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JainSamaj.World
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पूर्व कथन की पुष्टि


Sneh Jain

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हम पूर्व में भी इस बात की चर्चा कर चुके हैं कि अदृश्य वस्तु को बोधगम्य बनाने हेतु उसका बार-बार कथन करना आवश्यक है। यहाँ आगे के दोहे में परम आत्मा से सम्बन्धित पूर्व कथन को ही पुष्ट किया गया है।

37.   जो परमत्थे णिक्कलु वि कम्म-विभिण्णउ जो जि

     मूढा सयलु भणंति फुडु मुणि परमप्पउ सो जि ।।

अर्थ - जो वास्तविकरूप से शरीर रहित है और निश्चय ही कर्मों से जुदा है, वह ही परम- आत्मा है, (किन्तु) मूर्ख (उसको) शरीरस्वरूप ही कहते हैं, (तुम) (इस बात को) स्पष्टरूप से समझो।

शब्दार्थ - जो-जो, परमत्थे -वास्तविकरूप से, णिक्कलु -शरीर रहित, वि-और, ,कम्म-विभिण्णउ- कर्मों से जुदा,जो-जो, जि-वास्तव में, मूढा-मूर्ख, सयलु-शरीरस्वरूप, भणंति-कहते हैं, फुडु-स्पष्टरूप से, मुणि-समझो, परमप्पउ-परम आत्मा, सो-वह, जि -ही।

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