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JainSamaj.World
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जयपुर की असफल यात्रा - २०


Abhishek Jain

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☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,

          आत्मकथा में आज की प्रस्तुती से आगे आप वर्णी जी के जीवन में धर्ममार्ग में ज्ञानार्जन के बीच आई अनेक कठिनाइयों का उल्लेख प्राप्त करेंगे।

      वर्णीजी के जीवन के यह प्रसंग हम पाठको के अंतःकरण को छूने वाले हैं। इन सब प्रसंगों से विदित होता है कि वर्तमान में सर्वविदित महापुरुषों के जीवन सरल नहीं थे। उनकी लक्ष्य के प्रति दृढ़ता ने ही उनको लोक में सर्वविदित कर दिया।

          ज्ञानाभ्यास की प्रबल चाह रखने वाले पूज्य वर्णीजी अपने प्रारंभिक समय में जयपुर जाकर ज्ञानाभ्यास के लिए आतुर थे। बाईजी द्वारा व्यवस्था के आधार पर जयपुर के लिए निकलते हैं लेकिन ग्वालियर में सामान चोरी हो जाने से उनकी जयपुर यात्रा असफल हो जाती है।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?

           *"जयपुर की असफल यात्रा"*

                       क्रमांक - २०

                मैंने बाईजी आज्ञा शिरोधार्य की और भाद्रमास के बीतने पर निवेदन किया कि 'मुझे जयपुर भेज दो।'

बाईजी ने कहा- 'अभी जल्दी मत करो, भेज देंगे।'

मैंने पुनः कहा- 'मैं तो जयपुर जाकर विद्याभ्यास करूँगा।'

बाईजी बोलीं- 'अच्छा बेटा, जो तुम्हारी इच्छा हो, सो करो।'

        जाते समय बाईजी ने कहा- 'भैया ! तुम सरल हो, मार्ग में सावधानी से जाना, ऐसा न हो कि सब सामान खोकर फिर वापिस आ जाओ।'

       मैं श्री बाईजी के चरणों में प्रणाम कर सिमरा से श्री सोनागिरी की यात्रा को चल पड़ा। यहाँ से १६ मील दूर मऊरानीपुर है। वहाँ आया और वहाँ के जिनालयों के दर्शन कर आनंद में मग्न हो गया।

          यहाँ से रेलगाड़ी में बैठकर श्री सोनागिरी पहुँच गया। यहाँ की वंदना व परिक्रमा की। दो दिन यहाँ पर रहा। पश्चात लश्कर ग्वालियर के लिए स्टेशन पर गया।

       टिकिट लेकर ग्वालियर पहुँचा। चम्पाबाग की धर्मशाला में ठहर गया। यहाँ के मंदिरों की रचना देख आश्चर्य में डूब गया। चूंकि ग्रामीण मनुष्यों को बड़े-२ शहरों के देखने का अवसर नहीं आता, अतः उन्हे इन रचनाओं को देख महान आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है।

         श्री जिनालय व जिनबिम्बों को देखकर मुझे जो आनंद हुआ वह वर्णनातीत है। दो दिन इसी तरह निकल गए। तीसरे दिन दो बजे दिन के शौच की बाधा होने पर आदत के अनुसार गाँव के बाहर दो मील तक चला गया।

         लौटकर शहर के बाहर कुआँ पर हाथ पाँव धोए, स्नान किया और बड़ी प्रसन्नता के साथ धर्मशाला में लौट आया। 

       आकर देखता हूँ कि जिस कोठी में ठहरा था, उसका ताला टूटा पड़ा है और पास में जो कुछ सामान था वह सब नदारत है। 

        केवल बिस्तर बच गया था। इसके सिवा अँटी में पाँच आना पैसे, एक लोटा, छन्ना, डोरी, एक छतरी, एक धोती, जो बाहर ले गया था, इतना सामान शेष बचा था।

       चित्त बहुत खिन्न हुआ। 'जयपुर जाकर अध्यन करूँगा' यह विचार अब वर्षों के लिए टल गया। शोक सागर में डूब गया। किस प्रकार सिमरा जाऊँ? इस चिंता में पड़ गया।                     

? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?? आजकी तिथी- वैशाख शुक्ल११?

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