेक मंदिर हैं। उनमें कितने ही बुंदेलखंड से आए हुए परवारों के हैं।         ये सब तेरहपंथी आम्नाय वाले हैं। मंदिरों के पास एक धर्मशाला है। अनेक जिनालय दक्षिण वालों के भी हैं जो बीस पंथी आम्नाय वाले हैं।        वहाँ पर रामभाउ पांडे एक योग्य पुरुष थे। आप बीस पंथी आम्नाय के भट्टारक के चेले थे। परंतु आपका प्रेम तत्व चर्चा में था, अतः चाहे तेरहपंथी आम्नाय का विद्वान हो, चाहे बीसपंथी आम्नाय का समान भाव से आप उन विद्वानों का आदर करते हैं।         वहाँ दो या तीन दिन रहकर मैंने अमरावती को प्रस्थान किया। बीच में बर्धा मिला। यहाँ भी जिनमंदिरों के समुदाय हैं, उनके दर्शन किए।        कई दिवसों के बाद अमरावती पहुँचा। वहाँ पर भी बुंदेलखंड से आये हुए परवारों के अनेक घर हैं जोकि तेरहपंथ आम्नाय को मानने वाले हैं। मंदिरों के पास एक धर्मशाला है। यहाँ पर श्री सिंघई पन्नालाल जी रहते थे। उनके यहाँ नियम था कि जो यात्री बाहर से आते थे उन सबको भोजन कराए बिना नहीं जाने देते थे।        यहाँ से श्री सिद्ध क्षेत्र मुक्तागिरि उत्सुकतापूर्वक चल पड़ा। बीच में एलचपुर मिला। यहाँ जिनमंदिरों के दर्शन कर दूसरे दिन मुक्तागिरि पहुँच गया।            मुक्तागिरि क्षेत्र की शोभा अवर्णनीय है। सर्वतः वनों से वेष्टित पर्वत है। पर्वत के ऊपर अनेक जिनालय हैं। नीचे कई मंदिर और धर्मशालाएँ हैं।              यह तपोभूमि है परंतु अब तो वहाँ न कोई त्यागी है न साधु। जो अन्य क्षेत्रों की व्यवस्था है वही अवस्था यहाँ की है। सानंद वंदना की। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ६?

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रामटेक - ४४


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          यहाँ पूज्य वर्णीजी ने मिथ्याप्रचार के कारण को स्पष्ट किया है साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जीव को कल्याणकारी आगमा का अभ्यास करना बहुत आवश्यक है।      कल से वर्णीजी की मुक्तागिरी वंदना हेतु यात्रा का उल्लेख होगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४४*                 संसार में जो मिथ्या प्रचार फैल रहा है उसमें मूल कारण रागद्वेष की मलिनता से जो कुछ लिखा गया वह साहित्य है। वही पुस्तकें कालान्तर में धर्मशास्त्र के रूप में मानी जाने लगीं।       लोग तो अनादिकाल से मिथ्यात्व के उदय में शरीर को आत्मा मानते हैं। जिनको अपना ही बोध नहीं वे पर को क्या जानें? जब अपना पराया ज्ञान नहीं तो कैसे सम्यकदृष्टि? यही श्री समयसार में लिखा है- 'परमाणुमित्तयं पि हु रागादीणं दु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणयं दु सव्वागमधरो वि।।'       जो सर्वांग को जानने वाला हैं तो वह आत्मा को नहीं जानता है, जो आत्मा को नहीं जानता है वह जीव और अजीव को नहीं जानता वह सम्यकदृष्टि कैसे हो सकता है?        कहने का तात्पर्य यह कि आगमाभासका अभ्यास जीवादि को जानने में मुख्य कारण है और आगमाभास का अभ्यास जीवादिको अन्यथा जानने में कारण है। जिनको आत्मकल्याण कि लालसा है वे आप्तकथित आगम का अभ्यास करें। विशेष कहाँ तक लिखें?        क्षेत्रों पर ज्ञान के साधन कुछ नहीं, केवल रुपये इकठ्ठे करने के साधन हैं। कल्पना करो, यह धन यदि एकत्रित होता रहे और व्यय न हो तो अंत में नहीं के तुल्य हुआ। अस्तु, इस कथा से क्या लाभ? यहाँ चार दिन रहा। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ५?

