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Lyric: भक्तामर स्तोत्र श्लोक 44
अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।

रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥
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