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अजित कुमार के जैन

तत्वार्थ सूत्र स्वाध्याय अध्याय 2सूत्र13

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पांचों स्थावरों के  चार चार  भेद कहे हैं जैसे पृथ्वी के पृथ्वी, पृथ्वीकाय ,पृथ्वीकायिक,पृवीजीव  तो इन चारों क्या भिन्नता हैै। 

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पृथ्वी जीव 

पृथ्वी कायिक नाम कर्म के उदय वाला जब तक विग्रहगति में रहता है तब तक वह पृथ्वीजीव कहलाता है।

पृथ्वीकाय  

 जिस शरीर में पृथ्वीकायिक जीव जन्म लेता है उसे पृथ्वीकाय कहते हैं।निर्जीव ईंट पत्थर  आदि

पृथ्वीकायिक जीव 

पृथ्वीकाय में जन्मलेने वालाजीव पृथ्वीकायिक जीव कहलाता हैअर्थात पृथ्वी है शरीरजिसका उसे पृथ्वी कायिक जीव कहते हैं।

उदाहरण

जब तक सोना चाँदी तांबा कोयला मार्बल आदि खनिज पदार्थ खान में रहते हैं,उनमें वृध्दि होती रहती है तब तक वह पृथ्वी कायिक जीव कहलाताहै लेकिन जब उसे खान से बाहरनिकाल लिया जाता है तो उसमें वृध्दि रुक जाती है क्यों कि खान से बाहर निकलने पर पृथ्वीकायिकजीव का मरण हो जाता है  और वहाँ केवल पृथ्वी काय (शरीर) शेष रह जाता है।

इसी प्रकार जब तक जल अपने स्वाभाविक रूप(सामान्य) रूप में रहता है  तब तक उसमें जलकायिक जीव रहता है लेकिनजैसे ही जल को गर्म करते हैं तो गर्म करनेसे जलकायिक जीव का मरण हो जाता है और वहाँ केवल जलकाय शेष रह जाता है।

पृथ्वी 

मार्ग की उपमर्दित धूल को पृथ्वी कहते हैं।अपनी मूल स्थिति में(without disturbed) में भूमि को पृथ्वी कहतेहैं।खुदाई करने के बाद तो बह पृथ्वी काय रह जाता है जिसमें पृथ्वी कासिक जीव की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।

पृथ्वी और पृथ्वीकाय दोनों अचित्त है तथापिपृथ्वी में जीव पुन:उत्पन्न होसकता है लेकिन पृथ्वीकाय मेंनहीं।

इसी प्रकार जलकायिक,अग्नि कायिक वायू कायिक आदिमें लगालेना चाहिए।

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