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Sushma Nayan Jain

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  1. समरंभ समारंभ आरंभ के ३ × मन वचन काय के 3 × कृतकारित अनुमोदना के 3 =२७ × क्रोध मान माया लोभ के ४ ऐसे २७×४=१०८ बार रोजाना अपने से पाप होते है इसलिये 108 बार जाप करते है |
  2. आनंतानुबंधी_ क्रोध, मान, माया व लोभ अप्रत्याख्यानावरण _क्रोध ,मान ,माया व लोभ प्रत्याख्यानावरण _क्रोध, मान, माया व लोभ संज्वलन _क्रोध ,मान ,माया,व लोभ
  3. अरिहंत परमेष्ठी ४८ मूलगुण सिद्ध परमेष्ठी८ मूलगुण आचार्य परमेष्ठी ३६ मूलगुण उपाध्याय परमेष्ठी २५ मुलगुण साधू परमेष्ठी २८ मुलगुण
  4. आपअकेला अवतरे, मरे अकेला होय | यो कबहूँ इस जीव को,साथी सगा न कोय ||
  5. १ संकल्पी हिंसा २ आरंभी हिंसा ३ उद्योगी हिंसा ४ विरोधी हिंसा
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