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  1. ५. संसार-वृक्ष – देख तेरी वर्तमान दशा का एक सुंदर चित्र दर्शाता हूँ । एक व्‍यापारी जहाज में माल भरकर विदेश को चला । अनेकों आशायें थी उसके हृदय में । पर उसे क्‍या खबर थी कि अदृष्‍ट उसके लिये क्‍या लिये बैठा है । देर क्षितिज में से साँय-साँय की भयंकर ध्‍वनि प्रकट हुई, जो बराबर बढ़ती हुई उसकी और आने लगी । घबरा गया वह । हैं ! यह क्‍या ? तूफान सर पर आ गया । आँधी का वेग मानों सागर को अपने स्‍थान से उठाकर अन्‍यत्र ले जाने की होड़ लगाकर आया है । सागर ने अपने अभिमान पर इतना बड़ा आघात कभी न देखा था । वह एकदम गर्ज उठा, फुंकार मारने लगा और उछल-उछल कर वायुमण्‍डलों को ताड़ने लगा । वायु व सागर का यह युद्ध कितना भयंकर है । दिशायें भयंकर गर्जनाओं से भर गई हैं । दोनों नये-नये हथियार लेकर सामने आ रहे थे । सागर के भयंकर थपेड़ों से आकाश का साहस टूट गया । वह एक भयंकर चीत्‍कार के साथ सागर के पैरों में गिर गया । घड़ड़ड़ड़ । ओह ! यह क्‍या आफत आई ? आकाश फट गया और उसमें भीतर से क्षण भर को एक महान प्रकाश की रेखा प्रकट हुई । रात्रि के इस गहन अंधकार में भी इस वज्रपात के अद्वितीय प्रकाश में सागर का क्षोभ तथा इस युद्ध का प्रकोप स्‍पष्‍ट दिखाई दे रहा था । व्‍यापारी की नब्‍ज ऊपर चढ़ गई, मानों वह निष्‍प्राण हो चुका । इतने ही पर बस क्‍यों हों ? आकाश की इस पराजय को मेघराज सहन न कर सका । महा-काल की भाँति राक्षस सेना गर्जकर आगे बढ़ी और एक बार पुन: घोर अंधकार में सब कुछ विलीन हो गया । व्‍यापारी अचेत होकर गिर पड़ा । सागर उछला, गड़गड़ाया, मेघराज ने जलबाणों की घोर वर्षा की । मूसलाधार पानी पड़ने लगा । जहाज में जल भर गया । व्‍यापारी अब भी अचेत था । दो भयंकर राक्षसों के युद्ध में बेचारे व्‍यापारी की कौन सुने ? सागर की एक विकराल तरंग – ओह ! यह क्‍या ? पुन: वज्रपात हुआ और उसके प्रकाश में......? जहाज जोर से ऊपर की और उछला और नीचे गिरकर जल में विलुप्‍त हो गया । सागर की गोद में समा गया । उसके अगोंपांग इधर उधर बिखर गये । हाय, बेचारा व्‍यापारी, कौन जाने उसकी क्‍या दशा हुई ? प्रभात हुआ । एक तखते पर पड़ा सागर में बहता हुआ कोई अचेत व्‍यक्ति भाग्‍यवश किनारे पर आ लगा । सूर्य की किरणों ने उसके शरीर में कुछ स्‍फूर्ति उत्‍पन्‍न की, उसने आँखें खोलीं । मैं कौन हूँ ? मैं कहाँ हूँ ? यह कौन देश है ? किसने मुझे यहाँ पहुँचाया, मैं कहाँ से आ रहा हूँ ? क्‍या काम करने के लिये घर से निकला था ? मैं, मेरे पास क्‍या है ? कैसे निर्वाह करूँ ? सब कुछ भूल चुका अब वह । उसे नवजीवन मिला है, यह भी पता नहीं है उसे । किसकी सहायता पाऊँ, कोई दिखाई नहीं देता । गर्दन लटकाये चल दिया जिस और मुँह उठा । एक भयंकर चीत्‍कार । अरे ! यह क्‍या ? उसकी मानसि‍क स्‍तब्‍धता भंग हो गई । पीछे मुड़कर देखा । मेघों से भी काला, जंगम-पर्वत तुल्‍य, विकराल गजराज सूंढ़ ऊपर उठाये, चीख मारता हुआ, उसकी और दौड़ा । प्रभु ! बचाओ । अरे पथिक ! कितना अच्‍छा होता यदि इसी प्रभु को अपने अच्‍छे दिनों में भी याद कर लिया होता । अब क्‍या बनता है, यहाँ कोई भी तेरा सहारा नहीं । दौड़ने के अतिरिक्‍त शरण नहीं थी । पथिक दौड़ा, जितनी जोर से उससे दौड़ा गया । हाथी सर पर आ गया और धैर्य जाता रहा उसका । अब जीवन असम्‍भव है । ‘‘नहीं पथिक तूने एक बार जिह्वा से प्रभु का नाम लिया है, वह निरर्थक नहीं जायेगा, तेरी रक्षा अवश्‍य होगी’’, आकाशवाणी हुई, आश्‍चर्य से आँख उठाकर देखा, कुछ संतोष हुआ, सामने एक बड़ा वटवृक्ष खड़ा था । एक बार पुन: साहस बटोरकर पथिक दौड़ा और वृक्ष के नीचे की और लटकती दो उपशाखाओं को पकड़कर वह ऊपर चढ़ गया । हाथी का प्रकोप और भी बढ़ गया, यह उसकी मानहानि है । इस वृक्ष ने उसके शिकार को शरण दी है । अत: वह भी अब रह न पायेगा । अपनी लम्‍बी सूंढ से वह वृक्ष को जोर से हिलाने लगा । पथिक का रक्‍त सूख गया । अब मुझे बचाने वाला कोई नहीं । नाथ ! क्‍या मुझे जाना ही होगा, बिना कुछ देखे, बिना कुछ चखे ? “नहीं प्रभु का नाम बेकार नहीं जाता । ऊपर दृष्टि उठाकर देख”, आकाशवाणी ने पुन: आशा का संचार किया । ऊपर की और देखा मधु का एक बड़ा छत्‍ता जिसमें से बूंद-बूंद करके झर रहा था उसका मद । आश्‍चर्य से मुँह खुला का खुला रह गया । यह क्‍या ? और अकस्‍मात् ही- आ हा हा, कितना मधुर है यह ? एक मधुबिन्‍दु उसके खुले मुँह में गिर पड़ा । वह चाट रहा था उसे और कृतकृत्‍य मान रहा था अपने को । एक बूँद और । मुँह खोला, और पुन: वही स्‍वाद । एक बूंद और......। और इस प्रकार मधुबिन्‍दु के इस मधुर स्‍वाद में खो गया वह, मानो उसका जीवन बहुत सुखी बन गया है । अब उसे और कुछ नहीं चाहिए, एक मधुबिन्‍दु । भूल गया वह अब प्रभु के नाम को । उसे याद करने से अब लाभ भी क्‍या है ? देख कोई भी मधुबिन्‍दु व्यर्थ पृथ्वी पर न पड़ने पावे । उसके सामने मधुबिन्‍दु के अतिरिक्‍त और कुछ न था । भूल चुका था वह यह कि नीचे खड़ा वह हाथी अब भी वृक्ष की जड़ में सूंड़ से पानी दे-देकर उसे जोर-जोर से हिला रहा है । क्‍या करता उसे याद करके, मधुबिन्‍दु जो मिल गया है उसे, मानो उसके सारे भय टल चुके हैं । वह मग्‍न है मधुबिन्‍दु की मस्‍ती में । वह भले न देखे, पर प्रभु तो देख रहे हैं । अरे रे ! कितनी दयनीय है इस पथिक की दशा । नीचे हाथी वृक्ष को समूल उखाड़ने पर तत्‍पर है और ऊपर वह देखो दो चूहै बैठे उस डाल को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं जिस पर कि वह लटका हुआ है । उसके नीचे उस अन्‍धकूप में, मुँह फाड़े विकराल दाड़ों के बीच में लम्‍बी लम्‍बी भयंकर जिह्वा लपलपा रही है जिनकी लाल-लाल नेत्रों से, ऊपर की और देखते हुये चार भयंकर अजगर मानो इसी बात की प्रतीक्षा में हैं कि कब डाल कटे और उनको एक ग्रास खाने को मिले । उन बेचारों का भी क्‍या दोष, उनके पास पेट भरने का एक यही तो साधन है । पथभ्रष्‍ट अनेकों भूले भटके पथिक आते हैं और इस मधुबिन्‍दु के स्‍वाद में खोकर अंत में उन अजगरों के पास ग्रास बन जाते हैं । सदा से ऐसा होता आ रहा है, तब आज भी ऐसा ही क्‍यों न होगा ? गड़ गड़ गड़ वृक्ष हिला । मधु मक्षिकाओं का संतुलन भंग हो गया । भिनभिनाती हुईं, भन्‍नाती हुईं वे उड़ीं । इस नवागन्‍तुक ने ही हमारी शांति में भंग डाला है । चिपट गईं वे सब उसको, कुछ सर पर, कुछ कमर पर, कुछ हाथों में, कुछ पांवों में, सहसा घबरा उठा वह..... यह क्‍या ? उनके तीखे डंकों की पीड़ा से व्‍याकुल होकर एक चीख निकल पड़ी उसके मुँह से, ‘प्रभु ! बचाओ मुझे ।’ पुन: वही मधुबिन्‍दु । जिस प्रकार रोते हुये शिशु के मुख में मधु भरा रबर का निपल देकर माता उसे सुला देती है और वह शिशु भी इस भ्रम में कि मुझे स्‍वाद आ रहा है, संतुष्‍ट होकर सो जाता है; उसी प्रकार पुन: खो गया वह उस मधुबिन्‍दु में और भूल गया उन डंकों की पीड़ा को । पथिक प्रसन्‍न था, वह सामने बैठे करम करूणाधारी, शांतिमूर्ति जगत हितकारी, प्रकृति की गोद में रहने वाले, निर्भय गुरूदेव मन ही मन उसकी इस दयनीय दशा पर आँसू बहा रहे थे । आखिर उनसे रहा न गया । उठकर निकल आये । “भो पथिक ! एक बार नीचे देख, यह हाथी जिससे डरकर तू यहाँ आया है, अब भी यहाँ ही खड़ा इस वृक्ष को उखाड़ रहा है । ऊपर वह देख, सफेद व काले दो चूहै तेरी इस डाल को काट रहे हैं । नीचे देख अजगर मुँह बाये तुझे ललचाई-ललचाई दृष्टि से ताक रहे हैं । इस शरीर को देख जिस पर चिपटी हुई मधु-मक्षिकायें तुझे चूंट-चूंट कर खा रही हैं । इतना होने पर भी तू प्रसन्‍न है । यह बढ़ा आश्‍चर्य है । आँख खोल, तेरी दशा बड़ी दयनीय है । एक क्षण भी विलम्ब करने को अवकाश नहीं । डाली कटने वाली है । तू नीचे गिरकर नि:संदेह उन अजगरों का ग्रास बन जायेगा । उस समय कोई भी तेरी रक्षा करने को समर्थ न होगा । अभी भी अवसर है । आ मेरा हाथ पकड़ और धीरे से नीचे उतर आ । यह हाथी मेरे सामने तुझे कुछ नहीं कहैगा । इस समय में तेरी रक्षा कर सकता हूँ । सावधान हो, जल्‍दी कर ।” परन्‍तु पथिक को कैसे स्‍पर्श करें वे मधुर-वचन । मधुबिन्‍दु के मधुराभास में उसे अवकाश ही कहाँ है यह सब कुछ विचारने का ? “बस गुरूदेव, एक बिन्‍दु और, वह आ रहा है, उसे लेकर चलता हूँ अभी आपके साथ ।” बिंदु गिर चुका । “चलो भय्या चलो,” पुन: गुरू जी की शांति ध्वनि आकाश में गूंजी दिशाओं से टकराई और खाली ही गुरू जी के पास लौट आई । “बस एक बूंद और अभी चलता हूँ”, इस उत्‍तर के अतिरिक्‍त और कुछ न था पथिक के पास । तीसरी बार पुन: गुरूदेव का करूणापूर्ण हाथ बढ़ा । अब की बार वे चाहते थे कि इच्‍छा न होने पर उस पथिक को कौली भरकर वहाँ से उतार लें । परंतु पथिक को यह सब स्‍वीकार ही कब था ? यहाँ तो मिलता है मधुबिंदु और शांति मूर्ति इन गुरूदेव के पास है वह भूख व प्‍यास, गर्मी व सर्दी तथा अन्‍य अनेकों संकट । कौन मूर्ख जाये इनके साथ ? लात मारकर गुरूदेव का हाथ झटक दिया उसने और क्रुद्ध होकर बोला, “जाओ अपना काम करो, । मेरे आनंद में विघ्‍न मत डालो ।” गुरूदेव चले गये, डाली कटी और मधुबिंदु की मस्‍ती को हृदय में लिये, अजगर के मुँह में जाकर अपनी जीवन लीला समाप्‍त कर दी उसने । कथा कुछ रोचक लगी है आपको, पर जानते हो किसकी कहानी है ? आपकी और मेरी सबकी आत्‍म कथा है यह । आप हंसते हैं उस पथिक की मूर्खता पर, काश एक बार हँस लेते अपनी मूर्खता पर भी । इस अपार व गहन संसार-सागर में जीवन के जर्जरित पोत को खेता हुआ मैं चला आ रहा हूँ । नित्‍य ही अनुभव में आनेवाले जीवन के थपेड़ों के कड़े अघातों को सहन करता हुआ, यह मेरा पोत कितनी बार टूटा और कितनी बार मिला, यह कौन जाने ? जीवन के उतार चढ़ाव के भयंकर तूफान में चेतना को खोक‍र मैं बहता चला आ रहा हूँ, अनादि काल से । माता के गर्भ से बाहर निकलकर आश्‍चर्य भरी दृष्‍टी से इस संपूर्ण वातावरण को देखकर खोया-खोया सा मैं रोने लगा क्‍योंकि मैं यह न जान सका कि मैं कौन हूँ ? मैं कहाँ हूँ ? कौन मुझे यहाँ लाया है, मैं कहाँ से आया हूँ, क्‍या करने के लिए आया हूँ, और मेरे पास क्‍या है, जीवन निर्वाह के-लिए ? संभवत: माता के गर्भ से निकलकर बालक इसीलिए रोता है । ‘मानो मैं कोई अपूर्व व्‍यक्ति हूँ, ऐसा सोचकर मैं इस वातावरण में कोई सार देखने लगा । दिखाई दिया मृत्‍यु रूपी विकराल हाथी का भय । डरकर भागने लगा कि कहीं शरण मिले । बचपन बीता, जवानी आई और भूल गया मैं सब कुछ । विवाह हो गया, सुंदर स्‍त्री घर में आ गई, धन कमाने और भोगने में जीवन घुलमिल गया, मानो यही है मेरी शरण, अर्थात् गृहस्थ-जीवन जिसमें है अनेक प्रकार के संकल्‍प विकल्‍प, आशायें व निराशायें । यही हैं वे शाखायें व उपशाखायें जिनसे समवेत यह गृहस्थजीवन है वह शरणभूत वृक्ष । आयुरूपी शाखा से संलग्‍न आशा की दो उपशाखाओं पर लटका हुआ मैं मधुबिंदु की भाँति इन भागों में से आने वाले क्षणिक स्‍वाद में खोकर भूल बैठा हूँ सब कुछ । काल रूप विकराल हा‍थी अब भी जीवन तरू को समूल उखाड़नें में तत्‍पर बराबर इसे हिला रहा है । अत्‍यंत वेग से बीतते हुए दिनरात ठहरे सफेद और काले दो चूहै, जो बराबर आयु की इस शाखा को काट रहे हैं । नीचे मुँह बाये हुए चार अजगर हैं चार गतियें- नरक, तिर्यंच, मनुष्‍य व देव, जिनका ग्रास बनता, जिनमें परिभ्रम करता मैं सदा से चला आ रहा हूँ और अब भी निश्चित रूप से ग्रास बन जाने वाला हूँ, यदि गुरूदेव का उपदेश प्राप्‍त करके इस विलासिता का आश्रय न छोड़ा तो । मुधमक्षिकायें हैं स्‍त्री, पुत्र व कुटुम्‍ब जो नित्‍य चुंट-चुंट कर मुझे खाए जा रहे हैं तथा जिनके संताप से व्‍याकुल हो मैं कभी-कभी पुकार उठता हूँ ‘प्रभु ! मेरी रक्षा करें ।’ मधु बिंदु है वह क्षणिक इंद्रिय सुख, जिसमें मग्‍न हुआ मैं न बीतती हुई आयु को देखता हूँ, न मृत्‍यु से भय खाता हूँ, न कौटुम्बिक चिंताओं की परवाह करता हूँ और न चारों गतियों के परिभ्रमण को गिनता हूँ । कभी कभी लिया प्रभु का नाम है वह पुण्‍य, जिसके कारण कि यह तुच्‍छ इंद्रिय सुख कदाचित्‍ प्राप्‍त हो जाता है । यह मधुबिंदु रूपी इंद्रिय सुख भी वास्‍तव में सुख नहीं, सुखावास है । जिस प्रकार कि बालक के मुँह में दिया जाने वाला वह निपल, जिसमें से कुछ भी स्‍वाद बालक को वास्‍तव में नहीं आता, क्‍योंकि रबर के बंद उस निपल में से किंचित्‍ मात्र भी मधु बाहर निकलकर उसके मुँह में नहीं आता । जिस प्रकार वह केवल मिठास की कल्‍पना मात्र करके सो जाता है उसी प्रकार इन इंद्रिय-सुखों में मिठास की कल्‍पना करके मेरा विवेक सो गया है, जिसके कारण गुरू देव की करूणा भरी पुकार मुझे स्‍पर्श नहीं करती तथा जिसके कारण उनके करूणा भरे हाथ की अवहैलना करते हुए भी मुझे लाज नहीं आती । गुरू के स्‍थान पर है यह गुरूवाणि, जो नित्‍य ही पुकार-पुकाकर मुझे सावधान करने का निष्‍फल प्रयास कर रही है । यह है संसार-वृक्ष का मुँह बोलता चित्रण व मेरी आत्‍म गाथा । भो चेतन ! कब तक इस सागर के थपेड़े सहता रहेगा ? कब तक गतियों का ग्रास बनता रहेगा ? कब तक काल द्वारा भग्‍न होता रहेगा ? प्रभो ! ये इ्ंद्रिय सुख मधुबिंदु की भाँति निःसार है, सुख नहीं सुखाभास है, ‘एक बिन्दुसम’ ये तृष्‍णा को भड़काने वाले हैं, मेरे विवेक को नष्‍ट करने वाले हैं । इनके कारण ही तुझे हितकारी गुरूवाणि सुभाती नहीं । आ ! बहुत हो चुका, अनादि काल से इसी सुख के झूठे आभास में तूने आज तक अपना हित न किया । अब अवसर है, बहती गंगा में मुँह धोले । बिना प्रयास के ही गुरूदेव का यह पवित्र संसर्ग प्राप्‍त हो गया है । छोड़ दे अब इस शाखा को शरण ले इन गुरूओं की और देख अदृष्ट में तेरे लिए वह परम आनंद पड़ा है, जिसे पाकर तृप्‍त हो जायेगा तू, सदा के लिए प्रभु बन जायेगा तू ।
  2. ४. इच्‍छा गर्त – शांति की पहचान भी अनुभव के आधार पर करनी है, किसी की गवाही लेकर नहीं और बड़ी सरल है वह । केवल अंतरंग के परिणामों का या अंतर्ध्वनि का विश्‍लेषण करके देखना है । असंतोष में डूबी आज की ध्‍वनि प्रतिक्षण मांग रही है, तुझसे, ‘कुछ और’ । ‘कुछ और चाहिये अभी तृप्‍त नहीं हुआ, अभी कुछ और भी चाहिये’, बराबर ऐसी ध्‍वनि सुनने में आ रही है । वास्‍तव में इस ध्‍वनि का नाम ही तो अभिलाषा, इच्‍छा या व्‍याकुलता । क्‍या कुछ संदेह है इसमें भी ? यदि है तो देख, आज तुझे इच्‍छा है अपनी युवती कन्‍या का जल्‍दी से जल्‍दी वि‍वाह करने की, पर योग्‍य वर न मिलने के कारण कर नहीं पा रहा है । तेरी इच्‍छा पूरी नहीं हो रही है । बस यही तो है तेरे अंदर की व्‍याकुलता, व्‍यग्रता, अशांति या दु:ख । पुरूषार्थ करके अधिकाधिक कमा डाला, पर उस ध्‍वनि की और उपयोग गया तो आश्‍चर्य हुआ यह देखकर कि ज्‍यों-ज्‍यों धन बढ़ा वह ‘कुछ और’ की ध्‍वनि और भी बलवान होती गई । ज्‍यों-ज्‍यों भोग भोगे, भोगों के प्रति की अभिलाषा और अधिक बढ़ती गई । क्‍या कारण है इसका ? जितनी कुछ भी धन-राशि की प्राप्ति हुई थी, उतना तो इसको कम होना चाहिये था या बढ़ना ? बस सिद्धांत निकल गया कि इच्‍छाओं का स्‍वभाव ही ऐसा है कि ज्‍यों-ज्‍यों मांग पूरी करें त्‍यों -त्‍यों दबने की बजाय और अधिक बढ़े । इच्‍छा के बढ़ने में भी संभवत: हर्ज न होता, यदि यह संभव होता कि एक दिन जाकर इसका अन्‍त आ जायेगा, क्‍योंकि इच्‍छा का अन्‍त आ जाने पर भी मैं पुरूषार्थ करता रहूँगा और अधिक धम कमाने का, एक दिन इतना संचय कर लूंगा कि उसकी पूर्ति हो जाये । परन्‍तु विचारने पर यह स्पष्ट प्रतीति में आता कि इच्‍छा का कभी अन्‍त नहीं होगा । इच्‍छा असीम है और इसके सामने पड़ी हुई तीन-लोक की सम्‍पत्ति सीमित । संभवत: इतनी मात्र कि इच्‍छा के खड्डे में पड़ी हुई इतनी भी दिखाई न दे, जैसा कि कोई परमाणु । इस पर भी इसको बंटवाने वाली इतनी बड़ी जीवराशि ? क्‍योंकि सब ही को तो इच्‍छा है उसकी, तेरी भाँति । बता क्‍या संभव है ऐसी दशा में इस इच्‍छा की पूर्ति ? इसका अनन्‍तवां अंश भी तो संभवत: पूर्ण न हो सके ? फिर कैसे मिलेगी तुझे शांति, धन प्राप्ति के पुरूषार्थ से ? बस बन गया सिद्धांत ? धन व भोगों की प्राप्ति का नाम सुख व शांति नहीं, बल्कि उनका अभाव शांति है, और इसलिये धनोपार्जन या भोगों सम्बंधी पुरूषार्थ, इस दिशा का पुरूषार्थ नहीं है ।
