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JainSamaj.World
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क्रमशः अज्ञानी का कथन


Sneh Jain

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पुनः आचार्य योगीन्दु अज्ञानी व्यक्ति के विषय में कहते हैं कि वह जीव मोक्ष के हेतु दर्शन, ज्ञान और चारित्र को तो समझता नहीं है और जो मोक्ष का कारण नहीं है, उन पाप पुण्य को मोक्ष का कारण मानकर करता रहता है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा -

54.   दंसण-णाण-चरित्तमउ जो णवि अप्पु मुणेइ।

     मोक्खहँ कारणु भणिवि जिय सो पर ताइँ करेइ।।

अर्थ -जो (सम्यक्), दर्शन, ज्ञान (और) चारित्रमय आत्मा को नहीं जानता है।, वह जीव उन दोनों (पाप-पुण्य) को मात्र मोक्ष का कारण कहकर करता है।

शब्दार्थ - दंसण-णाण-चरित्तमउ - दर्शन, ज्ञान और चरित्रमय, जो-जो, णवि-नहीं, अप्पु-आत्मा को, मुणेइ-जानता है, मोक्खहँ -मोक्ष का, कारणु-कारण, भणिवि-कहकर, जिय-जीव, सो-वह, पर-मात्र, ताइँ-उन दोनों को, करेइ-करता है।

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