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अपभ्रंश भाषा के प्रथम काव्यकार:स्वयंभू


Sneh Jain

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यंभू अविवाद्य रूप से अपभ्रंश के श्रेष्ठ कवि तथा प्रबन्धकाव्य के क्षेत्र में अपभ्रंश के आदि कवि हैं। इनकी महानता को स्वीकार करते हुए अपभ्रंश के दूसरे महाकवि पुष्पदन्त ने उनको व्यास, भास, कालिदास, भारवि, बाण, चतुर्मुख आदि की श्रेणी में विराजमान किया है। स्वयंभू ‘महाकवि’, ‘कविराज’, ‘कविराज चक्रवर्ती’ जैसी उपाधियों से सम्मानित थे। जिस प्रकार सूर- सूर तुलसी-शशी जैसी उक्ति हिन्दी साहित्य की दो महान विभूतियों का यशोगान करती है उसी प्रकार अपभ्रंश साहित्य में ’सयम्भू-भाणु, पुफ्फयन्त-णिसिकन्त तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

स्वयंभू, अपने पउमचरिउ(रामकाव्य) तथा रिट्टणेमिचरिउ(कृष्णकाव्य) के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक परम्परा पर विचार करके सम्पूर्ण समाज को उसके वास्तविक रूप के दर्शन कराने तथा सही मार्ग दिखलाने के दायित्व का निर्वाह करने में पूर्ण सफल रहे हैं। यही कारण है कि ‘राहुलसांकृत्यायन ने अपभ्रंशभाषा के काव्यों को आदिकालीन हिन्दीकाव्य के अन्तर्गत स्थान देते हुए कहा है- ‘‘हमारे इसी युग में नही, हिन्दी कविता के पाँचों युगों के जितने कवियों को हमने यहाँ संग्रहीत किया है यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि उनमें स्वयंभू सबसे बडे कवि थे। वस्तुतः वे भारत के एक दर्जन अमर कवियो में से एक थे’’।  

इनका समय ई. सन् 783 है। इनके पिता का नाम मारुतदेव तथा माता का नाम पद्मिनी था। स्वयंभू का पारिवारिक जीवन सुख-सम्पन्न था। इनकी दोनों पत्नियाँ अमृताम्बा और आदित्याम्बा सुविज्ञ एवं काव्यकुशल थीं। उन्होंने पउमचरिउ काव्य के लेखन हेतु स्वयंभू को प्रोत्साहित कर सहयोग दिया।इनके पुत्र त्रिभुवन भी प्रतिभाशाली कवि थे।स्वयंभू पर सरस्वती व लक्ष्मी दोनों की ही असीम कृपा थी। गृहस्थ होने के कारण स्वयंभू धर्म, अर्थ, काम की यथोचित अभिलाषा रखते थे। उनका यह यथोचित संतुलित दृष्टिकोण धर्मशील गृहस्थ जीवन में उनके तृप्ति को प्राप्त होनेे के कारण ही विकसित हुआ होगा।     

वस्तुतः कवि की कृति ही उसके व्यक्तित्व की परिचायिका होती है। स्वयंभूू की कृतियों में भी इनका यह सन्तुलित व्यक्तित्व पूर्ण रूप से उभरकर आया है, जिसे हम इनके काव्य में देखेंगे। ख्यातिपराङमुखता, कृतज्ञता, विनम्रता, निर्भीकता, धर्मनिष्ठा, धार्मिक उदारता इनकी चारित्रिक विशेषताएँ हैं।   

आगे पउमचरिउ रामकाव्य पर प्रकाश डाला जायेगा।

 

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