  3. ३. सत्‍य पुरूषार्थ – अब प्रश्‍न होता है कि क्‍या आज तक प्रयत्‍न नहीं किया ? नहीं ऐसी बात नहीं है । प्रयत्‍न तो किया और बराबर करता आ रहा है । प्रयत्‍न करने में कमी नहीं है । धन उपार्जन करने में, जीवन की आवश्‍यक वस्‍तुएं जुटाने में, उनकी रक्षा करने में तथा उनको भोगने में अवश्‍य तू पुरूषार्थ कर रहा है और खूब कर रहा है । फिर कमी कहाँ है जो आज तक असफल रहा है, उसकी प्राप्ति में, कमी है प्रयोग को बदलकर न देखने की । प्रयत्‍न तो अवश्‍य करता आ रहा है, पर अव्‍वल तो आज तक कभी तुझे यह विचारने का अवसर ही नहीं मिला कि तुझे सफलता नहीं मिल रही है और यदि कुछ प्रतीति भी हुई तो प्रयोग बदलकर न देखा । वही पुराना प्रयोग चल रहा है जो पहले चलता था-धन कमाने का, भोगों की उपलब्धि व रक्षा का तथा उन्हें भोगने का । कभी विचारा है यह कि अधिक से अधिक प्रयोगों को प्राप्‍त करके भी यह ध्‍वनि शांत नहीं हो रही है तो अवश्‍यमेव मेरी धारणा में ? मेरे विश्‍वास में कहीं भूल है ? धन या भोग शांति की प्राप्ति के उपाय ही नहीं हैं । यदि ऐसा होता तो अवश्‍य ही मैं शांत हो गया होता । आवाज का न दबना ही यह बता रहा है कि मेरा उपाय झूठा है । वास्‍तव में उपाय कुछ और है, जिसे में नहीं जानता । अत: या तो किसी जानकार से पूछकर या स्‍वयं पुरूषार्थ की दिशा घुमाकर देखूँ तो सही । इस उपरोक्‍त प्रयोग को यदि अपनाता, तो अवश्‍य आज तक वह मार्ग पा लिया होता । अब सुनने पर तथा अपनी धारणा बदल जाने के कारण कुछ इच्‍छा भी प्रगट हुई हो यदि प्रयत्‍न बदलने की, तो उससे पहले तुझको यह बात जान लेनी आवश्‍यक है कि किस चीज का आविष्‍कार करने जा रहा है तू, क्‍योंकि बिना किसी लक्ष्‍य के किस और लगायेगा अपने पुरुषार्थ को ? केवल शान्ति व सुख कह देने से काम नहीं चलता । उस शान्ति या सुख की पहचान भी होनी चाहिए, ताकि आगे जाकर भूलवश पहले की भाँति उस दु:ख या अशान्ति को सुख या शान्ति न मान बैठे और तृप्‍तवत् हुआ चलता जाये उसी दिशा में, बिल्‍कुल असफल व असंतुष्‍ट ।
  4. २. विज्ञान विधि – किस प्रकार किया उन्‍होंने यह आविष्‍कार ? कहाँ से सीखा इसका उपाय ? कहीं बाहर से नहीं, अपने अंदर से । उपाय ढूंढने का जो वैज्ञानिक ढंग है, उसके द्वारा । उपाय ढूंढने का वैज्ञानिक व स्वाभाविक ढंग यद्यपि सबके अनुभव में प्रतिदिन आ रहा है, पर विश्‍लेषण न करने के कारण सैद्धांतिक रूप से उसकी धारणा किसी को नहीं है । देखिये उस कबूतर को जिसकी अभिलाषा है कि आपके कमरे में किसी न किसी प्रकार से प्रवेश कर पाये, अपना घोंसला बनाने के लिये । कमरे में प्रवेश करने का उपाय किससे पूछे ? स्‍वयं अपने अन्दर से ही उपाय निकालता है, अत: प्रयत्‍न करता है । कभी उस द्वार पर जाता है और बंद पाकर वापस लौट आता है । कुछ देर पश्‍चात् उस खिड़की के निकट जाता है, वहाँ सरिये लगे पाता है । सरियों के बीच में गर्दन घुसाकर प्रयत्‍न करता है घुसने का परन्‍तु सरियों में अंतराल कम होने के कारण शरीर निकल नहीं पाता, उनके बीच से । फिर लौट आता है, दूसरी दिशा में जाता है, वहाँ भी वैसा ही प्रयत्‍न । फिर तीसरी में और फिर चौथी दिशा में, कहीं से मार्ग न मिला । सामने वाले मुँडेर पर बैठ कर सोच रहा है वह, अब भी उसी का उपाय । निराश नहीं हुआ है वह । हैं ! यह क्‍या है, ऊपर छत के निकट ? चलकर देखूं तो सही ? एक रोशनदान । झुककर देखता है अन्दर की और कुछ भय के कारण तो नहीं हैं वहाँ ? नहीं, नहीं कुछ नहीं है । रोशनदान में घुस जाता है, कमरे की कार्नस पर बैठकर प्रतीक्षा करता है, कुछ देर कमरे के स्‍वामी के आने की । स्‍वामी आता है, तो देखता है गौर से उसकी मुखाकृति को । क्रूर तो नहीं है ? नहीं, भला आदमी है और फिर जाता है और आता है, बे रोकटोक, मानो उसके लिये ही बनाया था यह द्वार । इसी प्रकार एक चींटी भी पहुँच जाती है अपने खाद्य पदार्थ पर, और थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर मार्ग निकाल ही लेती है । विश्‍लेषण कीजिये इन छोटे से जंतुओं की इस प्रक्रिया का । धैर्य और साहस के साथ बार-बार प्रयत्‍न करना । असफल रहने पर भी एकदम निराश न रह जाना । एक द्वार न दिखे तो दूसरी दिशा में जाकर ढूँढ़ना या दूसरे द्वार पर प्रयत्‍न करना और अन्‍त में सफल हो जाना । यह है, क्रम किसी अभीष्‍ट विषय के उपाय ढू़ँढ़ने का । इसे वैज्ञानिक जन कहते है, “Trial & error theory”, ‘सफल न होने पर प्रयत्‍न की दिशा घुमा देने का सिद्धांत’ । आप स्‍वयं भी तो इस सिद्धांत का प्रयोग कर रहे हैं, अपने जीवन में । कोई रोग हो जाने पर, आते तो वैद्यराज के पास, औषधि लेते हो । तीन चार दिन खाकर देखने के पश्चात् कोई लाभ होता प्रतीत नहीं होता तो वैद्यजी से कहते हो, औषधि बदल देने के लिये । उसमें भी यदि काम न चले तो पुन: वही क्रम । और अन्‍त में तीन बार औषधि बदली जाने पर, मिल ही जाती है, कोई अनुकूल औषधि । इस प्रक्रिया का विश्‍लेषण करने पर भी उपरोक्‍त ही फल निकलेगा । बस यही है वह सिद्धांत, जो यहाँ शांति-प्राप्ति के उपाय के सम्बंध में भी लागू करना है । किसी अनुभूत व दृष्‍ट विषय का विश्‍लेषण करके एक सिद्धांत बनाना तथा उसी जाति के किसी अनुभूत व अदृष्‍ट विषय पर लागू करके अभीष्‍ट की सिद्धि कर लेना ही तो वैज्ञानिक मार्ग है, कोई नवीन खोज करने का । शांति की नवीन खोज करनी है तो उपरोक्‍त सिद्धांत को लागू कीजिए । एक प्रयत्‍न कीजिये, यदि सफलता न हो तो उस प्रयत्‍न की दिशा घुमाकर देखिये, फिर भी सफलता न मिले तो पुन: कोई और प्रयोग कीजिये, और प्रयोगों को बराबर बदलते जाइये, जब तक कि सफल न हो जायें ।
  5. १. अंतर की माँग – धर्म सम्बंधी वास्‍तविकता को जानने के लिये वक्‍ता व श्रोता की आवश्‍यकताओं को तथा शिक्षण पद्धति-क्रम को जानने के पश्चात और धर्म सम्बंधी बात को जानने के लिये उत्‍साह प्रकट हो जाने के पश्‍चात्; अब यह बात जानना आवश्‍यक है कि धर्म कर्म की जीवन में आवश्‍यकता ही क्‍या है ? जीवन के लिये यह कुछ उपयोगी तो भासता नहीं । यदि बिना किसी धार्मिक प्रवृत्ति के ही जीवन बिताया जाये तो क्‍या हर्ज है ? फिलास्‍फर बनने के लिेये कहा गया है न मुझे । प्रश्‍न बहुत सुंदर है और करना भी चाहिए था । अंदर में उत्‍पन्‍न हुये प्रश्‍न को कहते हुये शर्माना नहीं चाहिए, नहीं तो यह विषय स्‍पष्‍ट नहीं होने पायेगा । प्रश्‍न बेधड़क कर दिया करो, डरना नहीं । वास्तव में ही धर्म की कोई आवश्‍यकता न होती यदि मेरे अंदर की सभी अभिलाषाओं की पूर्ति साधारणत: हो जाती । कोई भी पुरूषार्थ किसी प्रयोजनवश करने में आता है । किसी अभिलाषा-विशेष की पूर्ति के लिये ही कोई कार्य किया जाता है । ऐसा कोई कार्य नहीं, जो बिना किसी अभिलाषा के किया जा रहा हो । अत: उपरोक्‍त बात का उत्तर पाने के लिये मुझे विश्‍लेषण करना होगा अपनी अभिलाषाओं का ऐसा करने से स्‍पष्‍ट कुछ ध्‍वनि अंतरंग से आती प्रतीत होंगी । इस रूप में कि ‘‘मुझे सुख चाहिए, मुझे निराकुलता चाहिये ।’’ यह ध्‍वनि छोटे बड़े सर्व ही प्रणियों की चिरपरिचित है, क्‍योंकि कोई भी ऐसा नहीं है जो इस ध्‍वनि को बराबर उठते न सुन रहा हो और यह ध्‍वनि कृत्रिम भी नहीं है । किसी अन्‍य से प्रेरित होकर यह सीख उत्‍पन्‍न हुई हो ऐसा भी नहीं है, स्वाभाविक है । कृत्रिम बात का आधार वैज्ञानिक नहीं लिया करते परन्‍तु इस स्‍वाभाविक ध्‍वनि का कारण तो अवश्‍य जानना पड़ेगा । अपने अंदर की इस ध्‍वनि से प्रेरित होकर, इस अभिलाषा की पूर्ति के लिये, मैं कोई प्रयत्‍न न कर रहा हूँ ऐसा भी नहीं है । मैं बराबर कुछ न कुछ उद्यम कर रहा हूँ । जहाँ भी जाता हूँ कभी खाली नहीं बैठता और कब से करता आ रहा हूँ य‍ह भी नहीं जानता । परन्‍तु इतना अवश्‍य जानता हूँ कि सब करते हुये भी बड़े से बड़ा धनवान या राजा आदि बन जाने पर भी यह ध्‍वनि आज तक शांत नहीं हो पाई । यदि शांत हो गई होती या उसके लिये किया जाने वाला पुरूषार्थ जितनी देर तक चलता रहता है उतने अंतराल मात्र के लिये भी कदाचित् शांत होती हुई प्रतीत होती तो अवश्‍य ही धर्म आदि की कोई आवश्‍यकता नहीं होती । उसी पुरूषार्थ के प्रति और अधिक उद्यम करता और कदाचित् सफलता प्राप्‍त कर लेता । वह शांति की अभिलाषा ही मुझे बाध्‍य कर रही है कोई नया आविष्‍कार करने के लिये, जि‍सके द्वारा में उसकी पूर्ति कर पाऊँ । आवश्‍यकता अविष्‍कार की जननी होती है । इसी कारण धर्म का आविष्‍कार ज्ञानीजनों-ने अपने जीवन में किया और उसी का उपदेश सर्व जगत को भी दिया तथा दे रहे हैं, किसी स्‍वार्थ के कारण नहीं, बल्कि प्रेम व करूणा के कारण कि‍ किसी प्रकार आप भी सफल हो सकें अभिलाषा को शांत करने में ।
