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?वृद्धा की समाधि - अमृत माँ जिनवाणी से - १४०


Abhishek Jain

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?    अमृत माँ जिनवाणी से - १४०    ?


                 "वृद्धा की समाधि"

 
            कुंथलगिरी में सन् १९५३ के चातुर्मास में लोणंद के करीब ६० वर्ष वाली बाई ने १६ उपवास किए थे, किन्तु १५ वे दिन प्रभात में विशुद्ध धर्म-ध्यानपूर्वक उनका शरीरांत हो गया।

          उस वृद्धा के उपवास के बारे में एक बात ज्ञातव्य है। उसने पूज्य शान्तिसागरजी महाराज से १६ उपवास माँगे तब महराज ने कहा- "बाई ! तुम्हारी वृद्धावस्था है। ये उपवास नहीं बनेंगे। उसने आग्रह किया और कहा, महाराज ! मै प्राण दे दूँगी, प्रतिज्ञा भंग नहीं करुँगी। महाराज ने उपवास दे दिए। उस वृद्धा ने प्राण त्याग दिए, किन्तु व्रत भंग नहीं किया। हम स्वयं वहाँ थे। अद्भुत शांति, निर्मलतापूर्वक उसका समाधिमरण हुआ था।

         महराज ने उसके शोकाकुल कुटुम्बियों से कहा था- "हम निश्चय से कहते हैं, उस बाई ने देव पर्याय पाई। इतने उपवास से प्राप्त विशुद्धता और निर्वाण भूमि का योग सामान्य लाभ नहीं है। इसके विषय में तुम लोगों के शोक करने का क्या मतलब?" महाराज के थोड़े से प्रबोधपूर्ण शब्दों ने कुटुम्बियों का सारा दुःख धो दिया था।

?  स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ का  ?

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