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समभाव में रहने वालो की संगति ही सुखकर है


Sneh Jain

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आचार्य योगीन्दु अपने साधर्मी मुनिराज को ऐसे गृहस्थों की संगति करने से मना करते हैं जो समता भाव से रहित हैं, क्योंकि समता भाव से रहित व्यक्तियों की संगति से मानसिक और शारीरिक दोनों ही प्रकार के दुःख मिलते हैं। उनसे मिलनेवाली चिंता मानसिक पीड़ा देती है जिससे शरीर भी पीड़ित होता है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा -

109.  जो सम-भावहँ बाहिरउ तिं सहुं मं करि संगु।

      चिंता-सायरि पडहि पर अण्णु वि डज्झइ अंगु।।

अर्थ -जो समभाव से बाहर का है, उसके साथ संगति मत कर, (क्योंकि इससे तू) चिंतारूपी समुद्र में गिरता है, इसके बाद (वह) अज्ञानी (तेरा) शरीर भी जलाता है।

शब्दार्थ - जो-जो, सम-भावहँ-सम भाव से, बाहिरउ-बाहर है, तिं -उसके, सहुं -साथ, मं -मत, करि - कर, संगु-संगति, चिंता-सायरि-चिंतारूपी समुद्र में, पडहि-गिरता है, पर-उसके बाद, अण्णु-अज्ञानी, वि-भी, डज्झइ-जलाता है, अंगु-शरीर को।

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