Jump to content
JainSamaj.World

Rajendra K. Daftary

Members
  • Content Count

    15
  • Joined

  • Last visited

Community Reputation

0 Neutral

About Rajendra K. Daftary

  • Rank
    Member

Recent Profile Visitors

152 profile views
  1. भद्रबाहु स्वामी चंद्रगिरि पर्वत (प्राचीन नाम : कटवप्र) पर एक छोटी सी गुफा को अपनी साधना की स्थली बनाकर आत्म साधना में मग्न हो गए। साधना करते-करते उस गुफा में उनका समाधिमरण हुआ।
  2. इष्टोपदेश में कुल ५१ श्लोक है।
  3. ४९ पटल होते हैं। प्रथम नरक में १३, द्वितीय नरक में ११, तीसरे नरक में ९, चौथे नरक में ७, पांचवें नरक में ५, छठे नरक में ३ और सातवें नरक में १ इस तरह कुल ४९ पटल होते हैं।
  4. गुणस्थान चौदह होते हैं जो निम्न हैं— ०१) मिथ्यादृष्टि, ०२) सासादन सम्यग्दृष्टि, ०३) सम्यग्मिथ्यादृष्टि या मिश्र, ०४) असंयत या अविरत सम्यग्दृष्टि, ०५) संयतासंयत या देशविरत, ०६) प्रमत्तसंयत या प्रमत्तविरत, ०७) अप्रमतसंयत, ०८) अपूर्वकरण या अपूर्वकरण-प्रविष्टशुद्धिसंयत, ०९) अनिवृत्तिकरण या अनिवृत्तिकरणबादरसांपराय-प्रविष्टशुद्धिसंयत, १०) सूक्ष्मसांपराय या सूक्ष्म सांपराय प्रविष्ट शुद्धि संयत, ११) उपशांतकषाय या उपशांतकषाय वीतराग छद्मस्थ, १२) क्षीणकषाय या क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ, १३) सयोगकेवली और १४) अयोगकेवली नरक गति में १ से ४ गुणस्थान, तिर्यञ्चगति में १
  5. . अष्ट मूलगुण- १. मद्य, २. मांस, ३. मधु, ४. बड़, ५. पीपल, ६. पाकर, ७. कठूमर, ८. गूलर। इन आठों का त्याग अष्ट मूलगुण है। द्वितीय प्रकार से अष्ट मूलगुण- १. मद्य त्याग, २. मांस त्याग, ३. मधु त्याग, ४. रात्रि भोजन त्याग, ५. पाँच उदुम्बर फलों का त्याग, ६. जीव दया का पालन करना, ७. जल छानकर पीना ८. पंच परमेष्ठी को नमस्कार करना। ये आठ मूलगुण हैं। जो गुणों में मूल हैं उन्हें मूलगुण कहते हैं, जैसे-मूल (जड़) के बिना वृक्ष नहीं हो सकता है, वैसे ही इन आठ मूलगुणों के बिना श्रावक नहीं कहला सकता है। .
  6. (०१) ऐरावत हाथी (०२) शुभ्र बैल (०३) सिंह (०४) लक्ष्मी देवी (०५) दो फूूलमाता (०६) उदित होता हुआ सूर्य (०७) तारावलि से वेष्ठित पूर्ण चन्द्रमा (०८) जल में तैरती हुई मछलियों का युग्म (०९) कमल से ढके दो पूर्ण स्वर्ण कलश (१०) सरोवर (११) समुद्र (१२) सिंहासन (१३) देवविमान (१४) धरणेन्द्र विमान (१५) रत्नों की राशि और (१६) निर्धूम अग्नि ये सोलह स्वप्न हैं।
  7. कर्मो का आस्रव 108 द्वारों से होता है, उसको रोकने हेतु 108 बार णमोकार मन्त्र जपते हैं।
  8. अरिहंत - ४६ मूलगुण सिद्ध - ८ मूलगुण आचार्य - ३६ मूलगुण उपाध्याय - २५ मूलगुण साधु - २८ मूलगुण ~ राजेन्द्र कनैयालाल दफतरी, कोलकाता
  9. यह पर्वत एक लाख चालीस योजन ऊँचा है। इसकी नींव पृथ्वी के अन्दर १ हजार योजन की है अतः ऊपर में यह ९९००० योजन ऊँचा है इसकी चूलिका ४० योजन प्रमाण है। पृथ्वी के ऊपर इसका विस्तार १०००० योजन है। आगे घटते-घटते चूलिका के अग्रभाग में इसका विस्तार ४ योजन मात्र रह गया है। पृथ्वी पर जहां पर इसका विस्तार १०००० योजन है । भद्रशाल वन में चारों ही दिशाओं में चार जिनमन्दिर हैं। नंदनवन में चारों ही दिशाओं में एवं पांडुकवन की चारों ही दिशाओं में चार जिनमन्दिर होने से कुल १६ जिनमन्दिर हो जाते हैं। भद्रसाल के जिनमन्दिर का विस्तार २०० कोश, लम्बाई ४०० कोश और ऊँचाई ३०० कोश प्रमाण है। यही प्रमाण नंदनवन के चारों चैत्
  10. एकत्व भावना। ~ राजेन्द्र कनैयालाल दफतरी, कोलकाता
  11. उत्तर— हिंसा के चार भेद:— १. संकल्पी हिंसा २. उद्योगी हिंसा ३. आरंभी हिंसा ४. विरोधी हिंसा ~ राजेन्द्र कनैयालाल दफतरी, कोलकाता
×
×
  • Create New...