Jump to content
अजित कुमार के जैन

तत्वार्थ सूत्र स्वाध्याय अध्याय 2सूत्र 13

Recommended Posts

अस्तित्व     जिसका लोक में  हमेशा अस्तित्व  रहता है जिसको किसी के द्वारा न तो उत्पन्न किया जासकता है एवं न ही किसीके द्वारा नाश किया जा सकता है।

नित्यत्व          जो नित्य है अर्थात नाशवान नहीं है।

प्रदेशत्व         जिसके निश्चित प्रदेश है  उन्हें न कम किया जा सकता एवं न ज्यादा।जिस शक्तियों के कारण द्र्व्य का कोई न कोई आकार अवश्य होता है।

 पर्याय    एक द्रव्य  के विभिन्न  अवस्थाओं,रूपों  आदि को  उस द्रव्य की पर्याय कहते हैं

Edited by Pramod jain1954

Share this post


Link to post
Share on other sites

×
×
  • Create New...