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प्रस्तावना

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Sneh Jain

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भाषा जीवन की व्याख्या है और जीवन का निर्माण समाज से होता है। वैयक्तिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने के साथ-साथ भाषा का प्रयोग सामाजिक सहयोग के लिए होता है। जिस तरह भाषा का उद्भव समाज से माना गया है, उसी प्रकार भाषा के विकास में ही मानव समाज का विकास देखा गया है। जिस देश की भाषा जितनी विकसित होगी, वह देश और उसका समाज भी उतना ही विकसित होगा; अत: यह कहा जा सकता है कि भाषा व्यक्ति, समाज व देश से पूर्ण रूप से जुड़ी हुई है। भारतदेश की भाषा के विकास को भी तीन स्तरों पर देखा जा सकता है।

प्रथम स्तर (ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 600 तक)

प्रत्येक देश के प्रत्येक युग में साहित्य रूढ़ भाषा के समानान्तर कोई न कोई देशी या लोक भाषा अवश्य रही है। यह लोक भाषा ही उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित होती रही है। भारतदेश में वैदिक साहित्य से पूर्व जन साधारण में प्राकृत अपने अनेक प्रादेशिक भाषाओं के रूप में कथ्य रूप से प्रचलित थी। यह लोक भाषा के रूप में भारत देश की आद्य भाषा थी। प्राकृत के प्रादेशिक भाषाओं के विविध रूपों के आधार से वैदिक साहित्य की रचना हुई। वैदिक साहित्य की भाषा को ही छान्दस कहा गया। इस तरह कथ्य प्राकृत से उद्भूत यह छान्दस ही उस समय की साहित्यिक भाषा बन गई।

पाणिनी ने अपने समय तक चली आई छान्दस की परम्परा को व्याकरण द्वारा नियन्त्रित एवं स्थिरता प्रदान कर लौकिक संस्कृत नाम दिया। इस तरह वैदिक भाषा (छान्स) और लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव वैदिक काल की प्राकृत से ही हुआ। यही भाषा का प्रथम स्तर है।

 

द्वितीय स्तर (ईसापूर्व 600 से 1200 ईसवी तक)

पाणिनी द्वारा छान्स (वैदिक) भाषा के आधार से जिस लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ, उसमें पाणिनी के बाद कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसके विपरीत वैदिक युग में जो प्रादेशिक प्राकृत भाषाएँ कथ्य रूप से प्रचलित थी, उनमें परवर्ती काल में अनेक परिवर्तन हुए। इनमें ऋ, ऋ आदि स्वरों का, शब्दों के अन्तिम व्यंजनों का, संयुक्त व्यंजनों का तथा विभक्ति और वचन समूह का लोप या रूपान्तर मुख्य है। भारतीय भाषा के इस द्वितीय स्तर को तीन युगों में विभक्त किया गया है - ।

प्रथमयुग (ईसापूर्व ६०० से ईसवी २०० तक) - शिलालेखी प्राकृत, धम्मपद की प्राकृत, आर्ष–पालि, प्राचीन जैनसूत्रों की प्राकृत, अश्वघोष के नाटकों की प्राकृत, बौद्धजातकों की प्राकृत।

ईसापूर्व छठी शताब्दी में भगवान महावीर और बुद्ध ने जनभाषा प्राकृत में दार्शनिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को प्रसारित कर सामान्य एवं विशिष्ट जनों के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त किया। जैनों के आगम एवं उनके व्याख्या साहित्य तथा बौद्धों के त्रिपिटक साहित्य से देश की संस्कृति ही नहीं; वरन विश्व की संस्कृति भी गौरवान्वित हुई है।

इस युग में देश में प्राकृत भाषा के व्यापक उपयोग के कारण ही सम्राट अशोक ने (ईसापूर्व तीसरी शती) में प्राकृत भाषा में शिलालेखों को देश के विभिन्न भागों में उत्कीर्ण करवाया। ये प्राकृत के सबसे प्राचीन शिलालेख हैं। इन शिलालेखों के माध्यम से विभिन्न जीवन मूल्यों का अहिंसा के सन्दर्भ में प्रचार-प्रसार किया गया है। | सम्राट खारवेल का हाथी गुफा शिलालेख (ईसवी–१००) उड़ीसा के भुवनेश्वर तीर्थ के पास उदयगिरि पर्वत की एक गुफा में खुदा मिला है। इसमें प्रतापी राजा खारवेल के जीवन वृत्तान्तों एवं उसके द्वारा जैन सम्मेलन बुलाने आदि का वर्णन मिलता है। इस शिलालेख में देश का नाम 'भारतवर्ष' लिखा है।

