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अहिंसा संगोष्ठी : अहिँसा विषय पर आपकी पंक्तियां


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नियम / दिशा निर्देश 

  • आपको अहिंसा पर आधारित एक वाक्य अथवा कुछ पंक्तियां लिखनी है |
  • वाक्य ऐसा होना चाहिए जो अभी तक किसी और ने ना लिखा हो |
  • सामूहिक  प्रस्तुतीकरण का हो प्रयास - अहिंसा का कोई विषय अछूता ना रहे|
  • आपकी रचनात्मकता शैली इस प्रयोग को  सफल बनाएगी
  • आपकी पंक्ति / पंक्तियों के अंत मे अहिंसा परमो धर्म की जय  लिख सकते हैं |
  • चित्र भी साथ मे संलग्न कर सकते हैं (  जैसे परीक्षा मे उत्तर देते हुए Diagram भी बनाते हैं)
  • आप अंग्रेजी, मराठी अन्य भाषा में भी लिख सकते हैं 
  • आप को पूरा निबंध नहीं लिखना हैं सिर्फ - कुछ पंक्तियाँ लिखनी हैं 
  • आपके वाक्य को दो बार ना लिखे - एडिट क्लिक कर सुधार कर सकते हैं 

 3 october 21  रात्री दस बजे तक भाग लेने वालो मे* 
तीन प्रतिभागियों  का चयन लक्की ड्रॉ द्वारा उपहार के लिए  किया जाएगा 
उनके वाक्यों पर 5 पसंद Like होना अनिवार्य 

 

करे शुरुआत 

अहिंसा जैनाचार का प्राण तत्व हैं - इसे ही परम ब्रह्म और  परम धर्म कहा गया हैं |

अहिंसा परमो धर्म की जय

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  • Saurabh Jain changed the title to अहिंसा संगोष्ठी : अहिँसा विषय पर आपकी पंक्तियां

 वेबसाइट संचलान हेतू सहयोग दे सकते हैं 

जीवित प्राणियों को उन लोगों से भय नहीं रहता जिन्होंने अहिंसा का व्रत लिया हो। जैन धर्म के अनुसार, जीवन की सुरक्षा, जिसे "अभयदानम्" के रूप में भी जाना जाता हैं, सर्वोच्च दान हैं जो कोई व्यक्ति कर सकता हैं।

 

लक्ष्मी जैन..अनसिंग.

 

Edited by Laxmi jain
फोन नंबर हटाया - आपको फोन नंबर नहीं लिखना हैं
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 अहिंसा परम धर्म हैं, अहिंसा परम संयम है, अहिंसा परम दान है तथा अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा परम फल है, अहिंसा परम मित्र है और अहिंसा परम सुख है.  

Edited by Kanak jain hazaribagh
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अहिंसा का सामान्य अर्थ हैं हिंसा न करना। मन, वचन ,काय से षट्काय के जीवों की रक्षा करना।         .  ...   अहिंसा परमोधर्मः 

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🙏अहिंसा: जैन धर्म में अहिंसा संबंधी सिद्धान्त प्रमुख है। मन, वचन तथा कर्म से किसी के प्रति असंयत व्यवहार हिंसा है। पृथ्वी के समस्त जीवों के प्रति दया का व्यवहार अहिंसा है। इस सिद्धांत के आधार पर ही जियो और जीने दो का सिद्धांत परिकल्पित हुवा है |

Edited by Deepti_jain
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"Ahinsa" Ka arth hai -: 'Hinsa ka poorntaya tyag'.

Ahinsa jain Dharm ka Adhaar Stambh hai.

"Jeevo ki raksha karna hi hum sabhi jaino ka mahatvapurn prayaas hai."

"Ahinsa Parmo Dharma"

Edited by Chand Jain
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 काम हो रहा मिलजुल कर, वहांं हिंसा का क्या काम

 इसीलिए तो श्रेष्ठ कहलाता,यह सत्य"अहिंसा"नाम|

 'मारपीट'कर कोशिश करते,नहीं बनता उनका काम

 अब तो छोड़ो हिंसा को,शायद बन जाये वह'काम'|

 दर्द को समझो,माफ करो तुम सब जीवित प्राणी को

 एक बार तुम ध्यान से सुन लो तीर्थंकर की वाणी को|

 कलयुग है हिंसा से पीड़ित,'हिंसक'बन गया इंसान

 कर्म करो तुम अपने अच्छे,स्वयं पुकारेंगें"भगवान"||

 

[मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है, सत्य मेरा भगवान है और अहिंसा उसे पाने का साधन है]

                   "अहिंसा परमो धर्मः"

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 जैन धर्म के मूलमंत्र में ही अहिंसा परमो धर्म: (अहिंसा परम (सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है।

 

 

Edited by Shivani
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अहिंसा का सामान्य अर्थ है 'हिंसा न करना'। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना।

