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सेठ लक्ष्मीचंद जी - ३१


Abhishek Jain

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☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,

          गणेश प्रसाद ने जिनधर्म पर आस्था के आधार पर अपनी माँ तथा पत्नी के साथ रहना तभी उचित समझा था जब वह लोग भी अपना आचरण जिनधर्म के अनुसार रखें। उन्होंने अपनी माँ को इस हेतु पत्र भी लिखा था।

         आज के प्रस्तुती में उनका अपनी माँ के पास आने का उल्लेख है।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?

             *"सेठ लक्ष्मीचंद जी"*

                    क्रमांक - ३१

             मुझे आया हुआ देख माँ बड़ी प्रसन्न हुई। बोली- 'बेटा ! आ गये?' मैंने कहा- 'हाँ माँ ! आ गया।'

       माँ ने उपदेश दिया- 'बेटा ! आनंद से रहो, क्यों इधर उधर भटकते हो। अपना मौलिक धर्म पालन करो और कुछ व्यापार करो, तुम्हारे काका समर्थ हैं। वे तुम्हे व्यापार की पद्धति सिखा देंगे।'

        मैं माँ की शिक्षा सुनता रहा, परंतु जैसे चिकने घड़े में पानी का प्रवेश नहीं होता वैसे ही मेरे ऊपर उस शिक्षा का कोई असर नहीं हुआ। मैं तीन दिन वहाँ रहा। पश्चात माँ की आज्ञा से बमराना चला गया।

     यहाँ श्री सेठ व्रजलाल, चंद्रभान व श्री लक्ष्मीचंद जी साहब रहते थे। तीनों भाई धर्मात्मा थे। निरंतर पूजा करना, स्वाध्याय करना व आये हुए जैनी को सहभोजन कराना आपका प्रतिदिन का काम था। तब आपके यहाँ चौके में ५० से कम जैनी भोजन नहीं करते थे। कोई विद्वान व त्यागी आपके यहाँ सदा रहता ही था। 

      मंदिर इतना सुंदर था मानों स्वर्ग का चैत्यालय ही  हो। जिस समय तीनों भाई पूजा के लिए खड़े होते थे, उस समय ऐसा मालूम होता था मानों इंद्र ही स्वर्ग से आये हों।

       तीनों भाईयों में परस्पर राम-लक्ष्मण की तरह प्रेम था। मंदिर मे पूजा आदि महोत्सव होते समय चतुर्थ काल का स्मरण हो आता था। स्वाध्याय में तीनों भाई बराबर तत्वचर्चा कर एक घंटा समय लगाते थे। साथ ही अन्य श्रोतागण उपस्थित रहते थे। 

        इन तीनों में लक्ष्मीचंद जी सेठ प्रखर बुद्धि थे। आपको शास्त्र प्रवचन का एक प्रकार से व्यसन ही था। आपकी चित्त व्यत्ति भी निरंतर परोपकार में रत रहती थी।            

? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण ११ ?

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