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?विवेकशून्य भक्ति - 323

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Abhishek Jain

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?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३२३   ?

                "विवेकशून्य भक्ति"

   
       बारामती में एक धुरंधर शास्त्री आए। उन्होंने महराज के चरणों में पुष्प रख दिया। महराज ने पूंछा, "यह क्या किया?"

       वे बोले- "महराज देव, गुरु, शास्त्र समान रूप से पूज्यनीय हैं। देव की पुष्प से पूजा के समान आपकी चरणपूजा की है।

      महराज ने कहा ऐसा करोगे तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा, भगवान के अभिषेक के समान शास्त्र का अभिषेक नहीं किया जाता है। हर एक बात की मर्यादा होती है।"

       अपने वचन के पोषनार्थ में पुनः शास्त्री जी ने पूंछा, "महराज चरणों में पुष्प रखने से क्या बाधा हो गई?"

       महराज ने कहा -"शरीर की उष्णता से जीवों का प्राणघात हो जायेगा, अतः ऐंसा नहीं करना चाहिए।"


? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?

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