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  1. भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्।। 1॥ य: संस्तुत: सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:। स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥ बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्। बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥ वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्, कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिम
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  2. शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ।। सर्व साधू और सरस्वती, जिनमन्दिर सुखकार । महावीर भगवान् को मन मंदिर में धार।। जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी। वर्धमान हैं नाम तुम्हारा, लगे ह्रदय को प्यारा प्यारा ।। शांत छवि मन मोहिनी मूरत, शांत हंसिली सोहिनी सूरत। तुमने वेश दिगंबर धारा, करम शत्रु भी तुमसे हारा ।। क्रोध मान वा लोभ भगाया माया ने तुमसे डर खाया । तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता ।। तुझमे नहीं राग वा द्वेष, वीतराग तू हित उपदेश । तेरा ना
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  3. ॥दोहा॥ वीतराग वंदौं सदा, भावसहित सिरनाय। कहुँ कांड निर्वाण की भाषा सुगम बनाय॥ अष्टापद आदीश्वर स्वामी, बासु पूज्य चंपापुरनामी। नेमिनाथस्वामी गिरनार वंदो, भाव भगति उरधार ॥१॥ चरम तीर्थंकर चरम शरीर, पावापुरी स्वामी महावीर। शिखर सम्मेद जिनेसुर बीस, भाव सहित वंदौं निशदीस ॥२॥ वरदतराय रूइंद मुनिंद, सायरदत्त आदिगुणवृंद। नगरतारवर मुनि उठकोडि, वंदौ भाव सहित करजोड़ि ॥३॥ श्री गिरनार शिखर विख्यात, कोडि बहत्तर अरू सौ सात। संबु प्रदुम्न कुमार द्वै भाय, अनिरुद्ध आदि नमूं तसु पाय ॥४॥ रामचंद्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुण धीर। पाँचकोड़ि मुनि मुक्ति मंझार, पावागि
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  4. मैं देव श्री अरहंत पूजूँ, सिद्ध पूजूँ चाव सों । आचार्य श्री उवझाय पूजूँ, साधु पूजूँ भाव सों ॥ अरहंत भाषित वैन पूजूँ, द्वादशांग रचे गनी । पूजूँ दिगम्बर गुरुचरण, शिवहेत सब आशा हनी ॥ सर्वज्ञ भाषित धर्म दशविधि, दयामय पूजूँ सदा । जजि भावना षोडस रत्नत्रय, जा बिना शिव नहिंकदा ॥ त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम, चैत्य चैत्यालय जजूँ । पंचमेरु नन्दीश्वर जिनालय, खचर सुर पूजित भजूँ ॥ कैलाश श्री सम्मेदगिरि गिरनार मैं पूजूँ, सदा । चम्पापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा ।। चौबीस श्री जिनराज पूजूँ, बीस क्षेत्र विदेह के । नामावली इक सहस वसु जय होय पति शिव गेह के ।। दोहा
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  5. तजि के सरवारथसिद्धि विमान, सुभान के आनि आनन्द बढ़ाये | जगमात सुव्रति के नन्दन होय, भवोदधि डूबत जंतु कढ़ाये || जिनके गुन नामहिं प्रकाश है, दासनि को शिवस्वर्ग मँढ़ाये | तिनके पद पूजन हेत त्रिबार, सुथापतु हौं इहं फूल चढ़ाये || ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | मुनि मन सम शुचि शीर नीर अति, मलय मेलि भरि झारी | जनमजरामृत ताप हरन को, चरच
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  6. विध्यमान बीस तीर्थंकर अर्घ जल फल आठों द्रव्य, अरघ कर प्रीति धरी है, गणधर इन्द्रनहू तैं, थुति पूरी न करी है । द्यानत सेवक जानके (हो), जगतैं लेहु निकार, सीमंधर जिन आदि दे, बीस विदेह मँझार । श्री जिनराज हो, भव तारण तरण जहाज ।। ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।1। कृतिम-अकृतिम चैत्यालय अर्घ कृत्याकृत्रिम-चारु-चैत्य-निलयान् नित्यं त्रिलोकी-गतान्, वंदे भावन-व्यंतर-द्युतिवरान् स्वर्गामरावासगान् । सद्गंधाक्षत-पुष्प-दाम-चरुकैः सद्दीपधूपैः फलैर, नीराद्यैश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शांतये ।। ॐ ह्रीं त
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  7. मिथ्यातम नाश वे को, ज्ञान के प्रकाश वे को, आपा पर भास वे को, भानु सीबखानी है॥ छहों द्रव्य जान वे को, बन्ध विधि मान वे को, स्व पर पिछान वे को, परम प्रमानी है॥ अनुभव बताए वे को, जीव के जताए वे को, काहूं न सताय वे को, भव्य उर आनी है॥ जहां तहां तार वे को, पार के उतार वे को, सुख विस्तार वे को यही जिनवाणी है॥ जिनवाणी के ज्ञान से सूझेलोकालोक, सो वाणी मस्तक धरों, सदा देत हूं धोक॥ है जिनवाणी भारती, तोहि जपूं दिन चैन, जो तेरी शरण गहैं, सो पावे सुखचैन॥
