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  3. तो क्या मूर्तिक एवं रूपी और अमूर्तिक एवं अरूपी को एक समझना चाहिए।फिर अलग अलग शब्दों का उपयोग क्यों किया गया यह समझ आ गया भैया जी।धन्यवाद
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  5. निक्षेप किसी भी पदार्थ अथवा वस्तु को लोक व्यवहार से पहचान हेतु निम्नप्रकार पहचान/नाम दिये जाने को निक्षेप कहते हें। नाम निक्षेप लोक व्यवहार हेतु किसी का नाम एसा नाम रख देना जिसके गुणों सेउसका दूर दूर तक कोई नाता नहीं हो ,जैसे इन्द्र,गणेश महादेव स्थापना निक्षेप जैसे किसी मूर्ति में भगवान की स्थापना कर उन्हें भगवान महावीर कहना,शतरंज की गोटियों में हाथी ,घोडे ऊँट,राजा,रानी इत्यादि मानना जब कि उनकी बनावट वैसी नहीं होती द्रव्य निक्षेप किसी राजा के पुत्र को भविष्य का राजा मान कर राजा कहना इत्यादि भाव निक्षेप जो वर्तमान में जो है,उसे वैसा ही कहना जैसे देवों के राजा कोइन्द्र कहना,राजा कोराजा कहना, पुजारी को पुजारी कहना इत्यादि
  6. जिन पदार्थों में स्पर्श,रस,गंध वर्ण इत्यादि गुण पाये जाते हें,उन्हें मूर्तिक पदार्थ कहते हैं।सभी पुदगल पदार्थ मूर्तिक होते हैं। उक्त के विपरीत जिन पदार्थों में स्पर्श,रस,गंध वर्ण इत्यादि गुण नहींपाये जातेहैं,उन्हें अमूर्तिक पदार्थ कहते हैं। जैसे जीव द्रव्य(आत्मा), आकाश द्रव्य,धर्म द्रव्य,अधर्म द्रव्य और काल द्रव्य इत्यादि
  7. जिन पदार्थों में स्पर्श,रस,गंध और वर्ण इत्यादि गुण पाये जाते हैं,उन्हें रूपी पदार्थ कहते हैं। जितने भी पुदगल द्रव्य हैं,वह सभी रूपी पदार्थों की श्रेणी में आते हें। एवं अवधि ज्ञान केवल इन्हीं को जानता है।आत्मा के गुणों को जैसे किसी का गुणस्थान,परिणामों की विशुध्दता इत्यादिको अरूपी पदार्थ कहते हें जिनको केवल केवल ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है।
  8. कृपया निक्षेप का अर्थ सरल भाषा मे समझाइये।मूर्तिक और अमूर्तिक क्या होता है?
  9. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  10. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  11. कृपया रूपी पदार्थ को स्पष्ट रूप से समझाइये।
  12. यहाँ पर जीव से तात्पर्य आत्मा से है।और आत्मा को स्वभाव से शुद्ध कहा गया है।लेकिन यह आत्मा हमेशा से शुध्द अवस्था में नहीं होती अपितु इसे शुध्द करने के लिए मोक्ष पुरुषार्थ करने कीआवश्यकता होती है। जैसे स्वर्ण कभी शुध्दरूप सेउपलब्ध नहीं होता है अपितु वह खान में अशुध्दियों के साथ ore रूप में उपलब्ध रहता है जिसे स्वर्ण शुधद करने के पुरुषार्थ के पश्चात ही शुध्दरूप में प्राप्त किया जा सकता है।यदि यहआत्मा हमेशा शुध्द रूप में ही रहती तो मोक्ष में ही रहती एवं फिर मोक्ष पुरुषार्थ का कोई औचित्य ही नहीं रहता जब कि वास्तविकता में एसा नहीं है। वास्तविकता में आत्मा अनादिकाल से अशुध्द है।अशुध्दियों से मेरा तात्पर्य कर्म रूपी अशुध्दियां हैं और यह कर्म अजीव हैं।