  6. २ - धर्म का प्रयोजन १. अन्तर की माँग; २. विज्ञान विधि; ३. सत्य पुरुषार्थ; ४. इच्छा गर्त; ५. संसार वृक्ष |
  7. ८. पक्षपात निरसन – परन्‍तु पक्षपात को छोड़कर सुनना । नहीं तो पक्ष्‍ापात का ही स्‍वाद आता रहेगा । इस बात का स्‍वाद न चख सकेगा । देख एक दृष्‍टांत देता हूँ । एक चींटी थी नमक की खान में रहती थी । कोई उसकी एक सहैली उससे मिलने गई । बोली ‘‘बहन तू कैसे रहती है यहाँ? इस नमक के खारे स्‍वाद में । चल मेरे स्थान पर चल, वहाँ बहुत अच्‍छा स्‍वाद मिलेगा तुझे, तू बड़ी प्रसन्‍न होगी वहाँ जाकर ।’’ कहने सुनने से चली आई वह, उसके साथ उसके स्‍थान पर, हलवाई की दुकान में, परन्‍तु मिठाई पर घूमते हुये भी उसकी विशेष प्रसन्‍नता न हुई । उसकी सहैली ताड़ गई उसके हृदय की बात और पूछ बैठी उससे ‘क्‍यों बहिन आया कुछ स्‍वाद?’’ ‘‘नहीं कुछ विशेष स्‍वाद नहीं, वैसा ही सा लगता है मुझे तो, जैसा वहाँ नमक पर घूमते हुये लगता था ।’’ सोच में पड़ गई उसकी सहैली । यह कैसे सम्‍भव है । मीठे में नमक का ही स्‍वाद कैसे आ सकता है? कुछ गड़बड़ अवश्‍य है। झुककर देखा उसके मुख की और । ‘‘परन्‍तु बहन ! यह तेरे मुख में क्‍या है?’’ ‘’कुछ नहीं, चलते समय सोचा कि वहाँ यह पकवान मिले कि न मिले, थोड़ा साथ ले चल और मुँह में भर लाई थोड़ी सी नमक की डली । वही है यह ।’’ ‘‘अरे ! तो यहाँ का स्‍वाद कैसे आवे तुझे? मुँह में रखी है नमक की डली, मीठे का स्‍वाद कैसे आयेगा? निकाल इसे ।’’ डरती हुई ने कुछ-कुछ झिझक व आशंका के साथ निकाला उसे । एक और रख दिया इसलिये कि थोड़ी देर पश्चात् पुन: उठा लेना होगा इसे, अब तो सहैली कहती है, खेर निकाल दो इसके कहने से और उसके निकलते ही पहुंच गई दूसरे लोक में वह । ‘‘उठाले बहिन ! अब इस अपनी इस डली को’’ सहैली बोली । लज्जित हो गई व‍ह य‍ह सुनकर, क्‍योंकि अब उसे कोई आकर्षण नहीं था, उस नमक की डली में । बस तुम भी जब तक पक्षपात की यह डली मुख में रखे बैठे हो, नहीं चख सकोगे इस आध्‍यात्मिक स्‍वाद को । आता रहेगा केवल द्वेष का कड़वा स्‍वाद । एक बार मुँह में से निकालकर चखो इसे । भले फिर उठा लेना इसी अपने पहले खाजे को । परन्‍तु इतना विश्‍वास दिलाता हूँ कि एक बार के ही इस नई बात के आस्‍वाद से, तुम भूल जाओगे उसके स्‍वाद को, लज्जित हो जाओगे उस भूल पर । उसी समय पता चलेगा कि यह डली स्‍वादिष्‍ट थी कि कड़वी । दूसरा स्‍वाद चखे बिना कैसे जान पाओगे इसके स्‍वाद को ? अत: कोई भी नई बात जानने के लिये प्रारंभ में ही पक्षपात का विष अवश्‍य उगलने योग्‍य है । किसी बात को सुनकर या किसी भी शास्‍त्र में पढ़कर, वक्‍ता या लेखक के अभिप्राय को ही समझने का प्रयत्‍न करना । जबरदस्‍ती उसके अर्थ को घुमाने का प्रयत्‍न न करना । वक्‍ता या लेखक के अभिप्राय का गला घोंटकर अपनी मान्‍यता व पक्ष के अनुकूल बनाने का प्रयत्‍न न करना । तत्व को अनेकों दृष्टियों से समझाया जायेगा । सब दृष्टियों को पृथक-पृथक जानकर ज्ञान में उनका सम्मिश्रण कर लेना । किसी दृष्टि का भी निषेध करने का प्रयत्‍न न करना अथवा किसी एक ही दृष्टि का आवश्‍यकता से अधिक पोषण करने के लिये शब्‍दों में खेंचतान न करना । ऐसा करने से अन्‍य दृष्टियों का निषेध ही हो जायेगा तथा अन्‍य भी अनेकों बातें हैं जो पक्षपात के अधीन पड़ी हैं । उन मत को उगल डालना । समन्‍वयात्‍मक दृष्टि बनाना, साम्‍यता धारण करना । इसी में निहित है तुम्‍हारा हित और तभी समझा या समझाया जा सकता है तत्व । उपरोक्‍त इन सर्व पाँचों कारणों का अभाव हो जाये तो ऐसा नहीं हो सकता कि तुम धर्म के उस प्रयोजन को व उसकी महिमा को ठीक-ठीक जान न पाओ और जानकर उससे इस जीवन में कुछ नवीन परिवर्तन लाकर किंचित इसके मिष्‍ठ फल की प्राप्ति न कर लो और अपनी प्रथम की ही निष्‍प्रयोजन धार्मिक क्रियाओं के रहस्‍य को समझकर उन्‍हें सार्थक न बनालो ।
  8. ७. वैज्ञानिक बन – जैसाकि आगे स्‍पष्‍ट हो जायेगा, धर्म का स्‍वरूप साम्‍प्रदायिक नहीं वैज्ञानिक है । अंतर केवल इतना है कि लोक में प्रचलित विज्ञान भौतिक विज्ञान है और यह है आध्‍यात्मिक विज्ञान । धर्म की खोज तुझे एक वैज्ञानिक बनकर करनी होगी, साम्‍प्रदायिक बनकर नहीं । स्‍वानुभव के आधार पर करनी होगी, गुरूओं के आश्रय पर नहीं । अपने ही अंदर से तत्‍संबंधी ‘क्‍या’ और ‘क्‍यों’ उत्‍पन्‍न करके तथा अपने ही अंदर से उसका उत्‍तर लेकर करनी होगी, किसी से पूछकर नहीं । गुरू जो संकेत दे रहे हैं, उनको जीवन पर लागू करके करनी होगी, केवल शब्‍दों में नहीं । तुझे एक फिलास्‍फर बनकर चलना होगा, कूपमंडूक बनकर नहीं । स्‍वतंत्र वातावरण में जाकर विचारना होगा, साम्‍प्रदायिक बंधनों में नहीं । देख एक वैज्ञानिक का ढंग, और सीख कुछ उससे । अपने पूर्व के अनेकों वैज्ञानिकों व फिलास्‍फरों द्वारा स्‍वीकार किये गये सर्व ही सिद्धांतों को स्‍वीकार करके, उसका प्रयोग करता है। वह अपनी प्रयोगशाला में, और एक आविष्‍कार निकाल देता है । कुछ अपने अनुभव भी सिद्धांत के रूप में लिख जाता है, पीछे आने वाले वैज्ञानकों के लिये और वे पीछे वाले भी इसी प्रकार करते हैं । सिद्धांत में बराबर वृद्धि होती चली जा रही है, परन्‍तु कोई भी अपने से पूर्व सिद्धांत को झूठा मानकर ‘उसको मैं नहीं पढूंगा’ ऐसा अभिप्राय नहीं बनाता । सब ही पीछे-पीछे वाले अपने से पूर्व-पूर्व वालों के सिद्धांतों का आश्रय लेकर चलते हैं । उन पूर्व में किये गये अनुसंधानों को पुन: नहीं दोहराते । इसी प्रकार तुझे भी अपने पूर्व में हुये प्रत्‍येक ज्ञानों के, चाहे वह किसी नाम व सम्‍प्रदाय का क्‍यों न हो । अनुभव और सिद्धांतों से कुछ न कुछ सीखना चाहिये, कुछ न कुछ शिक्षा लेनी चाहिये । बाहर से ही, केवल इस आधार पर कि ‘तेरे गुरू ने तुझे अमुक बात, अमुक ही शब्‍दों में नहीं बताई है’ उनके सिद्धांतों को झूठा मानकर, उनसे लाभ लेने की बजाय उनसे द्वेष करना योग्‍य नहीं है । वैज्ञानिकों का यह कार्य नहीं है । जिस प्रकार प्रत्‍येक वैज्ञानिक जो जो सिद्धांत बनाता है, उसका आधार कोई कपोल कल्‍पना मात्र नहीं होता, बल्कि होता है उसका अपना अनुभव, जो वह अपनी प्रयेगशाला में प्रयोग-विशेषक के द्वारा प्राप्त करता है । पहले स्‍वयं प्रयोग करके उसका अनुभव करता है और फिर दूसरों के लिये लिख जाता है, अपने अनुभव को । कोई चाहे तो उससे लाभ उठा ले, न चाहे तो न उठाये । परन्‍तु वह सिद्धांत स्‍व्‍ायं एक सत्‍य ही रहता है, एक ध्रुव सत्‍य । इसी प्रकार अनेक ज्ञानियों ने अपने जीवन की प्रयोगशालाओं में प्रयोग किये, उस धर्म सम्बंधी अभिप्राय की पूर्ति के मार्ग में । कुछ उसे पूर्ण कर पाये और कुछ न कर पाये, बीच में ही मृत्‍यु की गोद में जाना पड़ा । परन्‍तु जो कुछ भी उन सबने अनुभव किया या जो-जो प्रक्रियायें उन्‍होंने उन-उन प्रयोगों में स्वयं अपनाईं, वे लिख गये हमारे हित के लिए कि हम भी इनमें से कुछ तथ्‍य समझकर अपने प्रयोग में कुछ सहायता ले सकें । सहायता लेना चाहें तो लें, और न लेना चाहे तो न लें परन्‍तु वे सिद्धांत सत्‍य हैं, परम सत्‍य । इस मार्ग में इतनी कमी दुर्भाग्‍यवश अवश्‍य रहती है, जो कि वैज्ञानिक मार्ग में देखने में नहीं आती और वह यह है कि यहाँ कुछ स्‍वार्थी अनुभवविहीन ज्ञानाभिमानी जन विकृत कर देते हैं । उन सिद्धांतों को, पीछे से कुछ अपनी धारणायें उसमें मिश्रण करके और वैज्ञानिक