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जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए सहयोग आवश्यक


Sneh Jain

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पूर्व में विद्याधरकाण्ड के blog  में विभिन्न वंशों के उद्भव के विषय में विस्तारपूर्वक विवेचना की गयी थी। वहाँ हमने देखा कि इक्ष्वाकुवंश का सम्बन्ध अयोध्या से तथा वानरवंश का सम्बन्ध किष्किंधनगर से एवं राक्षसवंश का सम्बन्ध लंका से रहा है। राम अयोध्या से चलकर किष्किंधनगर होते हुए लंका पहुँचे हैं। अतः हम इन तीनों वंशों के पात्रों के जीवन चरित्र से अयोध्या - उत्तर भारत, किष्किंधनगर- मध्य भारत तथा लंका - दक्षिण भारत की सभ्यता एवं संस्कृति के विषय में भी कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। चारित्र कथन में हम सर्व प्रथम हम रामकाव्य में प्राप्त इक्ष्वाकुवंश के मुख्य पात्रों के जीवन से परिचित हुए। उनके माध्यम से हमें उत्तर भारत की सभ्यता एवं संस्कृति के विषय में कुछ जाना तथा रामकथा के नायक और नायिका राम और सीता के जीवन से बहुत कुछ सीखा।

अब हम रामकथा में प्राप्त वानरवंश के प्रमुख पात्रों का कथन करेंगे और यह देखेंगे कि रामकथा में इस वानरवंश की क्या भूमिका रही है ? हमने पिछले विद्याधरकाण्ड के इसवह में वानरवंश के विषय में विस्तार से कथन किया है। वानरवंश भारत के मध्य में था। वानरवंशियों ने प्रारम्भ में दक्षिण भारत में स्थित   राक्षसवंश का साथ दिया।आगे ये ही वानरवंश जब राम का रावण से युद्ध हुआ तब राम के पक्ष में रहकर रावण से लडा और इनके सहयोग से ही राम रावण से सीता को प्राप्त करने में सफल हुए।

अब हम आगे के इसblog में वानरवंश के प्रमुख पात्रों के जीवन का कथन करेंगे और उसके माध्यम से यह देखेंगे कि जीवन में सहयोग का कितना महत्व है ? असहायहो णत्थि सिद्धि अर्थात् असहाय की कभी भी सिद्धि नहीं होती है। क्या राम वानरवंशियों के सहयोग के बिना रावण से सीता को प्राप्त कर सकते थे ? कभी नहीं। प्रमुख पात्रों के जीवन से हम यह सीख सकेंगे कि सहयोग क्यों आवश्यक है, कहाँ आवश्यक है? तथा सहयोग किस तरह लिया और दिया जाना चाहिए ? तथा सहयोग लेने देने से पूर्व किस तरह पात्र और अपात्र के विषय में विचार करना चाहिए? यह सब हम वानरवंशियों के प्रमुख पात्रों - जाम्बवन्त, सुग्रीव, नल और नील, अंग और अंगद तथा हनुमान के माध्यम से देख सकेंगे। आगे के इसवह में इनके जीवन चरित्र के कथन के माध्यम से हम जीवन में सहयोग के फल से अवगत हो सकेंगे।

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