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विद्याध्ययन का सुयोग - ५३

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,


       आज की प्रस्तुती से हम जानेंगे कि गणेशप्रसाद ने बम्बई में ज्ञानार्जन हेतु कापियों को बेचकर धनार्जन किया।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


            *"विद्याध्ययन का सुयोग"*

                     *क्रमांक - ५३"*


        बाबा गुरुदयालसिंह ने कहा आप न तो हमारे संबंधी हैं। और न हम तुमको जानते ही हैं तुम्हारे आचारादि से अभिज्ञ नहीं हैं फिर भी हमारे परिणामों में तुम्हारे रक्षा के भाव हो गए।

        इससे अब तुम्हे सब प्रकार की चिंता छोड़ देना चाहिए तथा ऊपर भी जिनेन्द्रदेव के प्रतिदिन दर्शननादि कर स्वाध्याय में उपयोग लगाना चाहिए। तुम्हारी जो आवश्यकता होगी हम उसकी पूर्ति करेंगे।' इत्यादि वाक्यों द्वारा मुझे संतोष कराके चले गए।

       मैंने आनंद से भोजन किया। कई दिन से चिंता के कारण निंद्रा नहीं आई थी, अतः भोजन करने के अनंतर सो गया। तीन घंटे बाद निंद्रा भंग हुई, मुख मार्जन कर बैठा ही था कि इतने में बाबा गुरुदयालजी आ गए और १०० कापियाँ देकर यह कहने लगे कि इन्हें बाजार में जाकर फेरी में बेज आना।

      छह आने से कम में न देना। यह पूर्ण हो जाने पर मैं और ला दूँगा। उन कापियों में रेशम आदि कपड़ो के नमूने विलायत से आते हैं।

      मैं शाम को बाजार में गया और एक ही दिन में बीस कापी बेच आया। कहने का तात्पर्य यह है कि  छह दिन में वे सब कापियाँ बिक गई और उनकी बिक्री के मेरे पास ३१।=) हो गए। अब मैं एकदम निश्चिंत हो गया।

      यहाँ पर मंदिर में एक जैन पाठशाला थी। जिसमें श्री जीवाराम शास्त्री गुजराती अध्यापक थे (वे संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान थे)। ३०) मासिक पर दो घंटा पढ़ाने आते थे। साथ में श्री गुरुजी पन्नालालजी बकलीवाल सुजानगढ़ वाले ऑनरेरी धर्मशिक्षा देते थे।

       मैंने उनसे कहा- 'गुरुजी ! मुझे भी ज्ञानदान दीजिए।' गुरुजी ने मेरा परिचय पूंछा, मैंने आनुपूर्वी अपना परिचय उनको सुना दिया। वह बहुत प्रसन्न हुए और बोले तुम संस्कृत पढ़ो।
      
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
 ?आजकी तिथी- आषाढ़ शुक्ल २?

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