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जिनेश्वर के लघुनंदन - अमृत माँ जिनवाणी से - ११७


Abhishek Jain

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?   अमृत माँ जिनवाणी से - ११७   ?


             "जिनेश्वर के लघुनंदन"


              संसार मृत्यु के नाम से घबड़ाता है और उसके भय से नीच से नीच कार्य करने को तत्पर हो जाता है, किन्तु शान्तिसागरजी महाराज मृत्यु को चुनौती दे, उससे युद्ध करते हुए जिनेश्वर के नंदन के समान शोभायमान होते थे।

         जैन शास्त्र कहते हैं कि मृत्यु विजेता बनने के लिए मुमुक्षु को मृत्यु के भय का परित्याग कर उसे मित्र सदृश मानना चाहिए। इसी मर्म को हृदयस्थ करने के कारण आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज ने अपने जीवन की संध्या बेला पर समाधिपूर्वक-शान्त भाव सहित प्राणों का परित्याग करके रत्नत्रय धर्म की रक्षा का सुदृढ़ संकल्प किया था।


? २९ वां दिन - ११ सितम्बर १९५५ ?

             सल्लेखना का आज २९ वां दिन था। आज प्रातः और दोपहर दोनों ही समय आचार्यश्री के शरीर की अशक्तता बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण बाहर नहीं आये, अतः जनता दर्शन ना कर सकी।

? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ का ?

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