मध्ययुग (२०० ईसवी से ६०० ईसवी तक) - भाषा और कालिदास के नाटकों की प्राकृत, गीतिकाव्य और महाकाव्यों की प्राकृत, परवर्ती जैनकाव्यसाहित्य की प्राकृत, प्राकृत वैयाकरणों द्वारा निरूपित और अनुशासित प्राकृत व्याकरण ग्रंथ।

इस काल में प्राकृत में विभिन्न विधाओं में साहित्य रचा गया। महाकाव्य, खण्डकाव्य, चरितकाव्य, चम्पूकाव्य, मुक्तककाव्य, सट्टक आदि सभी विधाओं के रूप में प्राकृत साहित्य उपलब्ध है। इनके अतिरिक्त प्राकृत में ज्योतिष, राजनीति, आयुर्वेद, रत्नपरीक्षा, वास्तुसार आदि विभिन्न विषयों का साहित्य भी पाया गया है। प्राकृत व्याकरण, छन्दकोश तथा अलंकार ग्रंथ - प्राकृत साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

तृतीययुगीन (६०० ईसवी से १२०० ईसवी तक) - जब साहित्यिक विधाओं के लिए प्राकृत का उपयोग प्रारम्भ हुआ तो वैयाकरणों ने प्राकृत प्रयोग के नियम निश्चित कर दिये और इसके अनुरूप साहित्य रचा जाने लगा। तब प्राकृत तो साहित्यिक भाषा बन गई और प्रादेशिक भाषारूप बोलियाँ अपभ्रंश के रूप में विकसित हुई। परिवर्तन के साथ इस नई जनभाषा अपभ्रंश के उद्भव होने के विषय में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के जानेमाने समीक्षक राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक हिन्दीकाव्यधारा में लिखते हैं - ‘और अपभ्रंश? यहाँ आकर भाषा में असाधारण परिवर्तन हो गया। उसका ढाँचा ही बिल्कुल बदल गया। उसने नये सुबन्तों, तिङन्तों की सृष्टि की और ऐसी सृष्टि की, जिससे वह हिन्दी से अभिन्न हो गई और प्राकृत से अत्यन्त भिन्न।  

वैसे देखा जाए तो भाषा परिवर्तन के बीज उसके उत्पादन प्रक्रिया में ही रहते हैं। इसीलिए भाष्यकार पतंजलि ने कहा था ‘एकैकस्य शब्दस्य बहवो अपभ्रंशा' अर्थात एक-एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश होते हैं। पतंजलि के समय का भाषात्मक परिवर्तन एक शब्द को अनेक शब्दों में ढाल रहा था। परिवर्तन की यह प्रक्रिया अपभ्रंश युग में कुछ अधिक सक्रिय हो उठी। भाषा सम्बन्धी परिवर्तन की इस प्रक्रिया के नमूने इस अपभ्रंश भाषा में सुरक्षित हैं और जिन्होंने इसे सुरक्षित रखा, उनमें अधिकांश जैन कवि हैं। इन्होंने संस्कृत के साथ प्राकृत, अपभ्रंश और परवर्ती प्रान्तीय भाषाओं के सृजन को न केवल प्रेरणा देकर महत्व प्रदान किया; प्रत्युत: उसे सुरक्षित भी रखा।

तृतीय स्तर (1200 ईसवी से वर्तमान तक)

इस अपभ्रंश साहित्य भाषा के जन साधारण में अप्रचलित होने से भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में कथ्यभाषाओं के रूप में प्रचलित जिस-जिस अपभ्रंश भाषा से भिन्न-भिन्न प्रदेश की जो–जो आधुनिक आर्य कथ्य भाषाएँ उत्पन्न हुई, वे इस प्रकार हैं -

मराठी अपभ्रंश से - मराठी और कोंकणी भाषा।

मागधी अपभ्रंश की पूर्व शाखा से - बंगला, उडिया और आसामी भाषा।

मागधी अपभ्रंश की बिहारी शाखा से - मैथिली, मगही और भोजपुरिया।

अर्धमागधी अपभ्रंश से - पूर्वी हिन्दी भाषाएँ। (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी)।

