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मोक्ष अर्थात् परमशान्ति की प्राप्ति का प्रथम निमित्त सम्यग्दर्शन का कथन


Sneh Jain

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आचार्य योगीन्दु मोक्ष अर्थात् परमशान्ति का प्रथम निमित्त सम्यग्दर्शन को मानते हैं। सम्यग्दर्शन को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि आत्मा का वह भाव सम्यग्दर्शन है, जिस भाव से वह जगत में स्थित द्रव्यों को सही रूप में जानता है और सही रूप में श्रद्धान करता है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा -

15.   दव्वइँ जाणइ जहठियइँ तह जगि मण्णइ जो जि।

      अप्पहँ केरउ भावडउ अविचलु दंसणु सो जि।।

अर्थ - जो द्रव्यों को जिस प्रकार (वे) जगत में स्थित हैं उसी प्रकार जानता है, (तथा) ठीक उसी प्रकार (विश्वासपूर्वक) मानता है, आत्मा का वह भाव ही अविचल (सम्यक्) दर्शन है।

शब्दार्थ - दव्वइँ - द्रव्यों को, जाणइ -जानता है, जहठियइँ- जिस प्रकार स्थित हैं, तह-उसी प्रकार,  जगि-जग में,  मण्णइ-मानता है, जो-जो, जि-ठीक इसी प्रकार, अप्पहँ- आत्मा का, केरउ- सम्बन्धवाची परसर्ग, भावडउ-भाव, अविचलु-अविचल, दंसणु -दर्शन, सो-वह, जि-ही।

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