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Lyric: भक्तामर स्तोत्र श्लोक 46
आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जङ्घा:।

त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥
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