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Arpita Singhai

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  1. तो क्या मूर्तिक एवं रूपी और अमूर्तिक एवं अरूपी को एक समझना चाहिए।फिर अलग अलग शब्दों का उपयोग क्यों किया गया यह समझ आ गया भैया जी।धन्यवाद
  2. कृपया निक्षेप का अर्थ सरल भाषा मे समझाइये।मूर्तिक और अमूर्तिक क्या होता है?
  3. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  4. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  5. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  6. संसार अजीव के होने पर होता है क्योंकि जीव और अजीव के बद्ध होने से संसार होता है,यह कथन स्पष्ट नही हो रहा है।कृपया समाधान कीजिये
  7.  जय जिनेन्द्र

    1. Bimla jain

      Bimla jain

      जीव से तात्पर्य आत्मा होता है,और आत्मा को स्वाभाविक रूप में शुद्ध कहा है।लेकिन  यदि आत्मा हमेशा शुध्द ही है तो फिर मोक्ष पुरुषार्थ  का कोई औचित्य ही नहीं रहेगा।क्यों कि शुध्द आत्मा तो स्वंय मोक्ष रूप है।

      यही आत्मा अनादिकाल से अशुध्द है।अशुध्द आत्मा  का मतलब यह अनादिकाल से कर्मों से बंधी है एवंकर्मों से बँधे होनेके कारण संसार में है।कर्म अजीव हैं।अत: जब तक आत्मा कर्मों से (अजीव) से बंधी है ,तब तक संसार में रहेगी एवं जब तक संसार में रहेगी,तब तक संसार रहेगा। अत:स्पष्ट है कि जीव अजीव के बँधा होने से हीसंसार है। यहअजीव  ही संसार का कारण है।इसीआत्मा को  अजीव से मुक्त/शुध्द करने हेतु मोक्ष पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।

    2. Arpita Singhai

      Arpita Singhai

      Bahut sunder samadhan...Dhanyawad bhaiyaji

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