मार्ग में ऐसा होने नहीं पाता । पर फिर भी वे विकृतियां दूर की जा सकती हैं । कुछ अपनी बुद्धि से, अपने अनुभव के आधार पर । भो जिज्ञासु ! तनिक विचार तो सही कि कितना बड़ा सौभाग्‍य है तेरा कि उन उन ज्ञानियों ने जो बातें बड़े बलिदानों के पश्चात् बड़े परिश्रम से जानीं, बिना किसी मूल्‍य के दे गये तुझे । अर्थात् बड़े परिश्रम से बनाया हुआ अपना भोजन परोस गये तुझे । और आज भूखा होते हुये भी तथा उनके द्वारा परोसा यह भोजन सामने रखा होते हुये भी तू खा नहीं रहा है इसे, कुछ संशय के कारण या साम्‍प्रदायिक विद्वेष के कारण, जिसका आधार है केवल पक्षपात । तुझसा मूर्ख कौन होगा ? तुझसा अभागा कौन होगा ? भो जिज्ञासु ! अब इस विष को उगल दे और सुन कुछ नई बात, जो आज तक सम्‍भवत: नहीं सुनी है और सुनी भी हो तो समझी नहीं है । सर्वदर्शनकारों के अनुभव का सार, और स्‍वयं मेरे अनुभव का सार, जिसमें न कहीं है किसी का खण्‍डन और न है निज की बात का पक्ष । वैसा वैसा स्‍वयं अपने जीवन में उतारकर उसकी परीक्षा कर । बताये अनुसार ही फल हो तो ग्रहण कर लें और वैसा फल न हो तो छोड़ दें । पर वाद-विवाद किसके लिये और क्‍यों? बाजार का सौदा है मर्जी में आये तो ले और न आये तो न ले, यह एक नि:स्‍वार्थ भावना है । तेरे कल्‍याण की भावना और कुछ नहीं । कुछ लेना देना नहीं तुझसे । तेरे अपने कल्‍याण की बात है । निज हित के लिये एक बार सुन तो सही, तुझे अच्‍छी लगे बिना न रहेगी । क्‍यों अच्‍छी न लगे तेरी अपनी बात है- घर बैठे बिना परिश्रम के मिल रही हैं तुझे, इससे बड़ा सौभाग्‍य और क्‍या हो सकता है? निज हित के लिये अब पक्षपात की दाह में इसकी अवहैलना मत कर ।
  9. ६. महाविघ्‍न पक्षपात – धर्म के प्रयोजन व महिमा को जानने या सीखने सम्बंधी बात चलती है, अर्थात़ धर्म सम्बंधी शिक्षण की बात है । वास्‍तव में यह जो चलता है, इसे प्रवचन न कहकर शिक्षणक्रम नाम देना अधिक उपयुक्‍त है । किसी भी बात को सीखने या पढ़ने में क्‍या-क्‍या बाधक कारण होते हैं उनकी बात है । पाँच कारण बताये गये थे । उनमें से चार की व्‍याख्‍या हो चुकी, जिस पर से यह निर्णय कराया गया कि यदि धर्म का स्‍वरूप जानना है और उससे कुछ काम लेना है तो १- उसके प्रति बहुमान व उत्‍साह उत्‍पन्‍न कर, २-निर्णय करके यथार्थ वक्‍ता से उसे सुन, ३- अक्रमरूप न सुनकर ‘क’ से ‘ह’ तक क्रम पूर्वक सुन, ४- धैर्य धारकर बिना चूक प्रतिदिन महीनों तक सुन । अब पाँचवें बाधक कारण की बात चलती है, वह है वक्‍ता व श्रोता का पक्षपात । वास्‍तव में यह पक्षपात बहुत घातक है । इस मार्ग में साधारणत: यह उत्‍पन्‍न हुये बिना नहीं रहता । कारण पहले बताया जा चुका है । पूरा वक्‍तव्‍य क्रमपूर्वक न सुनना ही उस पक्षपात का मुख्‍य कारण है । थोड़ा जानकर, ‘मैं बहुत कुछ जान गया हूँ’ ऐसा अभिमान अल्‍पज्ञ जीवों में स्‍वभावत: उत्‍पन्‍न हो जाता है । जो आगे जानने की उसे आज्ञा नहीं देता । वह ‘जो मैंने जाना सो ठीक है, तथा जो दूसरे ने जाना सो झूठ है ।’ और दूसरा भी ‘जो मैंने जाना सो ठीक तथा जो आपने जाना सो झूठ’ एक इसी अभिप्राय को धार परस्‍पर लड़ने लगते हैं, शास्‍त्रार्थ करते हैं, वाद-विवाद करते हैं । उस वाद-विवाद को सुनकर कुछ उसकी रूचि के अनुकूल व्‍यक्ति उसके पक्ष का पोषण करने लगते हैं तथा दूसरे की रूचि के अनुकूल व्‍यक्ति दूसरे के पक्ष का । उसके अतिरिक्‍त कुछ साधारण व भोले व्‍यक्ति भी जो उसकी बात को सुनते हैं, उसके अनुयायी बन जाते हैं और जो दूसरे की बात को सुनते हैं, वे दूसरे के बिना इस बात को जाने कि इन दोनों में-से कौन क्‍या कह रहा है? और इस प्रकार निर्माण हो जाता है, सम्‍प्रदायों का, जो वक्‍ता की मृत्‍यु के पश्‍चात् भी परस्‍पर लड़ने में ही अपना गौरव समझते रहते हैं और हित का मार्ग न स्‍वयं खोज सकते हैं और न दूसरों को दर्शा सकते हैं । मजे की बात यह है कि यह सब लड़ाई होती है धर्म के नाम पर । यह दुष्‍ट पक्षपात कई जाति का होता है । उनमें से मुख्‍य दो जाति हैं- एक अभिप्राय का पक्षपात तथा दूसरा शब्‍द का पक्षपात । अभिप्राय का पक्षपात तो स्‍वयं वक्‍ता तथा उसके श्रोता दोनों के लिये घातक है और शब्‍द का पक्षपात केवल श्रोताओं के लिए । क्‍योंकि इस पक्षपात में वक्‍ता का अपना अभिप्राय तो ठीक रहता है, पर बिना शब्‍दों में प्रगट हुए श्रोता बेचारा कैसे जान सकेगा उसके अभिप्राय को? अत: वह अभिप्राय में भी पक्षपात धारण करके, स्‍वयं वक्‍ता के अंदर में पड़े हुये अनुक्‍त अभिप्राय का भी विरोध करने लगता है । यदि विषय को पूर्ण सुन व समझ लिया जाये तो कोई भी विरोधी अभि‍प्राय शेष न रह जाने के कारण पक्षपात को अवकाश नहीं मिल सकता । इस पक्षपात का दूसरा कारण है श्रोता की अयोग्‍यता, उसकी स्‍मरण शक्ति की हीनता, जिसके कारण कि सारी बात सुन लेने पर भी बीच-बीच में कुछ-कुछ बात तो याद रह जाती है उसे और कुछ-कुछ भूल जाता है वह और इस प्रकार एक अखंडित धारावाही अभिप्राय खण्डित हो जाता है, उसके ज्ञान में । फल वही होता है जो कि अक्रम रूप से सुनने का है । पक्षपात का तीसरा कारण है व्‍यक्ति-विशेष के कुल में परम्‍परा से चली आई कोई मान्‍यता या अभिप्राय । इस कारण का तो कोई प्रतिकार ही नहीं है । भाग्‍य ही कदाचित् प्रतिकार बन जाये तथा अन्‍य भी अनेकों कारण हैं, जिनका विशेष विस्‍तार करना यहाँ ठीक सा नहीं लगता । हमें तो यह जानना है कि निज कल्‍याणार्थ धर्म का स्‍वरूप कैसे समझें? धर्म का स्‍वरूप जानने से पहले इस पक्षपात को तिलांजली देकर यह निश्चय करना चाहिये कि धर्म सम्‍प्रदाय की चार दीवारी से दूर किसी स्‍वतंत्र दृ‍ष्टि में उत्‍पन्‍न होता है, स्‍वतंत्र वातावरण में पलता है व स्‍वतंत्र वातावरण में ही फल देता है । यद्यपि सम्‍प्रदायों को आज धर्म के नाम से पुकारा जाता है परन्‍तु वास्‍तव में यह भ्रम है । पक्षपात का विषैला फल है । सम्‍प्रदाय कोई भी क्‍यों न हो धर्म नहीं हो सकता । सम्‍प्रदाय पक्षपात को कहते हैं और धर्म स्‍वतंत्र अभिप्राय को कहते हैं जिसे कोई भी मनुष्‍य, किसी भी सम्‍प्रदाय में उत्‍पन्‍न हुआ, छोटा या बड़ा, गरीब या अमीर, यहाँ तक कि तिर्यंच भी, सब धारण कर सकते हैं; जबकि सम्‍प्रदाय इसमें अपनी टांग अड़ाकर, किसी को धर्म पालन करने का अधिकार देता है और किसी को नहीं देता । आज के जैन-सम्‍प्रदाय का धर्म भी वास्‍तव में धर्म नहीं है, सम्‍प्रदाय है, एक पक्षपात है । इसके अधीन क्रियाओं में ही कूपमण्‍डूक बनकर बर्तने में कोई हित नजर नहीं आता । पहले कभी नहीं सुनी होगी ऐसी बात और इसलिये कुछ क्षोभ भी सम्‍भवत: आ गया हो । धारणा-पर ऐसी सीधी व कड़ी चोट कैसे सहन की जा सकती है? यह धर्म तो सर्वोच्‍च धर्म है न जगत का ? परन्‍तु क्षोभ की बात नहीं है भाई ! शान्‍त हो । तेरा यह क्षोभ ही तो वह पक्षपात है, साम्‍प्रदायिक पक्षपात जिसका निषेध कराया जा रहा है । इस क्षोभ से ही तो परीक्षा हो रही है तेरे अभिप्राय की । क्षोभ को दबा, आगे चलकर स्‍वयं समझ जायेगा कि कितना सार था तेरे इस क्षोभ में । अब जरा विचार कर कि क्‍या धर्म ही कहीं उंचा या नीचा होता है ? बड़ा और छोटा होता है ? अच्‍छा या बुरा होता है ? धर्म तो धर्म होता है उसका क्‍या उँचा-नीचापना ? उसका क्‍या जैन व अजैनपना ? क्‍या वैदिकपना व मुसलमानपना ? धर्म तो धर्म है, जिसने जीवन में उतारा उसे हितकारक ही है, जैसा कि आगे के प्रकरणों से स्‍पष्‍ट हो जायेगा । उस हित को जानने के लिये कुछ शान्‍तचित्‍त होकर सुन । पक्षपात को भूल जा थोड़ी देर के लिये । तेरे क्षोभ के निवारणार्थ यहाँ इस विषय पर थोड़ा और प्रकाश डाल देना उचित समझता हूँ । किसी मार्ग विशेष पर श्रद्धा न करने का नाम सम्‍प्रदाय नहीं है । सम्‍प्रदाय तो अन्‍तरंग के किसी विशेष अभिप्राय का नाम है, जिसके कारण कि दूसरों की धारणाओं के प्रति कुछ अदेखसकासा भाव प्रकट होने लगता है । इस अभिप्राय को परीक्षा करके पकड़ा जा सकता है, शब्‍दों में बताया नहीं जा सकता । कल्‍पना कीजिये कि आज मैं यहाँ इस गद्दी पर कोई ब्रह्माद्वैतवाद का शास्‍त्र ले बैठूं और उसके आधार पर आपको कुछ सुनाना चाहूँ, तो बताइये आपकी अन्‍तरवृत्ति क्‍या होगी ? क्‍या आप उसे भी इसी प्रकार शान्ति‍ व रूचि पूर्वक सुनना चाहेंगे, जिस प्रकार कि इसे सुन रहे हैं? सम्‍भवत: नहीं । यदि मुझसे लड़ने न लगें तो, या तो यहाँ से उठकर चले जाओगे और या बैठकर चुपचाप चर्चा करने लगोगे या ऊँघने लगोगे और या अंदर ही अंदर कुछ कुढ़ने लगोगे, ‘‘सुनने आये थे जिनवाणी और सुनने बैठ गये अन्‍य मत की कथनी ।’’ बस इसी भाव का नाम है साम्‍प्रदायिकता । इस भाव का आधार है गुरू का पक्षपात अर्थात् जिनवाणि की बात ठीक है, क्‍योंकि मेरे गुरू ने कहीं है और यह बात झूठ है क्‍योंकि अन्‍य के गुरू ने कहीं है । यदि जिनवाणी की बात को भी युक्ति व तर्क द्वारा स्‍वीकार करने का अभ्‍यास किया होता, तो यहाँ भी उसी अभ्‍यास का प्रयोग करते । यदि कुछ बात ठीक बैठ जाती तो स्‍वीकार कर लेते, नहीं तो नहीं । इसमें क्षोभ की क्‍या बात थी? बाजार में जायें, अनेक दुकानदार आपको अपनी और बुलायें, आप सबकी ही तो सुन लेते हैं । किसी से क्षोभ करने का तो प्रश्‍न उत्‍पन्‍न ही नहीं होता । किसी से सौदा पटा तो ले लिया, नहीं पटा तो आगे चल दिये । इसी प्रकार यहाँ क्‍यों नहीं होता ? बस इस अदेखसके भाव को टालने की बात कहीं जा रही है । मार्ग के प्रति तेरी जो श्रद्धा है, उसका निषेध नहीं किया जा रहा है । युक्ति व तर्कपूर्वक समझने का प्रयास हो तो सब बातों में से तथ्‍य निकाला जा सकता है । भूल भी कदापि नहीं हो सकती । यदि श्रद्धान सच्‍चा है तो उसमें बाधा भी नहीं आ सकती, सुनने से डर क्‍यों लगता है? परन्‍तु ‘क्‍योंकि मेरे गुरू ने कहा है इसलिये सत्‍य है’ तेरे अपने कल्‍याणार्थ इस बुद्धि का निषेध किया जा रहा है । वैज्ञानिकों का यह मार्ग नहीं है । वे अपने गुरू की बात को भी बिना युक्ति के स्‍वीकार नहीं करते । यदि अनुसंधान या अनुभव में कोई अंतर पड़ता प्रतीत होता है तो युक्ति द्वारा ग्रहण की हुई को भी नहीं मानते हैं । बस तथ्‍य की यथार्थता को पकड़ना है । तो इसी प्रकार करना होगा । गुरू के पक्षपात से सत्‍य का निर्णय ही न हो सकेगा, अनुभव तो दूर की बात है । अपनी दही को मीठी बताने का नाम सच्‍ची श्रद्धा नहीं है । वास्‍तव में मीठी हो तथा उसके मिठास को चखा हो, तब उसे मीठी कहना सच्‍ची श्रद्धा है । देख एक दृष्‍टांत देता हूँ । एक जौहरी था उसकी आयु पूर्ण हो गई । पुत्र था, तो पर निखट्टू। पिताजी की मृत्‍यु के पश्चात् अलमारी खोली और कुछ जेवर निकालकर ले गया अपने चाचा के पास । ‘चचाजी, इन्‍हें बिकवा दीजिये ।’ चचा भी जौहरी था, सब कुछ समझ गया । कहने लगा बेटा ! आज न बेचो इन्‍हें, बाजार में ग्राहक नहीं हैं । बहुत कम दाम उठेंगे । जाओ जहाँ से लाये हो वहीं रख आओ इन्‍हें और मेरी दुकान पर आकर बैठा करो, घर का खर्चा दुकान से उठा लिया करो । वैसा ही किया और कुछ महीनों के पश्चात् पूरा जौहरी बन गया वह । अब चाचा ने कहा, ‘कि बेटा ! जाओ आज ले आओ वे जेवर । आज ग्राहक है बाजार में ।’ बेटा तुरन्‍त गया, अलमारी खोली और जेवर के डब्‍बे उठाने लगा । पर हैं ! यह क्‍या? एक डब्‍बा उठाया, रख दिया वापिस; दूसरा उठाया रख दिया वापिस; और इसी तरह तीसरा, चौथा आदि सब डब्‍बे ज्‍यों के त्‍यों अलमारी में रख दिये, अलमारी बन्‍द की और चला आया खाली हाथ दुकान पर, निराशा में गर्दन लटकाये, विकल्‍प सागर में डूबा, वह युवक । ‘‘जेवर नहीं लाये बेटा?’’ चाचा ने प्रश्‍न किया और एक धीमी सी, लज्जित सी आवाज निकली युवक के कण्‍ठ से ‘‘क्षमा करो चाचा, भूला था भ्रम था । वह सब तो कांच है, मैं हीरे समझ बैठा था उन्‍हें अज्ञानवश । आज आप से ज्ञान पाकर आँखें खुल गई हैं, मेरी |’’ बस इसी प्रकार तेरे भ्रम की, पक्षपात की सत्‍ता उसी समय तक है, जब तक कि धैर्यपूर्वक कुछ महीनों-तक बराबर उस विशाल तत्व को सुन व समझ नहीं लेता उस सम्‍पूर्ण को यथार्थ रीत्‍या समझ लेने के पश्चात् तू स्‍वयं लज्जित हो जायेगा, हंसेगा अपने ऊपर ।
  10. ५. श्रोता के दोष - ऊपर बताये गये दोष के अतिरिक्‍त श्रोता में और भी कई दोष हैं जिनके कारण प्रमाणिक व योग्‍य वक्‍ता मिलने पर भी वह उसके समझने में असमर्थ रहता है । उन दोषों में से मुख्‍य है- उसका अपना पक्षपात, जो किसी अप्रमाणिक अथवा अयोग्‍य वक्‍ता का विवेचन सुनने के कारण उसमें उत्‍पन्‍न हो गया है अथवा प्रमाणिक और योग्‍य वक्‍ता के विवेचन को अधूरा सुनने के कारण उसमें उत्‍पन्‍न हो गया है अथवा पहले से ही बिना किसी का सिखाया कोई अभिप्राय उसमें पड़ा है । यह पक्षपात वस्‍तु-स्‍वरूप जानने के मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है । क्‍योंकि इस पक्षपात के कारण अव्‍वल तो अपनी रूचि या अभिप्राय से अन्‍य कोई बात उसे रुचती ही नहीं और इसलिये ज्ञानी की बात सुनने का प्रयत्‍न ही नहीं करता वह आौर यदि किसी की प्रेरणा से सुनने भी चला जाये, तो समझने की दृष्टि की बजाय सुनता है वाद-विवाद की दृष्टि से, शास्‍त्रार्थ की दृष्टि से, दोष चुनने की दृष्टि से । अपनी रूचि के विपरीत कोई बात आई नहीं कि पड़ गया उस बेचारे के पीछे, हाथ धोकर तथा अपने अभिप्राय के पोषक कुछ प्रमाण उस ही के वक्‍तव्‍य में से छांटकर, पूर्वापर मेल बैठाने का स्‍वयं प्रयत्‍न न करता हुआ, बजाय स्‍वयं समझने के समझाने लगा वक्‍ता को । ‘‘वहाँ देखो तुमने या तुम्‍हारे गुरू ने ऐसी बात कहीं है या लिखी है और यहाँ उससे उल्‍टी बात कह रहे हो’’? और प्रचार करने लगता है लोक में इस अपने पक्ष का तथा विरोध का । फल निकलता है तीव्र द्वेष । श्रोता का दूसरा दोष है धैर्य-हीनता । चाहता है कि तुरन्‍त ही कोई सब कुछ बता दे । एक राजा को एक बार कुछ हठ उपजी । कुछ जौहरियों को दरबार में बुलाकर उनसे बोला कि मुझे रत्‍न की परीक्षा करना सिखा दीजिये, नहीं तो मृत्‍यु का दण्ड भोगिये । जौहरियों के पांव तले धरती खिसक गई । असमंजस में पड़े सोचते थे कि एक वृद्ध जौहरी आगे बढ़ा । बोला कि ‘‘मैं सिखाऊँगा पर एक शर्त पर । वचन दो तो कहूँ ।’’ राजा बोला, ‘‘स्‍वीकार है, जो भी शर्त होगी पूरी करूँगा ।’’ वृद्ध बोला, ‘‘गुरू-दक्षिणा पहले लूंगा ।’’ हाँ हाँ तैयार हूँ, मांगो क्‍या मांगते हो? जाओ कोषाध्यक्ष ! दे दो सेठ साहब को लाख करोड़ जो भी चाहिये ।’’ वृद्ध बोला ‘‘कि राजन् ! लाख करोड़ नहीं चाहिये बल्कि जिज्ञासा है, राजनीति सीखने की और वह भी अभी इसी समय । शर्त पूरी कर दी जाये और रत्‍न-परीक्षा की विद्या ले लीजिये ।’’ ‘‘परन्‍तु यह कैसे संभव है’’, राजा बोला, ‘‘राजनीति इतनी सी देर में थोड़े ही सिखाई जा सकती है? वर्षों हमारे मंत्री के पास रहना पड़ेगा ।’’ ‘‘बस तो रत्‍न परीक्षा भी इतनी जल्‍दी थोड़े ही बताई जा सकती है ? वर्षों रहना पड़ेगा दुकान पर’’ और राजा को अकल आ गई । इसी प्रकार धर्म सम्बंधी बात भी कोई थोड़ी देर में सुनना या सीखना चाहे तो यह बात असम्‍भव है । वर्षों रहना पड़ेगा ज्ञानी के संग में अथवा वर्षों सुनना पड़ेगा उसके वि‍वेचन को । जब स्‍थूल, प्रत्‍यक्ष, इन्द्रिय-गोचर, लौकिक बातों में भी यह नियम लागू होता है तो सूक्ष्‍म, परोक्ष, इन्द्रिय-अगोचर, अलौकिक बात में क्‍यों लागू न होगा? इसका सीखना तो और भी कठिन है । अत: भो जिज्ञासु ! यदि धर्म का प्रयोजन व उसकी महिमा का ज्ञान करना है तो धैर्यपूर्वक वर्षों तक सुनना होगा, शांत भाव से सुनना होगा और पक्षपात व अपनी पूर्व की धारणा को दबाकर सुनना होगा ।