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  8. उपजाति छन्द: सत्त्वेषु मैत्रीं गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपा-परत्वम्। माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ, सदा ममात्मा विदधातु देव॥ १॥ शरीरत: कत्र्तुमनन्त-शक्तिं, विभिन्नमात्मानमपास्त-दोषम्। जिनेन्द्र! कोषादिव खड्ग-यष्टिं, तव प्रसादेन ममाऽस्तु शक्ति:॥ २॥ दु:खे सुखे वैरिणि बन्धुवर्गे, योगे वियोगे भवने वने वा। निराकृताशेष-ममत्वबुद्धे: समं मनो मेऽस्तु सदाऽपि नाथ!॥ ३॥ मुनीश! लीनाविव कीलिताविव, स्थिरौ निखाताविव बिम्बिताविव। पादौ त्वदीयौ मम तिष्ठतां सदा, तमोधुनानौ हृदि दीपकाविव॥ ४॥ एकेन्द्
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  9. रंग मा रंग मा रंग मा रंग मा रंग मा रे प्रभु थारा ही रंग मा रंग गयो रे । आया मंगल दिन मंगल अवसर, भक्ति मा थारी हूं नाच रह्यो रे॥ प्रभु थारा.. गावो रे गाना आतम राम का, आतम देव बुलाय रह्यो रे॥ प्रभु थारा.. आतम देव को अंतर में देखा, सुख सरोवर उछल रह्यो रे॥ प्रभु थारा.. भाव भरी हम भावना ये भायें, आप समान बनाय लियो रे॥ प्रभु थारा.. समयसार में कुन्दकुन्द देव, भगवान कही न बुलाय रह्यो रे॥ प्रभु थारा.. आज हमारो उपयोग पलट्यो, चैतन्य चैतन्य भासि रह्यो रे॥ प्रभु थारा..
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  10. वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज। करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥ १॥ सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी। तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥ २॥ इक वे ते चउ इन्द्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा। तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदय ह्वै घात विचारी॥ ३॥ समरंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ। कृत कारित मोदन करिकै , क्रोधादि चतुष्टय धरिकै ॥ ४॥ शत आठ जु इमि भेदन तैं, अघ कीने परिछेदन तैं। तिनकी कहुँ कोलों कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥ ५॥ विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनय के। वश होय घोर अघ क
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  11. कविश्री वृन्दावनदास हे दीनबंधु श्रीपति करुणानिधानजी | यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी || मालिक हो दो जहान के जिनराज आपही | एबो-हुनर हमारा कुछ तुमसे छिपा नहीं || बेजान में गुनाह मुझसे बन गया सही | ककरी के चोर को कटार मारिये नहीं || हे दीनबंधु श्रीपति करुणानिधानजी | यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी ||१|| दु:ख-दर्द दिल का आपसे जिसने कहा सही | मुश्किल कहर से बहर किया है भुजा गही || जस वेद औ’ पुरान में प्रमान है यही | आनंदकंद श्री जिनेंद्र देव है तुही || हे दीनबंधु श्रीपति करुणानिधानजी | यह मेरी विथा क्यों न हरो बेर क्या लगी ||२|| हाथी पे चढ़ी जाती
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  12. भक्तामर स्तोत्र भाषा (कमलकुमार शास्त्री कुमुद) भक्त अमर नत-मुकुट सुमणियों, की सुप्रभा का जो भासक। पापरूप अतिसघन-तिमिर का, ज्ञान-दिवाकर-सा नाशक॥ भव-जल पतित जनों को जिसने, दिया आदि में अवलम्बन। उनके चरण-कमल को करते, सम्यक् बारम्बार नमन॥ १॥ सकल वाङ् मय तत्त्वबोध से, उद्भव पटुतर धी-धारी। उसी इन्द्र की स्तुति से है, वन्दित जग-जन मनहारी॥ अति आश्चर्य की स्तुति करता, उसी प्रथम जिन स्वामी की। जगनामी-सुखधामी तद्भव-शिवगामी अभिरामी की॥ २॥ स्तुति को तैयार हुआ हूँ, मैं निर्बुद्धि छोड़ के लाज। विज्ञजनों से अर्चित हैं प्रभु, मंदबुद्धि की रखन
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  13. यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद भज सुख लीजे । पहली आरती श्री जिनराजा, भव दधि पार उतार जिहाजा । यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद भज सुख लीजे दूसरी आरती सिद्धन केरी, सुमरण करत मिटे भव फेरी । यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद भज सुख लीजे तीजी आरती सूर मुनिंदा, जनम मरन दुःख दूर करिंदा । यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद भज सुख लीजे चोथी आरती श्री उवझाया, दर्शन देखत पाप पलाया । यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद भज सुख लीजे पाचवी आरती साधू तिहारी, कुमति विनाशक शिव अधिकारी । यह विधि मंगल आरती कीजे, पंच परम पद
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