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Lyric: भक्तामर स्तोत्र श्लोक 47
मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध -नोत्थम्।

तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥
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