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अजित कुमार के जैन

तत्वार्थ सूत्र अध्याय 2 सूत्र 1

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जीव और अजीव की स्वाभाविक और वैभाविक अवस्था को भाव कहते हैं।

भाव ५ होते हैं

१. ओपशमिक भाव   कर्म के उपशम से होने वाले भावों को औप़शमिक भाव कहते हैं।यह भाव केवल मोहनीश कर्म में ही पाया जाता हैं। अर्थात हम अपनी कषायों का कुछ समय के लिए दबाने पर हमारे भावों की जो  शुभ स्थिति उत्पन्नहोती है उसेऔपशमिक भाव कहते हैं। जैसे गन्दे जल को एक ग्लास में कुछ समय के लिए रख दिया जाए तो गंदगी नीचे बैठ जातीहैऔर ऊपरपानी साफ़ दिखता है लेकिन यदि उसे हिला दिया जाए तो पानी पुन:गंदा हो जाता है। इसी प्रकार हम अपनीकषायों को थोड़े समय के दबा लें तो उतने समय में हमारे भाव शुभ हो जातेहैं।इसी स्थिति में उत्पन्न शुभ भावों को औपशमिक भाव कहते हैं। लेकिन भावों का शमन अधिकतम एक मुहुर्त (४८मिनट) तक ही किया जा सकता है इसके पश्चात पूर्व स्थिति में आना ही पड़ता है।

२ क्षायिक भाव  कर्म के सम्पूर्ण रूप से क्षय होने से उत्पन्न होने वाले भाव क्षायिक भाव कहलाते हैं। यह भाव आठों कर्मों में पाया जाता है।जैसे ज्ञानावरणी कर्म के क्षय से केवलज्ञान,दर्शनावरणीय कर्म के क्षय से केवल दर्शन, मोहनीय कर्म के क्षय से क्षायिक सम्यक्त्व,तथा अन्तराय कर्म के क्षय से क्षायिक दान,लाभ,भोग,उपभोग वीर्य आदि क्षायिक का अर्थ स्थायी नाश।उदाहरण गन्दे जल से भरे हुए गिलास को कुछ समय तक रखने के पश्चात गंदगी नीचे बैठ जाने पर ऊपर के साफ़ जल को किसी दूसरे ग्लास में अलग कर लेना। अब यह दूसरे ग्लास का साफ़ जल कितना भी हिलाने पर कभीपुन: गंदा नहीं होगा।इसी प्रकार कर्मों के क्षय होने से उत्पन्न शुभ भाव फिर कभी दूषित नहीं होते।इसे ही क्षायिक भाव कहतेहें।स्थायी हैं।

क्षायोपशमिक भाव

उदय में आये हुएकर्मों का क्षय तथा जो कर्म बँधे तो हैं,लेकिन अभी उदय में नहीं हें,भविष्य में उदय में आयेंगें,उनका शमन करने के परिणाम स्वरूप जो भाव उत्पन्न होते हैं,उन्हें क्षायोपशमिक भाव कहते हैं।केवल ४ घातिया कर्मों में ही क्षायोपशमिक होते हैं।अघातिया कर्म क्षायोपशमिक नहीं होते।आपने कहते सुना होगा कि हमारे क्षयोपशम कम है यानि हम हमने विभिन्न पुरुषार्थों से ज्ञान की वृध्दि कर लेते हैं,अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से साता कर्म की वृध्दि करते हैं,आदि आदि।

इसमें ४घातिया कर्मों ज्ञानावरणीय,दर्शनावरणीय मोहनीय और अन्तराय कर्मों का तप आदि के बल से आंशिक रूप से कुछ कर्मों का(जो उदय में रहते हैं) उनका तो स्थायी नाश कर दिया जाता है एवं जो कर्म उदय में आने वाले हैं,उन्हें कुछ समय के लिए तपस्या के बल से कुछ समय के लिए उदय में आने से रोक देते हैं। इस स्थिति में उत्पन्न शुभ भावों को क्षायोपशमिक भाव कहते हैं।उदाहरण  गंदे जल से भरे ग्लास को कुछ समय रखने के अधिकतर गंदगी तो नीचे बैठ जातीहै लेकिन बहुत सूक्ष्म गंदगी ऊपरके जल में फिर भी तैरती रहती है जिसके कारण पानी का रंग हल्का हल्का मटमैला सा रहता है। अब इस ऊपर  कम गंदगी वाले जल को अलग बर्तन में निकाल लें। इस जल को हिलाने से भी अब बड़ी गंदगी जल में नहीं आयेगी अपितु सूक्ष्म प्रकार की गंदगी अवश्य दिखेगी,।बस यही स्थिति क्षायोपशमिक भावों की होतीहैं। अर्थात क्षायोपशमिक भावों में स्थ्ति जीव अधिकांश रूप में शुभ भावों में स्थिर रहताहै 

ओदायिक भाव

 कर्मों के उदय से होने वाले भावों को औदायिक भाव कहते हैं।यह आठों कर्मों में पाये जाते हैं।जब जिस कर्म का उदय होता है,उसी के अनुरूप उत्पन्न भावों को औदायिक भाव कहते हैं। यह सामान्य भाव है,  जैसे ४ गति,४कषाय ६ लेश्या,३ वेद(स्त्री,पुरुष,नपुंसक),मिथ्यात्व,अज्ञान,असंयम और असिध्दत्व  यह सब अशुभ भावहैं जो कर्मों के उदय मैं होते हैं।

पारिणामिक  भाव

 इस संबंध में विस्तार से पूर्व में बताया जा चुका है।

 

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