  11. ४. विवेचन के दोष - तीसरा कारण है विवेचन की अक्रमिकता । अर्थात् यदि कोई अनुभवी ज्ञानी भी मिला और सरल भाषा में समझाना भी चाहा तो भी अभ्‍यास न होने के कारण या पढ़ाने का ठीक ठीक ढंग न आने के कारण या पर्याप्‍त समय न होने के कारण क्रम पूर्वक विवेचन कर न पाया, क्‍योंकि उस धर्म का स्‍वरूप बहुत विस्‍तृत है, जो थोड़े समय में या थोड़े दिनों में ठीक-ठीक हृदयंगत कराया जाना शक्‍य नहीं है । भले ही वह स्‍वयं उसे ठीक-समझता हो, पर समझने और समझाने में अंतर है । समझा एक समय में जा सकता है और समझाया जा सकता है क्रमपूर्वक काफी लम्‍बे समय में । समझाने के लिये ‘क’ से प्रारम्‍भ करके ‘ह’ तक क्रमपूर्वक धीरे-धीरे चलना होता है, समझने वाले की पकड़ के अनुसार । यदि जल्‍दी करेगा तो उसका प्रयास विफल हो जायेगा । क्‍योंकि अनभ्‍यस्‍त श्रोता बेचारा इतनी जल्‍दी पकड़ने में समर्थ न हो सकेगा । इसलिेये इतने झंझट से बचने के लिये, तथा श्रोता समझता है या नहीं इस बात की परवाह किये बिना अधिकतर वक्‍ता, अपनी रूचि के अनुसार पूरे विस्‍तार में से बीच-बीच के कुछ विषयों का विवेचन कर जाते हैं और श्रोताओं के मुख से निकली वाह-वाह से तृप्‍त होकर चले जाते हैं । श्रोता के कल्‍याण की भावना नहीं है उन्‍हें, है केवल इस ‘वाह-वाह’ की । क्‍योंकि इस प्रकार सब कुछ सुन लेने पर भी वह तो रह जाता है कोरा का कोरा । उस बेचारे का दोष भी क्‍या है ? कहीं-कहीं के टूटे हुए वाक्‍यों या प्रकरणों से अभिप्राय का ग्रहण हो भी कैसे सकता है ? और यदि बुद्धि तीव्र है श्रोता की तो इस अक्रमिक वि‍वेचन को पकड़ तो लेगा पर वह खण्डित पकड़ उसके किसी काम न आ सकेगी । उल्‍टा उसमें कुछ पक्षपात उत्‍पन्‍न कर देगी, उन प्रकरणों का, जिन्‍हें कि वह पकड़ पाया है और वह द्वेषवश काट करने लगेगा उन प्रकरणों की, जिन्‍हें कि वह या तो सुनने नहीं पाया, और यदि सुना भी हो तो पूर्वोत्‍तर मेल न बैठने के कारण एक दूसरे के सहवर्तीपनको जान नहीं पाया । दोनों को पृथक-पृथक अवसरों पर लागू करने लगा और प्रत्‍येक अवसर पर दूसरे का मेल न बैठने के कारण काट करने लगा उसकी । इस प्रकार कल्‍याण की बजाय कर बैठा अकल्‍याण; हित की बजाय कर बैठा अहित, प्रेम की बजाय कर बैठा द्वेष । अथवा यदि सौभाग्‍यवश कोई अनुभवी वक्‍ता भी मिला और क्रमपूर्वक विवेचन भी करने लगा, तो श्रोता को बाधा हो गई । अधिक समय तक सुनने की क्षमता न होने के कारण या परिस्थितिवश प्रतिदिन न सुनने के कारण या अपने किसी पक्षपात के कारण किसी श्रोता ने सुन लिया उस संपूर्ण विवेचन का एक भाग और किसी ने सुन लिया उसका दूसरा भाग । फल क्‍या हुआ? वही जो कि अक्रमिक विवेचन में बताया गया । अन्‍तर केवल इतना ही है कि वहाँ वक्‍ता में अक्रमिकता थी और यहाँ है श्रोता में । वहाँ वक्‍ता दोष था और यहाँ है श्रोता का । परन्‍तु फल वही निकला पक्षपात, वाद-विवाद तथा अहित ।
  12. ३. वक्‍ता की प्रमाणिकता - ‘धर्म का प्रयोजन व उसकी महिमा क्‍या है ?’ यह समस्‍या है, उसको सुलझाने के पाँच कारण बतलाये गये थे कल । पहिला कारण था इस विषय को फोकट का समझना तथा उसको रूचि पूर्वक न सुनना । उसका कथन हो चुका । अब दूसरे कारण का कथन चलता है । दूसरा कारण है वक्‍ता की अपनी अप्रमाणिकता । आज तक धर्म की बात कहने वाले अनेक मिले, पर उनमें से अधिकतर वास्‍तव में ऐसे थे, कि जिन बेचारों को स्‍वयं उसके सम्बंध में कुछ खबर न थी । और यदि कुछ जानकार भी मिले, तो उनमें से अधिकतर ऐसे थे जिन्‍होंने शब्‍दों में तो यथार्थ धर्म के सम्बंध में कुछ पढ़ा था, शब्‍दों में कुछ जाना भी था, पर स्‍वयं उसका स्‍वाद नहीं चखा था । अव्‍वल तो कदापि ऐसा मिला ही नहीं, जिसने कि उसकी महिमा को जाना हो, और यदि सौभाग्‍यवश मिला भी तो उसकी कथन पद्धति आगम के आधार पर रही । उन शब्‍दों के द्वारा व्‍याख्‍यान करने लगा, जिनके रहस्‍यार्थ को आप जानते न थे, सुनकर समझते तो क्‍या समझते ? ज्ञान की अनेक धारायें हैं । सर्व धाराओं का ज्ञान कि‍सी एक साधारण व्‍यक्ति को होना असंभव है । आज लोक में कोई भी व्‍यक्ति अनाधिकृत विषय के सम्बंध में कुछ बताने को तैयार नहीं होता । यदि किसी सुनार से पूछें कि यह मेरी नब्‍ज तो देखिये, क्‍या रोग है और क्‍या औषध लूँ ? तो कहैगा कि वैद्य के पास जाइये, मैं वैद्य नहीं हूँ, इत्‍यादि । यदि किसी वैद्य के पास जाकर कहूँ कि देखिये तो यह जेवर खोटा है कि खरा ? खोटा है तो कितना खोटा है ? तो अवश्‍य ही यही कहैगा कि सुनार के पास जाओ, मैं सुनार नहीं हूँ, इत्‍यादि । परन्‍तु एक विषय इस लोक में ऐसा भी है, जो आज किसी के लिये भी अनधिकृत नहीं । सब ही मानों जानते हैं उसे । और वह है धर्म । घर में बैठा, राह चलता, मोटर में बैठा, दुकान पर काम करता, मंदिर में बैठा या चौपाल में झाडू लगाता कोई भी व्‍यक्त्‍िा आज भले कुछ और न जानता हो परन्‍तु धर्म के संबंध में अवश्‍य जानता है वह । किसी से पूछिये अथवा वैसे ही कदाचित् चर्चा चल जाये, तो कोई भी ऐसी नहीं है कि इस फोकट की वस्‍तु ‘धर्म’ के सम्बंध में कुछ अपनी कल्‍पना के आधार पर बताने का प्रयत्‍न न करे । भले स्‍वयं उसे यह भी पता न हो कि धर्म किस चिड़िया का नाम है । भले इन शब्‍दों से भी चिड़ हो उसे, पर आपको बताने के लिये वह कभी भी टांग अड़ाये बिना न रहेगा । स्‍वयं उसे अच्‍छा न समझता हो अथवा स्‍वयं उसे अपने जीवन में अपनाया न हो, पर आपको उपदेश देने से न चूकेगा कभी । सोचिये तो, कि क्‍या धर्म ऐसी ही फोकट की वस्‍तु है ? यदि ऐसा ही होता तो सबके सब धर्मी ही दिखाई देते । पाप, अत्‍याचार, अनर्थ आदि शब्‍द व्‍यर्थ हो जाते । परन्‍तु सौभाग्‍यवश ऐसा नहीं है । धर्म फोकट की वस्‍तु नहीं है । यह अत्‍यंत महिमावंत है । सब कोई इसको नहीं जानते । शास्‍त्रों के पाठी बड़े-बडे विद्वान भी सभी इसके रहस्‍य को नहीं पा सकते । कोई बिरला अनुभवी ही इसके पार को पाता है । बस वही हो सकता है प्रमाणिक वक्‍ता । इसके अतिरिक्‍त अन्‍य किसी के मुख से धर्म का स्‍वरूप सुनना ही इस प्राथमिक स्थिति में आपके लिये योग्‍य नहीं । क्‍योंकि अनेक अभिप्रायों को सुनने से, भ्रम में उलझकर झुंझलाये बिना न रह सकोगे । जितने मुख उतनी ही बातें, जितने उपदेश उतने ही आलाप, जितने व्‍यक्ति उतने ही अभिप्राय । सब अपने-अपने अभिप्राय का ही पोषण करते हुये वर्णन कर रहे हैं धर्म स्‍वरूप का । किसकी बात को सच्‍ची समझोगे ? क्‍योंकि सब बातें होंगी । एक दूसरे को झूठा ठहरातीं, परस्‍पर विरोधी । वक्‍ता की किञ्चित् प्रमाणिकता का निर्णय किये बिना जिस किसी से धर्म चर्चा करना या उपदेश सुनना योग्‍य नहीं । परन्‍तु इस अज्ञान दशा में वक्‍ता की प्रमाणिकता का निर्णय कैसे करें ? ठीक है तुम्‍हारा प्रश्‍न । है तो कुछ कठिन काम पर फिर भी संभव है । कुछ बुद्धि का प्रयोग अवश्‍य मांगता है और वह तुम्‍हारे पास है । धेले की वस्‍तु की परीक्षा करने के लिये तो आप में काफी चतुराई है । क्‍या जीवन की रक्षक अत्‍यंत मूल्‍यवान इस वस्‍तु की परीक्षा ना कर सकोगे ? अवश्‍य कर सकोगे । पहिचान भी कठिन नहीं । स्‍थूलत: देखने पर जिसके जीवन में उन बातों की झांकी दिखाई देती हो जो कि वह मुख से कह रहा हो, अर्थात् जिसका जीवन सरल, शांत व दयापूर्ण हो, जिसके शब्‍दों में माधुर्य हो, करूणा हो और सर्व सत्‍व का हित हो, सभ्‍यता हो, जिसके वचनों में पक्षपात की बू न आती हो जो हट्ठी न हो, सम्‍प्रदाय के आधार पर सत्‍यता को सिद्ध करने का प्रयत्‍न न करता हो । वाद-विवाद रूप चर्चा करने से डरता हो, आपके प्रश्‍नों को शांतिपूर्वक सुनने की जिसमें क्षमता हो तथा धैर्य से व कोमलता से उसे समझाने का प्रयत्‍न करता हो, आप की बात सुनकर जिसे क्षोभ न आता हो, जिसके मुख पर मुस्‍कान खेलती हो, विषय भोगों के प्रति जिसे अंदर से कुछ उदासी हो, प्राप्‍त विषयों के भोगने से भी जो घबराता हो तथा उनका त्‍याग करने से जिसे संतोष होता हो, अपनी प्रशंसा सुनकर कुछ प्रसन्‍नसा और अपनी निन्‍दा सुनकर कुछ रुष्‍टसा हुआ प्रतीत न होता हो तथा अन्‍य भी अनेक इसी प्रकार के चिन्‍ह हैं जिनके-द्वारा स्‍थूल-रूप से आप वक्‍ता की परीक्षा कर सकते हैं ।
