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?अंग्रेज अधिकारी का भ्रम निवारण - अमृत माँ जिनवाणी से - २७८


Abhishek Jain

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?   अमृत माँ जिनवाणी से - २७८   ?


    "अंग्रेज अधिकारी का भ्रम निवारण"


            संघ १८ जनवरी सन १९२८ को रायपुर पहुँचा। यहाँ सुंदर जुलूस निकालकर धर्म की प्रभावना की गई। यहाँ अनंतकीर्ति मुनि महराज का केशलोंच भी हुआ था।

              यहाँ के एक अंग्रेज अधिकारी की मेम ने दिगम्बर संघ को देखा, तो उसकी यूरोपियन पध्दति को धक्का सा लगा। उसने तुरंत अपने पति अंग्रेज साहब के समक्ष कुछ जाल फैलाया, जिससे संघ के बिहार में बाधा आए।

              अंग्रेज अधिकारी अनर्थ पर उतर उतारू हो गया था, किन्तु कुछ जैन बंधुओं ने अफसर के पास जाकर मुनिराज के महान जीवन पर प्रकाश डाला और इनकी नग्नता का क्या अंतस्तत्व है यह समझाया तब उसकी दृष्टि बदली और उसने कोई विध्न नहीं किया।

             महराज के पुण्य प्रसाद से विध्न का पहाड़ सतप्रयत्न की फूंक मारने से उड़ गया। कुशलता से कार्य करने पर जो वस्तु प्रारम्भ में अंगुली से टूट जाती है, वही चीज आरोग्य और अकुशल व्यक्तियों का आश्रय पाकर कुठार से भी अछेद्य हो जाती है।


? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?

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