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?दिव्यदृष्टि - अमृत माँ जिनवाणी से - १५२


Abhishek Jain

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?    अमृत माँ जिनवाणी से - १५२   ?


                    "दिव्यदृष्टी"


       पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज का राजनीति से तनिक भी सम्बन्ध नहीं था। समाचार-पत्रों में जो राष्ट्रकथा आदि का विवरण छपा करता है, उसे वे न पढ़ते थे, न सुनते थे। उन्होंने जगत की ओर पीठ कर दी थी।

        आज के भौतिकता के फेर में फँसा मनुष्य क्षण-क्षण में जगत के समाचारों को जानने को विहल हो जाता है। लन्दन, अमेरिका आदि में तीन-तीन घंटों की सारे विश्व की घटनाओं को सूचित करने वाले बड़े-बड़े समाचार पत्र छपा करते हैं। आत्मा की सुधि न लेने वाले लोग अपना सारा समय शारीरिक और लौकिक कार्यो में व्यतीत करते हैं।

    आचार्यश्री के पास ऐसा व्यर्थ का क्षण नहीं था, जिसे वे विकथाओं की बातों में व्यतीत करें। फिर भी उनकी विशुद्ध आत्मा कई विषयों पर ऐसा प्रकाश देती थी, कि विशेषज्ञों को भी उनके निर्णय से हर्ष हुए बिना ना रहेगा।


?  स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रन्थ का  ?

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