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  1. 🙏🏻जिणवाणी थुदि🙏🏻🌹 सिरि जिणवाणी जग कल्लाणी जगजणमदतममोहहरी जणमणहारी गणहरहारी जम्मजराभवरोगहरी । तित्थयराणं दिव्वझुणिं जो पढइ सुणइ मईए धारइ णाणं सोक्खमणंतं धरिय सासद मोक्खपदं पावइ ।।
  2. आज चतुर्दशी है.21-05-2020 गुरुवार देवाधिदेव 1008 श्री शांतिनाथ भगवान जी🙏🙏🙏 के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक ।आप सभी को अनंत शुभकामनायें
  3. Zoom link https://us02web.zoom.us/j/3999383537?pwd=cm9PbzhhTnRVZGMvcjRSaTExVmtpdz09
  4. स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्, भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्। धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं, तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥
  5. मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज-दवानलाहि- संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध -नोत्थम्। तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव, यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥
  6. आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा, गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जङ्घा:। त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:, सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥
  7. सादर जय जिनेन्द्र, आपको यह आज शाम 9 बजे तक भेजनी है। आओ शब्दो से भजन बनाये उदहारण :- ध क म ज धरम करो मस्त जवानी में 1 जी है पा की बूं क 2 मे आ कृ से स का 3 पा प्या ला च प्या 4 मं ण ह प्रा से प्या 5 ज से गु द मि म 6 स ध क जि दि मौ की 7 अ ज ज सि प्र ज ज 8 ण मं है न्या जि ला 9 छो सा मं ब वी गु 10 वि की तृष् को छो के 11 हिं पी वि रा म 12 तू जा रे चे प्रा क 13 ते पां हु कल् प्र ए बा 14 सो सो में नि ग सा जिं 15 मु आ मे कु में आ है 16 मि है सच् सु के भ 17 मा तू द क क से 18 ल ल ल के झं जि का 19 क हूं में अ स्वी क 20 झी झी उ रे गु चा रे
  8. अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र- पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ। रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान-पात्रास्- त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥
  9. कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह, वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे। युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्- त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥
  10. वल्गत्-तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीमनाद- माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्। उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥
  11. रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्, क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्। आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्कस्- त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥
  12. कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि -कल्पं, दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिङ्गम्। विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं, त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥
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