  13. २. अध्‍ययन के विघ्‍न - न समझने के कारण कई हैं । वे सब कारण टल जायें तो क्‍यों न समझेगा ? पहला कारण है तेरा अपना प्रमाद, जिसके कारण कि तू स्‍वयं करता हुआ भी, अंदर में उसे कुछ फोकट की व बेकार की वस्‍तु समझे हुए है, जिसके कारण कि तू इसके समझने में उपयोग नहीं लगाता; केवल कानों में शब्‍द पड़ने मात्र को सुनना समझता है, वचनों के द्वारा बोलने मात्र को पढ़ना समझता है और आँख के द्वारा देखने मात्र को दर्शन समझता है । दूसरा कारण है वक्‍ता की अप्रमाणिकता । तीसरा कारण है विवेचन की अक्रमिकता । चौथा कारण है विवेचन क्रम का लम्‍बा विस्‍तार जो कि एक दो दिन में नहीं बल्कि महीनों तक बराबर कहते रहने पर ही पूरा होना संभव है । और पाँचवां कारण है श्रोता का पक्षपात । पहिला कारण तो तू स्‍वयं ही है । जिसके सम्बंध में कि ऊपर बता दिया गया है । यदि इस बात को फोकट की न समझकर वास्‍तव में कुछ हित की समझने लगे, कानों में शब्‍द पड़ने मात्र से संतुष्‍ट न होकर वक्‍ता के या उपदेष्‍टा के या शास्‍त्रों के उल्‍लेख के अभिप्राय को समझने का प्रयत्‍न करने लगे, तो धर्म की महिमा अवश्‍य समझ में आ जावे । शब्‍द सुने जा सकते हैं पर अभिप्राय नहीं । वह वास्‍तव में रहस्‍यात्‍मक होता है, परोक्ष होने के कारण और इसीलिये उन–उन वाचक शब्‍दों का ठीक वाच्‍य नहीं बन रहा है । क्‍योंकि किसी भी शब्‍द को सुनकर, उसका अभिप्राय आप तभी तो समझ सकते हैं, जबकि उस पदार्थ को, जिसकी ओर कि वह शब्‍द संकेत कर रहा है, आपने कभी छूकर देखा हो, सूँघ कर देखा हो, आँख से देखा हो अथवा चखकर देखा हो । आज मैं आपके सामने अमरीका में पैदा होने वाले किसी फल का नाम लेने लगूं तो आप क्‍या समझेंगे उसके सम्बंध में ? शब्‍द कानों में पड़ जायेगा और कुछ नहीं । इसी प्रकार धर्म का रहस्‍य बताने वाले शब्‍दों को सुनकर क्‍या समझेंगे आप ? जब तक कि पहले उन विषयों को, जिनके प्रति कि वे शब्‍द संकेत कर रहे हैं, कभी छूकर, सूँघकर, देखकर व चखकर न जाना हो आपने । इसीलिये उपदेश में कहै जाने वाले अथवा शास्‍त्र में लिखे शब्‍द ठीक-ठीक अपने अर्थ का प्रतिपादन करने को वास्‍तव में असमर्थ हैं । वे केवल संकेत कर सकते हैं किसी विशेष दिशा की ओर । यह बता सकते हैं कि अमुक स्‍थान पर पड़ा है आपका अभीष्‍ट । यह भी बता सकते हैं, कि वह आपके लिये उपयोगी है कि अनुपयोगी । परंतु वह पदार्थ आपको किसी भी प्रकार दिखा नहीं सकते । हाँ, यदि शब्‍द के उन संकेतों को धारण करके, आप स्‍वयं चलकर, उस दिशा में जायें, और उस स्‍थान पर पहुंचकर स्‍वयं उसे उपयोगी समझकर चखें, उसका स्‍वाद लें, किसी भी प्रकार से, तो उस शब्‍द के रहस्‍यार्थ को पकड़ अवश्‍य सकते हैं ।
  14. १. कार्य की प्रायोजकता - अहो ! शांति के आदर्श वीतरागी गुरूओं की महिमा, जिसके कारण आज इस निकृष्‍ट काल में भी, जबकि चहुं ओर हाय पैसा हाय धन के सिवाय कुछ सुनाई नहीं देता, कहीं-कहीं इस कचरे में दबी यह धर्म की इच्‍छा दिखाई दे ही जाती है । आप सब धर्म प्रेमी बंधुओं में उसका साक्षात्‍कार हो रहा है । यह सब गुरूओं का ही प्रभाव है। सौभाग्‍य है हम सभी का कि हमें वह आज प्राप्‍त हो रहा है । लोक पर दृष्टि डालकर जब यह अनुमान लगाने जाते हैं कि ऐसे व्‍यक्ति जिनको कि गुरूओं का यह प्रसाद प्राप्‍त हुआ है कितने हैं, तो अपने इस सौभग्‍य के प्रति कितना बहुमान उत्‍पन्‍न होता है अपने अंदर ? सर्वलोक ही तो इस धर्म की भावना से या इसके सम्बंध में सुनने मात्र की भावना से शून्‍य है । आज के लोक को तो यह ‘धर्म’ शब्‍द भी कुछ कड़ुआसा लगता है । ऐसी अवस्‍था में हमारे अंदर धर्म के प्रति उल्‍लास ? सौभाग्‍य है यह हमारा । परंतु कुछ निराशा सी होती है यह देखकर, कि धर्म के प्रति की भावना का यह भग्‍नावशेष क्‍या काम आ रहा है मेरे ? पड़ा है अंदर में यों ही बेकार सा । कुछ दिन के पश्‍चात्‍ विलीन हो जायेगा धीरे-धीरे और मैं भी जा मिलूंगा उन्‍हीं की श्रेणी में जिनको कि इस नाम से चिड़ है । बेकार वस्‍तु का पड़ा रहना कुछ अच्‍छा भी तो नहीं लगता । फिर उसके पड़े रहने से लाभ भी क्‍या है ? समय बरबाद करने के सिवाय निकलता ही क्‍या है उसमें से ? उस भावना के दबाव के कारण कुछ न चाहते हुए भी रूचि न होते हुए भी जाना पड़ता है मंदिर में, या पढ़ता हूँ शास्‍त्र या कभी कभी चला जाता हूँ किसी ज्ञानी के उपदेश में । मैं स्‍वयं नहीं जानता कि क्‍यों ? क्‍या मिलता है वहाँ ? कभी–कभी उपवास भी करता हूँ देखादेखी, पर क्षुधा की पीड़ा में रखा ही क्‍या है ? चलो फिर भी यह सोचकर कि लाभ न सही हानि भी तो कुछ नहीं है, अपनी एक मान्‍यता ही पूरी हो जायेगी, चला जाता हूँ मंदिर में । बाप दादा से चली आ रही मान्‍यता की रक्षा करना भी तो मेरा कर्तव्‍य है ही । भले मूर्ति के दर्शन से कुछ मिल न सकता हो, वह मेरी रक्षा न कर सकती हो मुझपर प्रसन्‍न होकर परंतु कुछ न कुछ पुण्‍य तो होगा ही । भले समझ न पाऊँ, क्‍या लिखा है शास्‍त्र में पर इसे पढ़ने का कुछ न कुछ फल तो मिलेगा ही आगे जाकर, अगले भव में मुझे । इन पण्डित जी ने या इन क्षुल्‍लक महाराज ने या इन ब्रह्मचारी जी ने क्‍या कहा है, भले कुछ न जान पाऊँ, पर कान में कुछ पड़ा ही तो है ? कुछ तो लाभ हुआ ही होगा उसका और इस प्रकार की अनेक धारणाएं धर्म के सम्बंध में होती हैं । निष्‍प्रयोजन उपर्युक्‍त क्रियायें करके संतुष्‍ट हो जाने वाले भो चेतन ! क्‍या कभी विचार किया है इस बात पर कि तू क्‍या कर रहा है, क्‍यों कर रहा है, और इसका परिणाम क्‍या निकलेगा ? लोक में कोई भी कार्य बिना प्रयोजन तू करने को तैयार नहीं होता, यहाँ क्‍यों हो रहा है ? अनेक जाति के व्‍यापार हैं लोक में अनेक जाति के उद्योग धन्‍धे हैं लोक में, परंतु क्‍या तू सब की और ध्‍यान देता है कभी ? उसी के प्रति तो ध्‍यान देता है कि जिससे तेरा प्रयोजन है ? अन्‍य धन्‍धों में भले अधिक लाभ हो पर वह तेरे किस काम का ? किसी भी कार्य को निष्‍प्रयोजन करने में अपने पुरूषार्थ को खोना मूर्खता है । आश्‍चर्य है कि इतना होते हुए भी उस भावना के इस भग्‍नावशेष को कहा जा रहा है तेरा सौभाग्‍य । ठीक है प्रभु ! वह फिर भी तेरा सौभाग्‍य है । क्‍योंकि उन व्‍यक्तियों को तो, जिन्‍हें कि इसका नाम सुनना भी नहीं रुचता इसके प्रयोजन व इसकी महिमा का भान होना ही असम्‍भव है; इसको अपनाकर लाभ उठाने का तो प्रश्‍न ही क्‍या ? परंतु इस तुच्‍छ मात्र निष्‍प्रयोजन भाव के कारण तुझे वह अवसर मिलने का तो अवकाश है ही कि जिसे पाकर तू समझ सकेगा इसके प्रयोजन को व इसकी महिमा को । और यदि कदाचित समझ गया तो, कृतकृत्‍य हो जायेगा तू , स्‍वयं प्रभु बन जायेगा तू । क्‍या यह कोई छोटी बात है ? महान है यह । क्‍योंकि तुझे अवसर प्राप्‍त हो जाते हैं कभी-कभी ज्ञानी जनों के संपर्क में आने के जो बराबर प्रयत्‍न करते रहते हैं तुझे यह समझाने का कि धर्म का प्रयोजन क्‍या है और इसकी महिमा कैसी अद्भुत है । यह अवसर उनको तो प्राप्‍त ही नहीं होता, समझेंगे क्‍या बेचारे ? अनेक बार आज तक तुझे ऐसे अवसर प्राप्‍त हो चुके हैं, पूर्व भवों में, और प्राप्‍त हो रहे हैं आज । बस यही तो तेरा सौभाग्‍य है इससे अधिक कुछ नहीं । ‘‘अनेक बार सुना है मैंने धर्म का स्‍वरूप व उसका प्रयोजन व उसकी महिमा । परंतु सुनकर भी क्‍या समझ पाया हूँ कुछ ? अत: यह सौभाग्‍य भी हुआ न हुआ बराबर ही हुआ’’, ऐसा न विचार । क्‍योंकि अब तक भले न समझ पाया हो, अब की बार अवश्‍य समझ जायेगा, ऐसा निश्‍चय है । विश्‍वास कर, आज वही सौभाग्‍य जाग्रत हो गया है जो पहले सुप्‍त था ।
  15. १. कार्य की प्रयोजकता; २. अध्‍ययन के विघ्‍न; ३. वक्‍ता की प्रमाणिकता; ४. विवेचन के दोष; ५. श्रोता के दोष; ६. महाविघ्‍न पक्षपात; ७. वैज्ञानिक बन; ८. पक्षपात निरसन । चिदानन्‍दैक रूपाय शिवाय परमात्‍मने । परमलोकप्रकाशाय नित्‍यं शुद्धात्‍मने नम: ।। ‘‘नित्‍य शुद्ध उस परमात्‍म तत्व को नमस्‍कार हो, जो परम लोक का प्रकाशक है, कल्‍याण स्‍वरूप है और एक मात्र चिदानन्‍द ही जिसका लक्षण है ।’’ स्‍वदोष-शान्‍त्‍या विहिताऽऽत्‍मशान्ति:, शान्‍तेर्विधाता शरणं गतानाम् । भूयाद्भव-क्‍लेश-भयोपशान्‍त्‍यं:, शान्तिर्जिनो मे भगवान् शरण्‍य: ।। जिन्‍होंने अपने दोषों को अर्थात्‍ अज्ञान तथा काम क्रोधादि को शांत करके अपनी आत्‍मा में शांति स्‍थापित की है, और जो शरणागतों के लिये शांति के विधाता हैं वे शांतिनाथ भगवान्‍ मेरे लिये शरणभूत हों ।
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