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अहिंसा ही सुख व शान्ति का मार्ग है


Sneh Jain

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इस दोहे में आचार्य योगीन्दु स्पष्टरूप में घोषणा करते हैं कि हे प्राणी! यदि तू बेहोशी में जीकर इतना नहीं सोचेगा कि मेरे क्रियाओं से किसी को कोई पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है तो तू निश्चितरूप से नरक के समान दुःख भोगेगा। इसके विपरीत यदि तेरी प्रत्येक क्रिया इतनी जागरूकता के साथ है कि तेरी क्रिया से किसी भी प्राणी को तकलीफ नहीं पहुँचती तो तू निश्चितरूप से स्वर्ग के समान सुख प्राप्त करेगा। यह कहकर आचार्य योगीन्दु बडे़ प्रेम से कहते हैं कि देख भाई मैंने तूझे सुख दुःख के दो मार्गों को अच्छी तरह से समझा दिया है, अब तुझे जो सही लगे वही कर। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा -

127.   जीव वहंतहँ णरय-गइ अभय-पदाणे सग्ग।

       बे पह जवला दरिसिया जहि रुच्चइ तहि लग्गु।।

अर्थ -  जीवों का वध करते हुओं को नरकगति (मिलती है), (तथा) अभय दान से स्वर्ग (मिलता है)

   (ये) दो मार्ग समुचित रूप से (तुझकोे) बताये गये हैं, जिसमें तुझे अच्छा लगता है उसमें दृढ़ हो।

शब्दार्थ - जीव-जीवों का, वहंतहँ-वध करते हुओं को,  णरय-गइ-नरक गति, अभय-पदाणे -अभय दान से स्वर्ग, सग्ग-स्वर्ग, बे -दो, पह -मार्ग, जवला-समुचित, दरिसिया-बताये गये हैं, जहि -जिसमें,  रुच्चइ -अच्छा लगता है, तहि -उसमें, लग्गु-दृढ़ हो।

 

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