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हम तो कबहूँ न हित उपजाये


admin

हम तो कबहूँ न हित उपजाये

सुकुल-सुदेव-सुगुरु सुसंग हित, कारन पाय गमाये! ॥

 

ज्यों शिशु नाचत, आप न माचत, लखनहारा बौराये

त्यों श्रुत वांचत आप न राचत, औरनको समुझाये ।१।

 

सुजस-लाहकी चाह न तज निज, प्रभुता लखि हरखाये

विषय तजे न रजे निज पदमें, परपद अपद लुभाये ।२।

 

पापत्याग जिन-जाप न कीन्हौं, सुमनचाप-तप ताये

चेतन तनको कहत भिन्न पर, देह सनेही थाये ।३।

 

यह चिर भूल भई हमरी अब कहा होत पछताये

दौल अजौं भवभोग रचौ मत, यौं गुरु वचन सुनाये ।४।

 



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