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भक्तामर स्तोत्र : हिन्दी - आशु


admin

(आशु अमन ललितपुर)

 

झुके हुए सिर इंद्रों के मणियों की फैली तब आभा।

मिथ्यातम का गहन तिमिर पल में ही वहाँ से फिर भागा॥

भवसागर में फँसे हुए भवि ध्याते तुमको मिटे भ्रमण।

त्रिभुवन के तुम शिरोमणि हो जिनवर तुमको कोटि नमन॥ १॥

 

जिनवर वाणी द्वादशांग है, तत्त्व ज्ञान उपजाती है।

वाणी आपकी जग कल्याणी मन को खूब लुभाती है॥

मंदबुद्धि है फिर भी जिनवर चरणों में करते गुण गान।

आदिश्वर है आदि तीर्थंकर पदपंकज में करूँ प्रणाम॥ २॥

 

देव इन्द्र राजेन्द्र भी जिनवर कर न सके पूरा गुणगान।

मैं तो हूँ अल्पज्ञ हे जिनवर! काव्य छंद का नहीं है ज्ञान॥

मेरी स्तुति ऐसी जिनवर चाँद को ज्यों बालक मचले।

नीर भरा हो जब थाली में चाँद को उसमें वो पकड़े॥ ३॥

 

चन्द्रप्रभा सम गुणों के सागर जिनवर की अद्भुत महिमा।

मैं तो क्या वाचस्पति भी गा पाये कहाँ इनकी गरिमा॥

जब मगरमच्छ से युत हो सिन्धु आता रहता हो तूफान।

आश्चर्य महा होता है जिनवर पार उसे करले इंसान॥ ४॥

 

शक्ति नहीं है फिर भी जिनवर भक्ति करने आये हैं।

भक्ति आपकी करती प्रेरित स्तुति करने आये हैं॥

हिरणी जैसे सिंह सामना करने से नहीं डरती है।

शिशु रक्षा के लिए ही वह तो सिंह सामना करती है॥ ५॥

 

जिनवर आपकी भक्ति ने अब बना दिया मुझको लाचार।

विद्वत जन भी हँसेंगे मुझ पर करता नहीं मगर परवाह॥

ऋतु बसंत जब आती है कोयल की वाणी लगे मधुर।

आम्र मंजरी ही कोयल को बोलने पर करती है विवश॥ ६॥

 

सुना है हमने अब तक जिनवर! जिनभक्ति से पाप कटें।

पापों का क्षय करने को हम स्तुति जिनवर तेरी करें॥

अन्धकार से भरी हो अवनी अमावश सी लगे निशा।

भविजन जो जिन शरण में जाते अन्धकार में दिखे प्रभा॥ ७॥

 

जिनवर आप गुणों के सागर गुणों से आप महकते हो।

मैं तो हूँ अल्पज्ञ जिनेश्वर विज्ञ भी सुमरन करते हैं॥

कमल पत्र पर जब भी जिनवर नीर की बूँद टपकती है।

अस्तित्त्व आपका ऐसा जिनवर मोती तुल्य चमकती है॥ ८॥

 

सम्पूर्ण दोष उसके मिट जाते जो भवि करते जिनभक्ति।

पुण्य कथा ही आपकी सुनकर चिर पापों से मिले मुक्ति॥

कोसों दूर रहे सूरज भी धरा से तम फिर भग जाता।

पंकज विकसित सुरभित होता जब रवि किरणें बिखराता॥ ९॥

 

त्रिभुवन के परमेश्वर तुमको जो भी उर से ध्याते हैं।

नहीं कोई आश्चर्य हे जिनवर! वो भी तुम सम बन जाते हैं॥

सेवक बन शरणा जो आये उसको मिलता है ऐश्वर्य।

भक्तों को भी निज सम करते नहीं अधिक होता आश्चर्य॥ १०॥

 

रूप आपका देख के जिनवर नयन मेरे अब हार गए।

देख आपको जी नहीं भरता इसीलिए हैं निहार रहे॥

क्षीरोदधि के मीठे जल का जिसने भी है पान किया।

खारे जल का कभी नहीं फिर उसने तो सम्मान किया॥ ११॥

 

वीतरागता के अणुओं से मिलकर जिन की देह बनी।

तीन लोक के शिरोमणि जिन, तुम जैसा नहीं और कहीं॥

जिनवर की छवि को जब देखा राग न कहीं झलकता है।

उनके रूप की खुशबू से फिर सारा जग महकता है॥ १२॥

 

