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रामटेक - ४४

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,


          यहाँ पूज्य वर्णीजी ने मिथ्याप्रचार के कारण को स्पष्ट किया है साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जीव को कल्याणकारी आगमा का अभ्यास करना बहुत आवश्यक है।

     कल से वर्णीजी की मुक्तागिरी वंदना हेतु यात्रा का उल्लेख होगा।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


                      *"रामटेक"*

                     *क्रमांक - ४४*

                संसार में जो मिथ्या प्रचार फैल रहा है उसमें मूल कारण रागद्वेष की मलिनता से जो कुछ लिखा गया वह साहित्य है। वही पुस्तकें कालान्तर में धर्मशास्त्र के रूप में मानी जाने लगीं।

      लोग तो अनादिकाल से मिथ्यात्व के उदय में शरीर को आत्मा मानते हैं। जिनको अपना ही बोध नहीं वे पर को क्या जानें? जब अपना पराया ज्ञान नहीं तो कैसे सम्यकदृष्टि? यही श्री समयसार में लिखा है-

'परमाणुमित्तयं पि हु रागादीणं दु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणयं दु सव्वागमधरो वि।।'

      जो सर्वांग को जानने वाला हैं तो वह आत्मा को नहीं जानता है, जो आत्मा को नहीं जानता है वह जीव और अजीव को नहीं जानता वह सम्यकदृष्टि कैसे हो सकता है?

       कहने का तात्पर्य यह कि आगमाभासका अभ्यास जीवादि को जानने में मुख्य कारण है और आगमाभास का अभ्यास जीवादिको अन्यथा जानने में कारण है। जिनको आत्मकल्याण कि लालसा है वे आप्तकथित आगम का अभ्यास करें। विशेष कहाँ तक लिखें?

       क्षेत्रों पर ज्ञान के साधन कुछ नहीं, केवल रुपये इकठ्ठे करने के साधन हैं। कल्पना करो, यह धन यदि एकत्रित होता रहे और व्यय न हो तो अंत में नहीं के तुल्य हुआ। अस्तु, इस कथा से क्या लाभ? यहाँ चार दिन रहा।

? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ५?

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