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रामटेक - ४३

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,


            कल की प्रस्तुती के अंश में वर्णीजी द्वारा वर्णित निश्चय की दृष्टि से प्रभावना को देखा। उन्होंने वर्णन किया कि आत्मीय श्रद्धान, ज्ञान- चारित्र द्वारा निर्मल बनाने का प्रयत्न जिससे अन्य धर्माबलंबियों के ह्रदय में स्वयं समा जाये कि धर्म यह वस्तु है। निश्चय प्रभावना है।

     आज के अंशों में व्यवहार में प्रभावना को वर्णीजी ने स्पष्ट किया है।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


                      *"रामटेक"*

                     *क्रमांक - ४३*

             ऐसा दान करो, जिससे साधारण लोगों का भी उपकार हो। ऐसा विद्यालय खोलो, जिनसे यथाशक्ति सबको लाभ हो। ऐसे औषधालय खोलो, जिसमें शुद्ध औषधों का भंडार हो। ऐसे भोजनालय खोलो, जिनसे शुद्ध भोजन का प्रबंध हो।

        अनाथों को भोजन दो। अनुकम्पा से प्राणीमात्र को दान का निषेध नहीं। अभयदानादि देकर प्राणियों को निर्भय बना दो। ऐसा तप करो, जिसे देखकर कट्टर से कट्टर विरोधियों की श्रद्धा हो जावे।

       श्री जिनेन्द्रदेव की ऐसी ठाठबाट से पूजा करो, जो नास्तिकों के चित्त में भी आस्तिक्य भावों का संचार करें। इसका नाम व्यवहार में प्रभावना है। श्री समंतभद्रस्वामी ने भी कहा है कि-

'अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम्।
जिनशासन महात्म्यप्रकाशः स्यत्प्रभावना।।'

      अज्ञानरूपी अंधकार की व्याप्ति से जगत आच्छन्न है, उसे यथाशक्ति दूरकर जिनशासन के माहात्म्य का प्रकाश करना, इसी का नाम सच्ची प्रभावना है। 

         संसार में अनादिकाल से मोह के वशीभूत होकर प्राणियों ने नाना प्रकार के धर्मों का प्रचार कर रखा है। कहाँ तक इसका वर्णन किया जाए? जीववध करके भी लोग उसे धर्म मानने लगे। जिसे अच्छे लोग पुष्ट करते हैं प्रमाण देते हैं कि शास्त्रों में लिखा है। उसे यहाँ लिखकर मैं आप लोगों का समय नहीं लेना चाहता।

? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ४?

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