शौरसेनी अपभ्रंश से - बुन्देली, कन्नौजी, ब्रज, बाँगरू, हिन्दी।

नागर अपभ्रंश से - राजस्थानी, मालवा, मेवाड़ी, जयपुरी, मारवाड़ी, गुजराती।

पाली से - सिंहली और मालदीवन।

टाक्की अथवा ढाक्की से - लहन्दी या पश्चिमी पंजाबी।

ब्राचड अपभ्रंश से - सिन्धी।

पैशाची अपभ्रंश से - काश्मीरी भाषा ।

अत: यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि अपभ्रंश की कोख से ही उपरोक्त आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ है। वृहत्तर भारतीय संस्कृति और उसके गतिशील मूल्यों को समग्रतर रूप में समझने हेतु उपरोक्त भाषाओं के साहित्य का अध्ययन करना अत्यन्त आवश्यक है।

उपरोक्त भाषाओं के सदृश अपभ्रंश साहित्य का भी विपुल भंडार है। अपभ्रंश साहित्य में अधिकांश जैनों की तथा बौद्ध सिद्धों, शैवों व मुसलिमों की कुछ रचनाएँ मिलती हैं। ईसा की छठी शती से लेकर सोलहवीं शती तक जैन संतों और कवियों ने मुक्तककाव्य तथा प्रबन्धकाव्य रूप रचनाओं से अपभ्रंश साहित्य को समृद्ध किया है। मुक्तक काव्य के अन्तर्गत रहस्य, भक्ति, नीति एवं उपदेशात्मक मुक्तक तथा प्रबन्धकाव्य के अन्तर्गत महाकाव्य, चरिउकाव्य एवं कथाकाव्य के रूप में अपभ्रंश साहित्य का समृद्ध भंडार है।  

मुक्तक रचनाओं में आचार्य जोइन्दु कृत परमात्मप्रकाश व योगसार, मुनिरामसिंह कृत पाहुड़दोहा, सुप्रभाचार्य कृत वैराग्यसार, आचार्य देवसेन कृत सावयधम्म दोहा तथा हेम व्याकरण में संकलित अपभ्रंश के दोहे व अन्य मुक्तक रचनाएँ जीवन के आन्तरिक, आत्मिक व आध्यात्मिक पक्ष को सबल रूप से उजागर कर अपभ्रंश साहित्य की मुक्तक विधा का गौरव बढ़ाते हैं।

प्रबन्धकाव्य के अन्तर्गत कवि स्वयंभू कृत पउमचरिउ, रिट्ठणेमिचरिउ, कवि पुष्पदन्त कृत महापुराण, णायकुमारचरिउ, जसहरचरिउ, कवि वीर कृत जंबूसामिचरिउ, मुनि नयनन्दि कृत सुदंसणचरिउ, मुनि कनकामर कृत करकंडचरिउ, कवि हरिदेव कृत मयणपराजयचरिउ, कवि जीव कृत हरिसेणचरिउ, कवि धाहिल कृत पउमसिरिचरिउ, पद्मकीर्ति कृत पासणाहचरिउ, कवि सिंह कृत पजुण्णचरिउ, नरसेन कृत सिरिपालचरिउ, जयमिहल कृत वड्डमाणचरिउ, माणिक्यराज कृत अमरसेणचरिउ, कवि रइधू कृत बलहद्दचरिउ, मेहेसरचरिउ, पासणाहचरिउ, सम्मइजिणचरिउ, सांतिणाहचरिउ आदि कुल २८ कृतियाँ तथा और भी अन्य अपभ्रंश काव्य - अपभ्रंश प्रबन्धकाव्य धारा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

बौद्ध सिद्धों में सरहपा व कण्हपा मुख्य हैं। इनके द्वारा रचित दोहाकोश तथा गीत अपभ्रंशसाहित्य की महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। शैवों की रचनाओं के अन्तर्गत अभिनवगुप्त के तन्त्रसार (१०१४) में प्राकृत अपभ्रंश के पद्य मिलते हैं। शितिकण्ठाचार्य की कृति 'महानयप्रकाश' (१५वीं शती) में अपभ्रंश के ९४ पद्य हैं। मुसलिम लेखक अब्दुलरहमान द्वारा रचित ‘संदेशरासक' एक महत्वपूर्ण प्रबन्धात्मक कृति है। इस संदेशरासक काव्य का प्रथम सम्पादन मुनि जिनविजय जी ने किया है। पुनः इस ग्रंथ का नये सिरे से सम्पादन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी व उनके शिष्य विश्वनाथ त्रिपाठी ने किया। अतः अपभ्रंश साहित्य काव्य रूपों की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न है। इन सभी काव्य रूपों का विकास हिन्दी में भी दिखाई पड़ता है।

आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी इस अपभ्रंश भाषा को पढ़ने की प्रेरणा मुझे अपभ्रंश साहित्य अकादमी के संयोजक डॉ. कमलचन्द जी सोगाणी साहब से मिली। सन् १९९३ में मेरी अपभ्रंश साहित्य अकादमी, दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजी में पत्राचार के माध्यम से अपभ्रंश सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम के अध्यापन हेतु नियुक्ति हुई। तब से १४ वर्ष तक अध्यापन करने के पश्चात् अपभ्रंश व्याकरण को जिस तरह से मैंने समझा, उसे पुस्तक रूप देने की चाहत पैदा हुई। तदुपरान्त मात्र ३ माह की अल्पावधि में मैंने इस कार्य को अपभ्रंश अनुवाद कला' पुस्तक के रूप में पूर्ण कर लिया।

आभार -

मात्र अपभ्रंश काव्यों को पढने व समझने की रुचि ने मुझे हेमचन्द्र व्याकरण पढने की ओर आकर्षित किया। तदर्थ मैंने डॉ. कमलचन्दजी सोगाणी, संयोजक अपभ्रंश साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अपभ्रशं रचना सौरभ एवं अपभ्रंश प्रौढ रचना सौरभ पुस्तक का सहारा लिया। मैंने जिस तरह इन पुस्तकों के आधार पर अपभ्रंश भाषा को सीखा उसी को मैंने अपनी इस पुस्तक अपभ्रंश अनुवाद कला में अभिव्यक्त किया है। मुझे आशा है कि अपभ्रंश भाषा को सीखनेवालों के लिये यह पुस्तक अवश्य मार्गदर्शन का काम करेगी।

इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा मुझे मेरे स्वयं के अन्तर्मन से मिली। मुझे लगा कि अपभ्रंश भाषा के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिये अपभ्रंश भाषा, अपभ्रंश भाषा की किसी भी अप्रकाशित रचना अथवा किसी भी प्रकाशित रचना पर जितना और जैसा भी संभव हो लेखन कार्य करना चाहिये। तदर्थ सर्वप्रथम मैंने जीव कवि कृत ‘हरिसेणचरिउ' का अनुवाद व समीक्षात्मक अध्ययन किया और वह कृति श्री महावीरजी से पुरस्कृत हुई। उसके बाद यह अपभ्रंश अनुवाद कला' पुस्तक को आपके हाथों में सौंपकर हर्ष का अनुभव कर रही हूँ। आपको यह जानकर पुनः हर्ष होगा कि अपने अगले कार्य हेतु मैंने स्वयंभू कृत 'पउमचरिउ' (रामकथा) को लिया है। पउमचरिउ पर काम करने पर जिस आनन्दानुभूति का मैं अनुभव कर रही हूँ, निश्चय ही इस कृति के पूर्ण होने पर पाठकों को भी इसका अपार लाभ मिल सकेगा।

मैं भाई संजीवजी गोधा, प्रबन्ध सम्पादक वीतराग-विज्ञान (मासिक) एवं जैनपथ प्रदर्शक (पाक्षिक) के प्रति अपनी पूर्ण कृतज्ञता प्रकट करती हूँ। ‘धर्म क्यों करें कैसे जानें ?' नामक पुस्तक में इनका पता देखकर इनसे पहली बार मैं अपने पति महोदय के साथ इनके घर पर ही मिली और इस पुस्तक के सम्पादन व प्रकाशन का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। मुझे यह कहते हुये अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि भाई संजीवजी ने हमारे स्वागत सत्कार व अपने मधुर व्यवहार के साथ पहली बार में ही पुस्तक के प्रकाशन करने की स्वीकृति प्रदान की। उन्होंने जिस प्रसन्नता व आवश्यक सुझावों के साथ इस कृति के सम्पादन व प्रकाशन करने का कार्य पूरा किया, तदर्थ मैं पुन: उनका आभार व्यक्त करती हूँ।

अब मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों डॉ. मणिकान्त ठोलिया, पुत्र-पुत्र वधू सचिन-प्रियंका, अनुज पुत्र सौरभ एवं पुत्री-दामाद अनिता–शिखरजी पांड्या को धन्यवाद देती हैं, जिन्होंने इस कार्य की अवधि में महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग प्रदान कर इस पुस्तक को शीघ्र पूर्ण करने में अपना योगदान दिया।  

यह इस पुस्तक 'अपभ्रंश अनुवाद कला' का पहला संस्करण है। इसमें रही त्रुटियों को सूचित करने वाले विद्वानों के प्रति मैं बहुत आभारी रहूंगी।

स्नेहलता जैन

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