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महान मेला - ६१

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,

       यहाँ वर्णीजी द्वारा जयपुर मेले का वर्णन चल रहा है। इस मेले में जैनधर्म की बहुत ही प्रभावना हुई।

      जयपुर नरेश द्वारा व्यक्त की जिनबिम्ब की महिमा बहुत सुंदर वर्णन है।

     श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंदजी सोनी द्वारा मेले के आयोजन के कारण ही धर्म की अधिक प्रभावना हुई। यहाँ वर्णीजी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही- द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय है लेकिन उसका सदुपयोग बहुत ही कम पुण्यात्मा कर पाते हैं।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


                  *"महान मेला"*

                     *क्रमांक-६२*


            मेला में श्री महाराजाधिराज जयपुर नरेश भी पधारे थे। आपने मेले की सुंदरता देख बहुत ही प्रसन्नता व्यक्त की थी। तथा जिनबिम्बों को देखकर स्पष्ट शब्दों में कहा था कि - 'शुभ ध्यान की मुद्रा तो इससे उत्तम संसार में नहीं हो सकती।

         जिसे आत्मकल्याण करना हो वह इस प्रकार की मुद्रा बनाने का प्रयत्न करे। इस मुद्रा में बाह्यडम्बर छू भी नहीं गया है। साथ ही इनकी सौम्यता भी इतनी अधिक है कि इसे देखकर निश्चय हो जाता है कि जिनकी यह मुद्रा है उनके अंतरंग में कोई कलुषता नहीं थी।

        मैं यही भावना भाता हूँ कि मैं भी इसी पद को प्राप्त होऊँ। इस मुद्रा के देखने से जब इतनी शांति होती है तब जिनके ह्रदय में कलुषता नहीं उनकी शांति का अनुमान होना ही दुर्लभ है।'

       इस प्रकार मेला में जो जैनधर्म की अपूर्व प्रभावना हुई उसका श्रेय श्रीमान स्वर्गीय सेठ मूलचंद जी सोनी अजमेर वालों के भाग्य में था। द्रव्य का होना पूर्वोपार्जित पुण्योदय से होता है परंतु उसका सदुपयोग विरले ही पुण्यात्माओं के भाग्य में होता है।

      जो वर्तमान में पुण्यात्मा हैं वही मोक्षमार्ग के अधिकारी हैं। संपत्ति पाकर मोक्षमार्ग का लाभ जिसने लिया उसी रत्न ने मनुष्य जन्म का लाभ लिया। अस्तु, यह मेला का वर्णन हुआ।

? *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*?
 ?आजकि तिथि- श्रावण कृष्ण २?

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