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JainSamaj.World
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Lyric: भक्तामर स्तोत्र श्लोक 2
य: संस्तुत: सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:।

स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥
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