एवं आत्मा अनादिकाल से इन कर्मों से बंधी है,एवं कर्मों सेबंधे होने के कारण ही यह आत्मा संसार में है।जिस दिन यह आत्मा कर्मों से मुक्त हो जाएगी,वह मोक्ष में स्थित होजाएगी। उक्त से स्पष्ट है कि आत्मा केवल कर्मों से बंध के कारण ही संसार में है।अत:स्पष्ट है कि कर्म जो कि अजीव हैं, के कारण ही आत्मा संसार में है।अत: यह भी स्पष्ट है कि कर्म है तो आत्मा संसार में है अन्यथा नहीं। अत:यह भी स्पष्ट है कि अजीव है तो संसार है ।और जीव(आत्मा) का अजीव (कर्मों ) से बँधने के कारण ही संसार है।इसी कर्मों से बंधी आत्मा को कर्मों से मुक्त करने के लिए ही मोक्ष पुरुषार्थ की आवश्यकता को तत्वार्थ सूत्र ग्रन्थ में उद्घाटित कियागयाहै।
  13. मति ज्ञान। हमें मन और इन्द्रियों की सहायता से जो ज्ञान होता है,उसे मतिज्ञान कहते हैं। श्रुत ज्ञान मन और इन्द्रियों के द्वारा जानी हुई वस्तु को औरअधिक विशेष रूप से जानना श्रुत ज्ञान कहते हैं। उपशम अशुभ भावों को/परिणामों को कुछ समय तक दबा कर शुभ भावों में परिणमन करना उपशम कहलाता है।लेकिन इसका अधिकतम समय अन्तर्मुहुर्त (४८ मिनट) होता है इसके पश्चात पुन: शुध्द से शुभ और शुभ से अशुभ में आना ही पडताहै। क्षयोपशम जब अधिकतम अशुभ परिणामों का पूणर्तया क्षय हो जाता है एवं छुटपुट अवशेष अशुभ परिणामों को दबाकर शुभ भावों में परिणमन करने की स्थिति को क्षयोपशम कहते हैं।इसका अधिकतम समय ६६ सागर होताहै यदि उक्त में आगमानुसार कोई त्रुटि हो तो कृपया त्रुटियों का निवारण करें ताकि में अपने के correct कर सकूँ। जयजिनेंद्र
  14. सम्यक् दर्शन के अभाव में कितना भी ज्ञान हो,वह मिथ्याज्ञान ही होता है।लेकिन सम्यक् दर्शन होते ही वह ज्ञान सम्यक् ज्ञान हो जाता है।अत:सम्यक् दर्शन के बिना सम्यक् ज्ञान की उत्पत्ति कभी संभव नहीं।
  15. प्रमाण और नय के अनुसार प्रचलित लोक व्यवहार को निक्षेप कहते हैं
  16. दर्शन. और ज्ञान मे दर्शन हि पुज्य हे क्योकि सम्यक दर्शन के होने पर हि मिथ्या ज्ञान सम्यक ज्ञान हो जाता हे।अतः पुज्य होने से सम्यक दर्शन को पहले कहा हे।
  17. निक्षेप का अर्थ है- प्रस्तुत अर्थ का बोध देने वाली शब्द संरचना ।
  18. संसार अजीव के होने पर होता है क्योंकि जीव और अजीव के बद्ध होने से संसार होता है,यह कथन स्पष्ट नही हो रहा है।कृपया समाधान कीजिये
  19. क्षयोपशम मतलब बढना ,प्रकट होना उपशम मतलब दबा देना। जैसे पानी मे कीचड़ था उसमें फिटकरी डाल कर नीचे बैठा देना थोड़ी देर (अतंमुहुरत )के लिए
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    पाठ - 4 वाक्य रचना - वर्तमान काल - कर्ता कारक
  20. मतिज्ञान के विषयभूत पदार्थ से भिन्न पदार्थ का ज्ञान श्रुतज्ञान है। मतिज्ञान—इंद्रिय और मन के द्वारा होने वाला ज्ञान मतिज्ञान है
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    पाठ -3 - संज्ञा एवं क्रिया शब्दावली
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