श्री मुख की आभा अनुपम है सबको मोहित करती है।

सुर नर हो चाहे मुनिगण हो यह आकर्षित करती है॥

चाँद की उपमा देने वालों जिन मुख चाँद न कहलाता।

जब दिन में रवि का प्रकाश हो चाँद कहा है नजर आता॥ १३॥

 

चन्द्र बिम्ब की धवल कांति मय तीनलोक हो गए धवल।

त्रिभुवन के ये शिरोमणि हैं आपके गुण हैं सभी विमल॥

आदिश्वर के चरण कमल का जो भवि लेते हैं आश्रय।

धरती पर वे करते विचरण ऐसे नर होकर निर्भय॥ १४॥

 

जब देवलोक से परियाँ आयीं नाना रूपों को धरकर।

जिनवर की दृष्टि थी निज पर चली गयी थी वो थककर॥

हवा के झोंके चलते रहते मेरु फिर भी अडिग रहे।

श्री जिन हैं मेरु सम निश्चल तन मन उनका अचल रहे॥ १५॥

 

तेल बिना बत्ती न हो फिर भी दीपक क्या जलता है।

आँधी तूफाँ हर क्षण आते तो भी यह न बुझता है॥

जिनवर ही ऐसे दीपक हैं त्रिभुवन के जो तम को हरे।

आलोक आपका हरपल रहता चाहे दिन हो रात रहे॥ १६॥

 

अस्त है जिसका कभी न होता राहु का बनते ना ग्रास।

सूरज से बढक़र है जिनवर परम तेजयुत आप प्रकाश॥

तेज आपका ऐसा जिनवर तीनों लोक झलकते हैं।

चाँद सितारे कहाँ हैं लगते रवि से अधिक चमकते हैं॥ १७॥

 

मोह तिमिर के नाशक श्री जिन सत्यधर्म का करे प्रकाश।

काले बादल ढक नहीं पाते हर क्षण तम का करते नाश॥

जिन मुख की कांति है ऐसी चाँदनी फीकी लगती है।

तीन लोक का तम भग जाता आभा ऐसी निकलती है॥ १८॥

 

दिन के लिए दिवाकर तुम हो शाम को तुम हो चाँद लगो।

तिमिर वहाँ कैसे रह सकता जहाँ पर जिनवर आप रहो॥

फसलों के पक जाने पर ज्यों जलधर का ना काम रहे।

आपकी दिव्य ज्योति के आगे रवि शशि भी बदनाम रहे॥ १९॥

 

महातेजस्वी आप हो जिनवर ज्ञान भी स्वपर प्रकाशक है।

हरिहरादि देवों का ऋषिवर ज्ञान ना तिमिर नाशक है॥

जगमग वहाँ प्रकाश है अनुपम मणिमुक्तायें रहे जहाँ।

वैसी रश्मियाँ नहीं फैलती रत्न कहाँ और काँच कहाँ?॥ २०॥

 

राग द्वेषमय देव ये देखे अब तक उनको था माना।

आपका दर सच्चा है जिनवर उनको देख के ही जाना॥

आपको देखा जब से जिनवर मुझको भारी लाभ हुआ।

अन्य किसी में मन नहीं भरता तुमसे ही अनुराग हुआ॥ २१॥

 

यहाँ धरा पर शतकों मातायें शिशुओं को जनती हैं।

पर आदिश्वर की जननी मरुदेवी ही बस बनती है॥

गगन में लाखों तारे आते जब भी होती है निशा।

सूरज एक अकेला जिनवर उसे जने बस पूर्व दिशा॥ २२॥

 

तुम ही जिनवर आदि मुनीश्वर सत्यज्ञान प्रकाशक हो।

शरणा आपकी भविजन आते आप ही शिवपुर शासक हो॥

जनम मरण से रहित वो होता जो भी इनको ध्याता है।

बिना आप कोई न जिनवर शिवपुर राह बताता है॥ २३॥

 

आदि तीर्थंकर आदि जिनेश्वर तुम्ही तो जिनवर कहलाते।

ब्रह्मा ईश्वर और जगदीश्वर जिनवर के नाम हैं बतलाते॥

योगीश्वर हो तुम शिवशंकर और भक्त गण कहे मुनीश।

नाम आपके अनंत जिनवर त्रिभुवन के तुम ही हो ईश॥ २४॥

 

