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रामटेक - ४१

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,

        अनेक पाठकों ने श्री रामटेक जी की वंदना की होगी। आत्मकथा की आज की प्रस्तुती के अंशों से हम पूज्य वर्णीजी की अनुभूति के अनुसार श्री रामटेक जी की वंदना करेंगे।

     पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया।

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?


                      *"रामटेक"*

                     *क्रमांक - ४१*


              रामटेक के मंदिरों की शोभा अवर्णनीय है। यहाँ पर श्री शांतिनाथ स्वामी के दर्शन कर बहुत आनंद हुआ। यह स्थान अति रमणीय है। ग्राम से क्षेत्र ३ फर्लांग होगा। निर्जन स्थान है।

          यहाँ चारों तरफ  बस्ती नहीं। २ मील पर पर्वत है जहाँ श्री रामचंद्र जी महराज का मंदिर है। वहाँ पर मैं नहीं गया। जैन मंदिरों के पास जो धर्मशाला थी उसमें निवास कर लिया।

        क्षेत्र पर पुजारी,माली, जमादार, मुनीम आदि कर्मचारी थे। मंदिर की स्वच्छता पर कर्मचारीगणों का पूर्ण ध्यान था। ये सब साधन यहाँ पर अच्छे हैं, कोष भी क्षेत्र का अच्छा है, धर्मशाला आदि का प्रबंध उत्तम है। परंतु जिससे यात्रियों को आत्मलाभ हो उसका साधन कुछ नहीं।

       उस समय मेरे मन में जो आया उसे कुछ विस्तार के साथ आज इस प्रकार कह सकते हैं-

       ऐसे क्षेत्र पर आवश्यकता एक विद्वान की थी, जो प्रतिदिन शास्त्र प्रवचन करता और लोगों को मौलिक जैन सिद्धांत का का अवबोध कराता। जो जनता वहाँ पर निवास करती है उसे वह बोध हो जाता कि जैनधर्म इसे कहते हैं।

     हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की बलवत्ता है जो हम लोग बाह्य कार्यों में द्रव्य का व्ययकर ही करने को कृतार्थ मान  लेते हैं।   
        
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
     ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल १?

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