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Sachin2.Jain

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  1. जीवन में हम सफल हो या ना हो परंतु मनुष्य जीवन पाने के बाद भी यदि हमारा आचरण मनुष्य जैसा ना हो तो इससे बड़ी विफलता और कोई नहीं हो सकती है । पाठशाला में आने से हमें हमारे आचरण में निखार की संभावना दिखाई देती हैं जो कि भविष्य सुधारने के लिए सार्थक कदम सिद्ध हो सकता है ।
  2. आज के भौतिकवादी युग में हम स्वयं में एवम् अपनी आने वाली पीढ़ी में संस्कारो का अभाव पाते हैं, इसका मुख्य कारण जीवन में धर्म से विमुखता हैं। पाठशाला आपको धर्म के सम्मुख आने का अवसर प्रदान करती है, आप धर्म के सिद्धांतो को समझकर आपकी भूमिका अनुसार उन्हें अमल मे ला सकते हैं, जिससे आप और आपका परिवार सुसंस्कारों से सुशोभित रहे।
  3. वास्तविक ज्ञान वही है जो हमारे परिणामों में निर्मलता लावे, राग द्वेष को घटाए और प्राणी मात्र के प्रति हमारे मन में सद्भावना उत्पन्न करे। पाठशाला के माध्यम से हम धर्म के इस पहलू से अवगत होकर अपने ज्ञान को सही दिशा दे सकते हैं, और उस ज्ञान से हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर सकते हैं।
  4. हमें मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभता से प्राप्त हुआ है । हम यह अवसर सदुपयोग करके सफल भी बना सकते हैं या फिर इसे व्यर्थ के कामों में लगाकर गंवा भी सकते हैं । तो आइए और इस नववर्ष में निश्चित करे कि पाठशाला के माध्यम से हम तत्व चिंतन के द्वारा हमारे जीवन के लिए क्या हेय हैं एवम् क्या उपादेय हैं, की जानकारी प्राप्त करके, हमारी दृष्टि को निर्मल बना कर, हमारे जीवन को सार्थक बनाएंगे।
  5. विषय कषायों का पोषण करने वाला ज्ञान कभी हमारे जीवन का उत्थान करने वाला नहीं हो सकता। पाठशाला के माध्यम से हम उस ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं जो वैराग्य से समन्वित हो और हमें संयमित जीवन जीने की ओर अग्रसित होने की प्रेरणा दे।
  6. जैसा कि हमारे आगम में बताया गया है कि इच्छाओं को रोकना ही तप हैं एवं तप से ही कर्मो की निर्जरा होती हैं। आप सभी जब ऐसी ठंड में शीतलहर की वेदना को दरकिनार करते हुए पाठशाला आने का उपक्रम करते हैं एवं मंदिर के प्रांगण में बड़े उत्साह से धर्म चर्चा करते हैं, तो मानके चलिए आप तप कर रहे हैं, क्योंकि आपने अपनी इन्द्रियों पर विजय पाई हैं । अतः पाठशाला आना आपके कर्मो की निर्जरा करने का साधन स्वयमेव ही बन जाता है ।
  7. धर्म सिर्फ क्रिया नहीं है अपितु जीवन जीने की कला हैं, जब हम इस तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारी कषाय एवं राग द्वेष के भाव अापो आप कम होने लगते है। पाठशाला के माध्यम से हम धर्म के इस पहलू से भी अवगत होकर अपनी चेतना व गुणों का क्रमिक रूप से उत्थान कर सकते हैं ।
  8. जीवन में हम बहुत कुछ पाना चाहते हैं और पुण्योदय से प्राप्त करने में भी सफल हो जाते हैं, परंतु यदि हमारे पास संस्कार नहीं हो तो वह सब प्रापत्य भी अप्रापत्य की भांति हैं । पाठशाला में आने से सही समय पर अच्छे संस्कारों का बीजारोपण हो जाता है, जो जीवन में किसी भी उपलब्धि को प्राप्त करने पर बहुत काम आता है।
  9. पाठशाला के माध्यम से हम धर्म के सिद्धांतो को समझने का प्रयास करते हैं। हमारा यही प्रयास हमारे सम्यक श्रृद्धान को मजबूती देने में सहायक होता है और हम एक एक कदम अध्यात्म की और झुकते चले जाते हैं, जिससे हमारे जीवन को रचनात्मक दिशा मिलती चली जाती हैं।
  10. धर्म के सिद्धांतो को पढने से हम पांडित्य को प्राप्त कर पाए या ना कर पाए परंतु धर्म के सम्मुख आने से एवम् उसको समझ कर हम अपने जीवन में आमूल चुल परिवर्तन जरूर कर सकते हैं । पाठशाला आपको यह अवसर प्रदान करती हैं तो आए और अपने जीवन को सकारातमक दिशा प्रदान करे ।
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