गणधरादि इंद्रों से पूजित तुम्ही विधाता हो जिन बुद्ध।

त्रिभुवन में शांति के दाता आप ही जिनवर लगते विशुद्ध॥

शिवपुर के अनुगामी तुम ही इसलिए हो तुमतो गणेश।

उत्तम तुम सबसे अवनी पर आप विधाता आप हो ईश॥ २५॥

 

त्रिभुवन के दु:ख तुम हरते हो हे आदिश्वर! तुम्हें नमन।

भूमण्डल के तुम आभूषण प्रथम तीर्थंकर! तुम्हें नमन॥

तीन लोक के पिता परम तुम नाभिराय के सुत को नमन।

भव सागर से सबको तिराते हे परमेश्वर! तुम्हें नमन॥ २६॥

 

थे जितने विशुद्ध परमाणु तुममें ही जिनवर आये।

आश्चर्य नहीं कोई मुनिवर सद्गुण ही तुममे आ पाये॥

दोष न किंचित आ पाये बने रहे उज्ज्वल अभिराम।

सपने में भी दोष नहीं दिखते तुममे हे निर्मल धाम॥ २७॥

 

तरु अशोक की छाँव तले जिन काया की फैली कांति।

रूप रश्मियाँ फैलती रहती होती है मन को भ्राँति॥

जिनवर का तन ऐसा लगता अवनी से मानो रवि निकला।

फैली जिन कांति अवनी पर तिमिर वहाँ से फिर निकला॥ २८॥

 

मणिमुक्तायें चमक रहीं हैं अनुपम लगता सिंहासन।

हेम समाँ उज्ज्वल लगता है तब जिनवर का उस पर तन॥

चोटी पर उदयाचल की मानो लगता है रवि निकला।

सुंदर तुम सा लगता जिनवर जब वह किरणें बिखराता॥ २९॥

 

अनुपम श्वेत चँवर तन ढुरना मन को प्रमुदित है करता।

स्वर्णचल के तुंग शिवर पर मानो गिरता हो झरना॥

दिव्य देह जिनवर की उस क्षण बहुत ही मन भावन लगती।

श्वेत चँवर जब गिरते उठते चाँदनी सी आभा दिखती॥ ३०॥

 

अतुल कांति से सहित हुआ जो मणिमुक्तामय अति सुन्दर।

तीन छत्र हर क्षण शोभित हैं तब जिनवर के सिर ऊपर॥

सम्पूर्ण विश्व में निर्मल है जिनवर का होता है शासन।

त्रिभुवन के परमेश्वर के दर्शन से मन होता पावन॥ ३१॥

 

दसों दिशायें ऊँचे स्वर में करती रहती हैं गुंजन।

स्तुति करता जो जिनवर की प्राप्त हो केवलज्ञान विमल॥

गँूजते रहते नभ में हर क्षण धर्मराज के मधुर वचन।

दुंदुभि बजकर करती रहती जिनवर का यश ज्ञान विमल॥ ३२॥

 

कल्पवृक्ष के पुष्प है अनुपम मन को प्रमुदित करते हैं।

शीतल-शीतल मंद पवन के झोंके बहते रहते हैं॥

मंद वृष्टि गंधोदक की तब धरा गगन पावन करती।

जिनवर की तब दिव्य देशना पंक्ति बाँध मानो खिरती॥ ३३॥

 

त्रिभुवन की सुन्दरता जब जिनवर के सन्मुख है आती।

उनकी छवि को देख देखकर यूँ ही वह शरमा जाती॥

कोटि रवि भी साथ में चमके जिनवर सा नहीं दिव्य प्रकाश।

शीतलता ही मिलती रहती होता नहीं कभी संताप॥ ३४॥

 

प्रभवुर की है दिव्य देशना मोक्ष स्वर्ग पथ बतलाती।

मिथ्या धर्म को तज कर यह तो सत्य धर्म को समझाती॥

जो भविजन भी सुनते इसको कर लेते अपना उद्धार।

भाषा को परिवर्तित करते अपने-अपने ही अनुसार॥ ३५॥

 

नख की शोभा अद्भुत लगती जहाँ रखे मुनिनाथ चरण।

वहाँ देवगण रचते रहते स्वर्ण छवि से सहित कमल॥

चरण आपके पूज्य हैं जिनवर उनकी शोभा लगे महान।

गणधरादि इन्द्रों से वंदित तीन लोक के तुम भगवान॥ ३६॥

 