Abhishek Jain

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रामटेक - ४३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
            कल की प्रस्तुती के अंश में वर्णीजी द्वारा वर्णित निश्चय की दृष्टि से प्रभावना को देखा। उन्होंने वर्णन किया कि आत्मीय श्रद्धान, ज्ञान- चारित्र द्वारा निर्मल बनाने का प्रयत्न जिससे अन्य धर्माबलंबियों के ह्रदय में स्वयं समा जाये कि धर्म यह वस्तु है। निश्चय प्रभावना है।      आज के अंशों में व्यवहार में प्रभावना को वर्णीजी ने स्पष्ट किया है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४३*              ऐसा दान करो, जिससे साधारण लोगों का भी उपकार हो। ऐसा विद्यालय खोलो, जिनसे यथाशक्ति सबको लाभ हो। ऐसे औषधालय खोलो, जिसमें शुद्ध औषधों का भंडार हो। ऐसे भोजनालय खोलो, जिनसे शुद्ध भोजन का प्रबंध हो।         अनाथों को भोजन दो। अनुकम्पा से प्राणीमात्र को दान का निषेध नहीं। अभयदानादि देकर प्राणियों को निर्भय बना दो। ऐसा तप करो, जिसे देखकर कट्टर से कट्टर विरोधियों की श्रद्धा हो जावे।        श्री जिनेन्द्रदेव की ऐसी ठाठबाट से पूजा करो, जो नास्तिकों के चित्त में भी आस्तिक्य भावों का संचार करें। इसका नाम व्यवहार में प्रभावना है। श्री समंतभद्रस्वामी ने भी कहा है कि- 'अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम्।
जिनशासन महात्म्यप्रकाशः स्यत्प्रभावना।।'       अज्ञानरूपी अंधकार की व्याप्ति से जगत आच्छन्न है, उसे यथाशक्ति दूरकर जिनशासन के माहात्म्य का प्रकाश करना, इसी का नाम सच्ची प्रभावना है।           संसार में अनादिकाल से मोह के वशीभूत होकर प्राणियों ने नाना प्रकार के धर्मों का प्रचार कर रखा है। कहाँ तक इसका वर्णन किया जाए? जीववध करके भी लोग उसे धर्म मानने लगे। जिसे अच्छे लोग पुष्ट करते हैं प्रमाण देते हैं कि शास्त्रों में लिखा है। उसे यहाँ लिखकर मैं आप लोगों का समय नहीं लेना चाहता। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ४?

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रामटेक - ४२


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
     पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४२*              हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की बलवत्ता है जो हम लोग बाह्य कार्यों में द्रव्य का व्ययकर ही करने को कृतार्थ मान  लेते हैं।               मंदिरों में चाँदी के किवाड़ों की जोड़ी, चाँदी की चौकी, चाँदी का रथ, सुवर्ण के चमर, चाँदी की पालकी आदि बनवाने में ही व्यय करना पुण्य समझते हैं।        जब इन चाँदी के सामान को अन्य लोग देखते हैं तब यही अनुमान करते हैं कि जैनी लोग बड़े धनाढ्य हैं, किन्तु यह नहीं समझते कि जिस धर्म का यह पालन करने वाले हैं उस धर्म का मर्म क्या है?          यदि उसको वह लोग समझ जावें तो अनायास ही जैनधर्म से प्रेम करने लगें। श्री अमृतचंदसूरि ने तो प्रभावना का यह लक्षण लिखा है कि- 'आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव।
     दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयैर्जिनधर्मः।।'    
          वास्तविक प्रभावना तो यह है कि अपनी परिणति जो अनादि काल से पर को आत्मीय मान कलुषित हो रही है तथा परमें निजत्व का अवबोध कर विपर्यय ज्ञानवाली हो रही है एवं परपदार्थों में रागद्वेष कर मिथ्या-चारित्रमयी हो रही है, उसे आत्मीय श्रद्धान ज्ञानचारित्र के द्वारा ऐसी निर्मल बनाने का प्रयत्न किया जाय, इससे इतर धर्मावलंबियों के ह्रदय में स्वयमेव समा जावे कि धर्म तो यह वस्तु है। इसी को निश्चय प्रभावना कहते हैं। 
         ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ३?

