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संसार के दुःखों से बचने के लिए अष्ट कर्मों का नाश आवश्यक है

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Sneh Jain

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आचार्य योगीन्दु अपने साधर्मी साधु को समझाते हैं कि तू संसार में भ्रमण करता हुआ बहुत दुःख प्राप्त कर रहा है। अतः अब शीघ्र अपने आठों ही कर्मों को नष्ट कर, जिससे मोक्ष को प्राप्त हो सके। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा -

119.    पावहि दुक्खु महंतु तुहुँ जिय संसारि भमंतु।

        अट्ठ वि कम्मइँ णिद्दलिवि वच्चहि मुक्खु महंतु।।

अर्थ -.  हे जीव! तू संसार में भ्रमण करता हुआ बहुत दुःख प्राप्त करता है। (अतः) आठों ही कर्मों को नष्ट कर श्रेष्ठ (स्थान) मोक्ष जा।

शब्दार्थ -पावहि-प्राप्त करता है, दुक्खु-दुःख, महंतु-बहुत, तुहुँ-तू, जिय-हे जीव!, संसारि-संसार में, भमंतु-भ्रमण करता हुआ, अट्ठ-आठों, वि-ही, कम्मइँ-कर्मों को, णिद्दलिवि-नष्ट कर, वच्चहि-जा, मुक्खु-मोक्ष, महंतु-श्रेष्ठ।

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