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अहिंसा एक रहस्यमई शब्द है जिसे कम ही लोग समझते हैं अधिकतर लोग यही जानते हैं कि किसी से किसी की पिटाई मत करो किसी को घायल मत करो किसी की जान मत लो यही अहिंसा है अहिंसा का यह अर्थ तो है ही इसके अतिरिक्त यदि किसी व्यक्ति को अपमानित करते हैं तो यह भी एक प्रकार की हिंसा है किसी के बारे में बुरा सोचते हैं यह भी एक प्रकार की हिंसा है

Jj 

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चार प्राकार की हिंसा में से एक संकल्पई हिंसा न करने का प्रण करके अहिंसा धर्म का पालन कर सकेंगे।इन्द्रिय संयम व प्राणी संयम को अपना कर भी हम अहिंसक बन सकते है

 

अहिंसा परमोधर्म ही श्रेष्ठ है।

Edited by SavitaJain
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सत्य अहिंसा गीत सुनायेंभारत की महिमा बतलायें छोडोंविदेशी भाषा तुम्हें आना पड़ेगा इस देश में दुबारा गांधी मोदी का आह्वान सबके हित में भैया धर्म अहिंसा मन में धारों बचा लो अपनी गैयाअहिंसा परमोधर्म की जय

रानी देवी जैन जयपुर राजस्थान मोबाइल नंबर 9309365730

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  द्रव्य में ना हो प्रमाद ना हो भावों में आवेग हर क्षण सम्यकत्व  परम अहिंसा का यही है सहज भेद अर्थ और रुप

मीना पाड़लिया

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जो संसार के दुखो से प्राणियो को निकालकर उत्तम सुख मे पहुंचाता है वह अहिंसामय धर्म है, भगवान महावीर के द्वारा कह गयेपांच महाव्रत में प्राणी हिंसा से विरत होना अहिंसा महाव्रत है और इसे सबसे पहले रखा है  अहिंसा का आशय किसी को न मारना वध करना नहीं है अपितु करुणा भाव दयाभाव और  कषायपुर्वक मन वचन काय की प्रवृति न करना है  

निश्चय से रागादि भावो का उदभव न होना यही अहिंसा है और उनकी उत्पति होना हिंसा है यही जैन धर्म का सिद्धांत है जयजिनेंद्र

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              अहिंसा जननी है-

जीवन विकास की,

             अंतर विलास की,

विश्व शांति की,

             आध्यात्मिक क्रांति की,

सत्य अमृत की,

            अस्तेय व्रत की,

ब्रह्मचर्य बल की,

           अपरिग्रह सुफल की,

मैत्री भाव की,

            करुणा स्वभाव की।

अहिंसा व सत्य जैन धर्म की धड़कन है।

यदि अपनाना चाहते हो तो "अहिंसा परमो धर्म:" अपनाओ।

अर्थात अहिंसक ही क्षमा धारण कर सकता है

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भगवान महावीर ने अपनी वाणी से और अपने स्वयं के जीवन से इसे वह प्रतिष्ठा दिलाई कि अहिंसा के साथ भगवान महावीर का नाम ऐसे जुड़ गया कि दोनों को अलग कर ही नहीं सकते। अहिंसा का सीधा-साधा अर्थ करें तो वह होगा कि व्यावहारिक जीवन में हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुख न दें।

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काया, वाचा व मन यांनी कोणालाही इजा/दुखापत न करणे म्हणजे अहिंसा. अहिंसे चे तत्व सर्वांनी स्वीकारल्यास संपुर्ण विश्वा मध्ये सुख शांती व समाधान नांदेल.जैन धर्मा मध्ये अहींसे ला खूप महत्त्व आहे. भगवान महावीर स्वामींचा संदेश परोस्परो ग्रहानाम(जगा आणि जगू द्या) याची आज संपुर्ण विश्वाला खूप गरज आहे.

     "जय जिनेन्द्र"

 

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यदि आप अपने स्वार्थ के लिए किसी भी जीवित प्राणी को चोट नहीं पहुँचाते, दुर्व्यवहार नहीं करते, उसका उत्पीड़न नहीं करते, उससे दासता नहीं करवाते, उसका अपमान नहीं करते, उसे पीड़ा नहीं पहुँचाते, उसे यातना नहीं देते या उसकी हत्या नहीं करते तो आप अहिंसावादी है।

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सुख का मूल धर्म है।

धर्म का मूल दया है।

दया का मूल अहिंसा है।

 

।।जय जिनेंंन्द्र।।

Edited by Jinal Shah
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 हिंसा किसी मनुष्य, समाज और देश के लिए हितकर नही हो सकता हैं इसलिए अहिंसा ही सबका धर्म होना चाहिए. 

 हम खुशनसीब हैं कि हम भगवान महावीर के वंशज हैं जिसका अहिंसा ही धर्म है और अहिंसा ही मर्म. ।।।।।।

अहिंसा परमो धर्म...।।

 

Edited by Arti jain
Double ho gaya tha
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  अहिंसा सही मायने में तभी चरितार्थ है जब हम खुद तो हिंसा होने  व करने से बचें पर हिंसा को देखने व करने से भी सबको रोके

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अहिंसा का सीधा-साधा अर्थ करें तो वह होगा कि व्यावहारिक जीवन में हम किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं, किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दुख न दे 

Ahinsa_Parmo_Dharm.jpg

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