जिनवर की छवि अद्भुत है उनके जैसा कोई नहीं।

अन्य कुदेवों ने प्रभुवर के जैसी ख्याति पायी नहीं॥

जग का कल्मष शमन करे उसको चाँद कहा जाता।

ग्रह नक्षत्रों में जिनवर वह तेज कभी नहीं आता॥ ३७॥

 

लोल कपोलों से झर-झर कर बहती रहती मद की धार।

मद के भरे हुए भौंरे भी करते हैं जिस पर गुंजार॥

क्रोधाशक्त हुआ हो गज भी ऐरावत-सा धर आकार।

करता जो जिनवर का सुमरन हो जाता है भव से पार॥ ३८॥

 

क्रोधी सिंह छलागें भरकर अगर गजों पर वार करे।

टपक रहे गजमुक्ता उज्ज्वल रक्त से वसुधा शृंगार करे॥

सिंह अगर ऐसा भक्तों पर वार करे तो चोट कहाँ।

जिनवर के युगपद कमलों की हो भक्तों को ओट जहाँ॥ ३९॥

 

वायु अग्नि प्रलय काल की मचा रही हो हाहाकार।

चिंगारी अंगारे निकले विश्व का बदला हो आकार॥

ऐसे दु:ख के क्षण में जो भवि जिनवर का यशगान करें।

बाधायें सारी दूर हो उनकी वे नर सुख का पान करें॥ ४०॥

 

विषधर सर्प भयंकर भारी दिखते हैं मानो हो काल।

लाल आँख अतिक्रुद्ध महा लगते हों वे अति ही विकराल॥

अवनी ऐसी नाग जहाँ और उनका ही आतंक रहे।

नाथ तुम्हारी शरण जो आये वो तो फिर निशंक रहे॥ ४१॥

 

अश्व जहाँ हिन-हिन करते हों, गज चिंघाड़ते रहते हों।

समर भूमि का दृश्य भयानक अति कोलाहल करते हों॥

जिनवर की स्तुति करता जो विजय वही पा जाता है।

रवि रश्मि उजियारा करती तिमिर कहाँ रह पाता है?॥ ४२॥

 

अस्त्र तमाम गजों को भेदे तन से रक्त रहे बहता।

वहाँ निरंतर रक्त से पूरित बहती रहती हो सरिता॥

आदिश्वर के नाम को लेकर जो भी उनको ध्याते हैं।

चरण कमल का आश्रय लेकर भवदधि पार हो जाते हैं॥ ४३॥

 

सागर ऐसा जिसमें होवें मगरमच्छ एवं घडिय़ाल।

लहरें वहाँ भयंकर उठती जीव जन्तु होवें विकराल॥

सिंधु भँवर के मध्य कोई फँस जाता है जब जलयान।

पार हुए वे तो उस क्षण ही लिया जिन्होंने प्रभु का नाम॥ ४४॥

 

बेड़ी लोह की पड़ी हुई हो नख से शिख तक देह बंधी।

साकल से तन छिलता रहता कंठ से लेकर जाँघ छिली॥

कारागृह में रहकर जो भी प्रभु का सुमरन करते हैं।

बंधन टूटते क्षण में उनके दु:ख पलायन करते हैं॥ ४५॥

 

महाजलोधर रोग हुआ हो पीड़ा हर क्षण बढ़ती हो।

साँसें बस आती-जाती हों जीने की आशा घटती हो॥

ऐसे पीडि़त जो भी नर जिनवर की शरण में आते हैं।

पीड़ा उनकी झट भग जाती तन कामदेव सा पाते हैं॥ ४६॥

 

सिंह, अश्व और गजों से समर भूमि का दृश्य महा।

सर्प जलोधर बंदीगृह और दृश्य हुआ हो आग लगा॥

जीवन में दु:ख भरे हुए हों, आती हो जब विपदाएँ।

श्री जिन के नित चिंतन से पल में ही वहाँ से भग जाएँ॥ ४७॥

 

जिनवर के गुण सुमनों से युत हमने हार बनाया है।

जिनवर के गुण हैं अनंत नहीं हमने गाने पाया है॥

आदिश्वर की स्तुति करने जो श्रद्धा सहित शरण आये।

मानतुंग सम अमन भक्त बन आत्म विशुद्धि को पाये॥ ४८॥

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