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JainSamaj.World
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गजपंथा से बम्बई - ४९


Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,


          बड़ा ही मार्मिक वृत्तांत है पूज्य वर्णीजी के जीवन का। ह्रदय को छू जाने वाला है।

      अद्भुत तीर्थवंदना की भावना उस पावन आत्मा के अंदर। शरीर कृश होने के बाद भी पैदल गजपंथाजी से श्री गिरिनारजी जाने की भावना रख रहे हैं। जिनेन्द्र भक्ति हेतु आत्मबल के आगे जर्जर शरीर का कोई ख्याल ही नहीं था। तीन माह से अच्छी तरह भोजन नहीं हुआ था। 

     हम सभी पाठकों की पूज्य वर्णीजी का जीवन वृत्तांत पढ़कर आँखे भर आना एक सहज सी बात है।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


                *"गजपंथा से बम्बई"*

                     *क्रमांक - ४९*

       पाप के उदय की पराकाष्ठा का उदय यदि देखा तो मैंने देखा। एक दिन की बात है- सधन जंगल में, जहाँ पर मनुष्यों का संचार न था, एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया। वहीं बाजरे के चूनकी लिट्टी लगाई, खाकर सो गया। निद्रा भंग हुई, चलने को उद्यमी हुआ, इतने मे भयंकर ज्वर आ गया। 

         बेहोश पड़ गया। रात्रि के नौ बजे होश आया। भयानक वन में था। सुध-बुध भूल गया। रात्रि भर भयभीत अवस्था में रहा। किसी तरह प्रातःकाल हुआ। श्री भगवान का स्मरण कर मार्ग में अनेक कष्टों की अनुभूति करता हुआ, श्री गजपंथाजी में पहुँच गया और आनंद से धर्मशाला में ठहरा।

       वहीं पर एक आरवी के सेठ ठहरे थे। प्रातःकाल उनके साथ पर्वत की वंदना को चला। आनंद से यात्रा समाप्त हुई। धर्म की चर्चा भी अच्छी तरह हुई।

         आपने कहा- 'कहाँ जाओगे?' मैंने कहा- 'श्री गिरिनारजी की यात्रा को जाऊँगा।' 

कैसे जाओगे?' पैदल जाऊँगा।'

     उन्होंने मेरे शरीर की अवस्था देखकर बहुत ही दयाभाव से कहा- 'तुम्हारा शरीर इस योग्य नहीं'

     मैंने कहा- 'शरीर तो नश्वर है एक दिन जावेगा ही कुछ धर्म का कार्य इससे लिया जावे।'

      वह हँस पड़े और बोले- 'अभी बालक हो, 'शरीर माध्यम खलु धर्मसाधनम्' शरीर धर्म साधन का आद्य कारण है, अतः इसको धर्मसाधन के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।'

      मैंने कहा- 'रखने से क्या होता है? भावना हो तब तो यह बाह्य कारण हो सकता है। इसके बिना यह किस काम का?'

      परंतु वह तो अनुभवी थे, हँस गये, बोले- 'अच्छा इस विषय में फिर बातचीत होगी, अब तो चलें, भोजन करें, आज आपको मेरे ही डेरे में भोजन करना होगा।'

        मैंने बाह्य से तो जैसे लोगों का व्यवहार होता है वैसा ही उनके साथ किया, पर अंतरंग से भोजन करना इष्ट था। स्थान पर आकर उनके यहाँ आनंद से भोजन किया। 

       तीन मास से मार्ग के खेद से खिन्न था तथा जबसे माँ और स्त्री को छोड़ा, मड़ावरा से लेकर मार्ग में आज वैसा भोजन किया। दरिद्र को निधि मिलने में जितना हर्ष होता है उससे भी अधिक मुझे भोजन करने में हुआ।


? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १३?

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