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रामटेक - ४१


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         अनेक पाठकों ने श्री रामटेक जी की वंदना की होगी। आत्मकथा की आज की प्रस्तुती के अंशों से हम पूज्य वर्णीजी की अनुभूति के अनुसार श्री रामटेक जी की वंदना करेंगे।      पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४१*
              रामटेक के मंदिरों की शोभा अवर्णनीय है। यहाँ पर श्री शांतिनाथ स्वामी के दर्शन कर बहुत आनंद हुआ। यह स्थान अति रमणीय है। ग्राम से क्षेत्र ३ फर्लांग होगा। निर्जन स्थान है।           यहाँ चारों तरफ  बस्ती नहीं। २ मील पर पर्वत है जहाँ श्री रामचंद्र जी महराज का मंदिर है। वहाँ पर मैं नहीं गया। जैन मंदिरों के पास जो धर्मशाला थी उसमें निवास कर लिया।         क्षेत्र पर पुजारी,माली, जमादार, मुनीम आदि कर्मचारी थे। मंदिर की स्वच्छता पर कर्मचारीगणों का पूर्ण ध्यान था। ये सब साधन यहाँ पर अच्छे हैं, कोष भी क्षेत्र का अच्छा है, धर्मशाला आदि का प्रबंध उत्तम है। परंतु जिससे यात्रियों को आत्मलाभ हो उसका साधन कुछ नहीं।        उस समय मेरे मन में जो आया उसे कुछ विस्तार के साथ आज इस प्रकार कह सकते हैं-        ऐसे क्षेत्र पर आवश्यकता एक विद्वान की थी, जो प्रतिदिन शास्त्र प्रवचन करता और लोगों को मौलिक जैन सिद्धांत का का अवबोध कराता। जो जनता वहाँ पर निवास करती है उसे वह बोध हो जाता कि जैनधर्म इसे कहते हैं।      हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की बलवत्ता है जो हम लोग बाह्य कार्यों में द्रव्य का व्ययकर ही करने को कृतार्थ मान  लेते हैं।   
        
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
     ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल १?

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रामटेक - ४०

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४०*               श्री कुण्डलपुर से यात्रा करने के पश्चात श्री रामटेक के वास्ते प्रयाण किया। हिंडोरिया आया। यहाँ तालाब पर प्राचीन काल का एक जिनबिम्ब है। यहाँ पर कोई जैनी नहीं। यहाँ से चलकर दमोह आया, यहाँ २०० घर जैनियों के बड़े-बड़े धनाढ्य हैं।       मंदिरों की रचना अति सुदृढ़ और सुंदर है। मूर्ति समुदाय पुष्कल है। अनेक मंदिर है। मेरा किसी से परिचय न था और न करने का प्रयास भी किया, क्योंकि जैनधर्म का कुछ विशेष ज्ञान न था और न त्यागी ही था, जो किसी से कुछ कहता।         अतः दो दिन यहाँ निवास कर जबलपुर की सड़क द्वारा जबलपुर को प्रयाण कर दिया। मार्ग में अनेक जैन मंदिरों के दर्शन किए। चार दिन में जबलपुर पहुँच गया। वहाँ के मंदिरों की अवर्णनीय शोभा देखकर जो प्रमोद हुआ उसे कहने में असमर्थ हूँ।           यहाँ से रामटेक के लिए चल दिया। ६ दिन में सिवनी पहुँचा। यहाँ भी मंदिरों के दर्शन किए। दर्शन करने से मार्ग का श्रम एकदम चला गया। २ दिन बाद श्री रामटेक के लिए चल दिया। कई दिनों के बाद रामटेक क्षेत्रपर पहुँच गया।         
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा?

Abhishek Jain

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