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आत्मा के कथन से गं्रथ का प्रारम्भ


Sneh Jain

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भट्टप्रभाकर के प्रश्न के उत्तर में आचार्य योगिन्दु बिना किसी भूमिका के सीधे सीधे 11वें दोहे से  आत्मा के प्रकार (अप्पा तिविहु कहेवि) के कथन करने की बात से अपने ग्रंथ का शुभारंभ करने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि मैं तीन प्रकार की आत्मा का कथन करने के लिए उद्यत हुआ हूँ, तू पंच गुरुओं को भाव पूर्वक चित्त में धारणकर उसे सुन। यही कारण है कि परमात्मप्रकाश के टीकाकार पूज्य ब्रह्मदेव ने इस ग्रंथ को तीन भागों में विभाजित कर इस ग्रंथ के प्रथम भाग को त्रिविधात्माधिकार नाम दिया। 11वें दोहे के माध्यम से अपभ्रंश भाषा और उसमें निहित कथन का आनन्द लीजिए

 

11.    पुणु पुणु पणविवि पंच-गुरु भावे चित्ति धरेवि।

      भट्टपहायर णिसुणि तुहुँ अप्पा तिविहु कहेवि ।।

 

अर्थ - हे भट्टप्रभाकर! मैं तीन प्रकार की आत्मा को कहने के लिए (उद्यत) हुआ हूँ, तू पाँच गुरुओं को बार-बार प्रणाम करके (और) (उनको) अंतरङ्ग बहुमानपूर्वक हृदय में धारण करके अन्तर्भाव (पूर्वक) सुन।

शब्दार्थ - पुणु पुणु- बार-बार, पणविवि-प्रणाम कर, पंच-गुरुपाँच गुरुओं को, भावें- अन्तरंग बहुमानपूर्वक, चित्ति-हृदय में, धरेवि-धारणकर, भट्टपहायर- हे भट्टप्रभाकर! णिसुणि- अन्तर्भावपूर्वक सुन, तुहुं- तू, अप्पा- आत्मा को, तिविहु- तीन प्रकार की, कहेवि- कहने के लिए।

बन्धुओं! इस ग्रंथराज के मात्र 1 दोहे की हम प्रतिदिन विवेचना करेंगे। आप अपने परिचित जनों तथा विशेषकर अपभ्रंश और प्राकृत भाषा प्रे्रमियों को भी इस ग्रंथ को इन ब्लाग के माध्यम से पढने हेतु प्रेरित करें। आपकी रुचि को देखते हुए धीरे-धीरे दोहों की संख्या बढा दी जायेगी। प्रारम्भ में हम आपकी सुविधा के लिए एक ही दोहा लेंगे।

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