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अजित कुमार के जैन

तत्वार्थ सूत्र अध्याय 2

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मोहनीय कर्म की कुल २८ प्रकृतियाँ होती हैं जिसमें से तीन दर्शन मोहनीय की(मिथ्यात्व,सम्यक् मिथ्यात्व तथा सम्यक् प्रकृति) एवं ४ चारित्र मोहनीय(अनन्तानुबंधी क्रोध, मान ,माया और लोभ) इन ७ प्रकृतियाँ के उपशम,क्षायोपशम अथवा क्षय से क्रमश: औपशमिक,क्षायोपशमिक और क्षायिक सम्यक् दर्शन की उत्पत्ति होती है। शेष २१ प्रकृतियाँ निम्न हैं

प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध,मान,माया,लोभ  ४ प्रकृतियाँ 

अप्रत्याख्यावरणीय क्रोध मान माया लोभ   ४ प्रकृतियाँ 

संज्वलन क्रोध मान माया लोभ                  ४ प्रकृतियाँ 

नोकषाय   हास्य, रति,अरति जुगुत्सा ,शोक भय स्त्री वेद,पुरुष वेद और नपुंसक वेद                    ९ प्रकार 

                      इस प्रकार कुल शेष २१ प्रकृतियाँ  हैं।

 

 

Edited by Pramod jain1954

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